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गढ़ाइल जे रहे मुरत

gaDhail je rahe murat

कृष्णानन्द कृष्ण

कृष्णानन्द कृष्ण

गढ़ाइल जे रहे मुरत

कृष्णानन्द कृष्ण

और अधिककृष्णानन्द कृष्ण

    गढ़ाइल जे रहे मुरत ढहल जाता

    समय के धार में सब कुछ दहल जाता

    सहल खुद के रहल आसान ना, यारे

    सहत अबले रहीं, अब ना सहल जाता

    जमाना के कहीं का हम, बुझाता ना

    समय बाटे कठिन, कसहूँ कटल जाता

    चलत बा रोज संसद में बहस अनघा

    मगर औकात लोगन के घटल जाता

    समय देखीं, समय के साथ मत छोड़ीं

    समय के साथ जे बाटे, बढ़ल जाता

    स्रोत :
    • पुस्तक : नया सूरज चढ़ल जाता (पृष्ठ 20)
    • रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
    • प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 2000

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