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एहि जंगलसँ ओहि जंगलक जानवर

ehi jangalasan ohi janglak janvar

कलानन्द भट्ट

कलानन्द भट्ट

एहि जंगलसँ ओहि जंगलक जानवर

कलानन्द भट्ट

और अधिककलानन्द भट्ट

    एहि जंगलसँ ओहि जंगलक जानवर

    नीक अछि, आदमीसँ कतहु जानवर

    दिनमे रूप किछु रातिमे रूप किछु

    नहि बनाबैत अछि बन्धु, जानवर

    उर बसा द्वेष, ईर्ष्या, घृणा केर लहरि

    रक्त-तर्पण करैछ ने कोनो जानवर

    डूबिकऽ वासना केर दुर्गंधमे

    नहि सुनल, बलात्कारी बनल जानवर

    अपन हाथे अपने परिधि आदमियतक

    तोड़ि देलक मनुख, ने तोड़ल जानवर

    स्रोत :
    • पुस्तक : कान्ह पर लहास हमर [मैथिली गजल संग्रह] (पृष्ठ 39)
    • रचनाकार : कलानन्द भट्ट
    • प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
    • संस्करण : 1983

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