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वसन्ते-बिरहिनी

vasante birahini

कालीकान्त झा ‘बूच’

कालीकान्त झा ‘बूच’

वसन्ते-बिरहिनी

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    नव-नव पप्पल मे हँसलै पुरनी कचनार गय,

    बूढ़ी महुओ तर लगलै—रऽसक पथार गय।

    मलय वसातक मंतर पड़लै,

    विपटल हो आम मजड़लै,

    चौबट्टी पड़का जुग जुगहा

    पीपड़ नव पनकी सँ भड़लै

    पिंक्की केँ पिक् कऽ रहलै, निक्की दुलार गय।

    बूढ़ी महुओ तर...

    बेली पँजियाबय कनैल केँ,

    बेल नुकावय रसक घैल केँ,

    सरियाबय नव गठित गात केँ,

    गड़ियाबय पछबा बसात केँ,

    कदली कनिया कऽ रहलै घोघे उघार गय।

    बूढ़ी महुओ तर...

    शूल-शूल पर फूल बनौलनि,

    खूब मालती मोन मनौलनि,

    गम-गम कऽ उठलीह चमेली,

    रूसलि चम्पा सासुर गेली,

    विधवो सिम्मर पर लगलै सिनुरी बजार गय।

    बूढ़ी महुओ तर...

    मंगल कुशल कहू की वेशी?

    सपने में अयला परदेशी,

    चिर-पिपास पर छल-छल प्याली,

    भागऽ लागल क्षुधा अकाली,

    ओरक उस्सर पर खसलै रसवन्ती धार गय।

    बूढ़ी महुओ तर...

    रहलहुँ शेष राति भरि जागलि,

    हुनक दोष की? हऽम अभागलि

    रसक अथाह सिन्धु छल उछलल,

    प्राण मुँदा बुन्ने ले विद्वल,

    लग-लग अकाशे चन्ना धरती अन्हार गय।

    बूढ़ी महुओ तर...

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 70)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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