गढ़ाइल जे रहे मुरत
gaDhail je rahe murat
गढ़ाइल जे रहे मुरत ढहल जाता
समय के धार में सब कुछ दहल जाता
सहल खुद के रहल आसान ना, यारे
सहत अबले रहीं, अब ना सहल जाता
जमाना के कहीं का हम, बुझाता ना
समय बाटे कठिन, कसहूँ कटल जाता
चलत बा रोज संसद में बहस अनघा
मगर औकात लोगन के घटल जाता
समय देखीं, समय के साथ मत छोड़ीं
समय के साथ जे बाटे, बढ़ल जाता
- पुस्तक : नया सूरज चढ़ल जाता (पृष्ठ 20)
- रचनाकार : कृष्णानन्द कृष्ण
- प्रकाशन : पुनः प्रकाशन, पटना
- संस्करण : 2000
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