एहि जंगलसँ ओहि जंगलक जानवर
ehi jangalasan ohi janglak janvar
एहि जंगलसँ ओहि जंगलक जानवर
नीक अछि, आदमीसँ कतहु जानवर
दिनमे रूप किछु आ रातिमे रूप किछु
नहि बनाबैत अछि बन्धु, ओ जानवर
उर बसा द्वेष, ईर्ष्या, घृणा केर लहरि
रक्त-तर्पण करैछ ने कोनो जानवर
डूबिकऽ वासना केर दुर्गंधमे
नहि सुनल, बलात्कारी बनल जानवर
अपन हाथे अपने परिधि आदमियतक
तोड़ि देलक मनुख, ने तोड़ल जानवर
- पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 39)
- रचनाकार : कलानन्द भट्ट
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1983
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