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का कहीं रउरा

ka kahin raura

अशोक द्विवेदी

अशोक द्विवेदी

का कहीं रउरा

अशोक द्विवेदी

और अधिकअशोक द्विवेदी

    का कहीं रउरा कृपा के दया उपकार के

    जय बा रउरा जोर के जैकार बा अधिकार के

    दउर के धाकल थिराइल न्याय कतहूँ ना मिलल

    अब मँगरुआ टोह में बा कुछ नया हथियार के

    खून के दीया जरा के बा खपावत जान के

    साँझि होते खेदाता डाँट के—दुत्कार के

    कुछ बोली, ना उठाई नजर तहरा खिलाफ

    बाल बच्चन के फिकिर बा अउर बा घर-बार के

    आदमी के टुकड़ा टुकड़ा काम भर बेचे के बा

    मत दुखा तूँ, इहे बाटे चलन एह बाजार के

    बा इहाँ गर्दन कटउवल, लूट के रस्साकशी

    सुध कहाँ बा, कवन गत होई भला संसार के

    राह सिरजन के नया, खोजे में सब गुम हो गइल

    जिन्दगी हारल थकल बइटल रहल मन मार के

    स्रोत :
    • पुस्तक : फूटल किरिन हजार (पृष्ठ 140)
    • रचनाकार : अशोक द्विवेदी
    • प्रकाशन : पाती प्रकाशन, बलिया
    • संस्करण : 2003

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