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यदि आओगे फिर धरती पर

yadi aoge phir dharti par

रत्नेश अवस्थी

रत्नेश अवस्थी

यदि आओगे फिर धरती पर

रत्नेश अवस्थी

और अधिकरत्नेश अवस्थी

    यदि आओगे फिर धरती पर पड़ जाएँगा पछताना,

    राम! कभी इस दुनिया में अब कहता हूँ तुम मत आना,

    तुम आओगे तो अवधपुरी की दशा देख अकुलाओगे,

    या फिर स्वयं अकेले में तुम छुप कर अश्रु बहाओगे,

    देखोगे कलयुगी भारत को स्वयं राम का हत्यारा है,

    और सड़क पर इक दशरथ है जो बेघर है बेचारा है,

    भूल गए आचरण तुम्हारे केवल पत्थर पहचाना,

    राम! कभी इस दुनिया में अब कहता हूँ तुम मत आना,

    कौशल्या माता भी अब तो भीख माँग कर खा लेती है,

    और सिया भी जान गँवा कर अपनी लाज बचा लेती है,

    साथ सुमित्रा कैकेयी को लखन भारत ने त्याग दिया है,

    और एक कलयुगी राम ने सीता को बनवास दिया है,

    हर इक मन में रावण बैठा क्या संभव है लड़ पाना,

    राम! कभी इस दुनिया में अब कहता हूँ तुम मत आना,

    तुमको याद दिला दूँ इतना दूकानों पर तुम बिकते हो,

    हत्यारों के कंठ सुशोभित हो आभूषण में सजते हो,

    कामी क्रोधी बेच रहे हैं नाम तुम्हारा सरकारों में,

    दिख जाता है नाम तुम्हारा हत्या के संग अखबारों में,

    इतना कपट भरा है सब में मुश्किल है अब जी पाना,

    राम! कभी इस दुनिया में अब कहता हूँ तुम मत आना,

    स्रोत :
    • रचनाकार : रत्नेश अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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