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त्रिपथगे

tripathge

त्रिपथगे! ककर शरण हम जाउ?

महापातको गलि जाइत अछि, जेना पानिमे नोन।

गंगा नाम उचरिते, अनकर तखन नेहोरा कोन?

भक्तिभाव मूर्च्छित अछि मनमे, तकरा आबि जगाउ।

शिवक जटा बसि, पाबि निकट शशि, मन अछि परम उदार,

महापातकी शत-सहस्रकेर, कयलहुँ बेड़ा पार।

हमरो आश अहींपर निर्भर, पुनि ककरा गोहराउ।

काम-क्रोध-मद करइछ गदमद, छोड़ि रहल नहि सङ्ग।

चित अति चंचल कहल करय नहि, कयने रहय मतङ्ग।

रङ्ग-ढङ्ग सबहिक विपरीते, पुनि ककरा अपनाउ?

मोह विवश लोचन अन्हरायल, उचित बाट नहि सूझल,

आदि वयसमे भोग रोग थिक, से बुझितहुँ नहि बूझल।

तपइत पश्चात्ताप आगिमे, ककरा विपति सुनाउ?

कलिमल हरणी नाम अहिँकटा, के देखत माँ आन?

चकुआइत चारू दिस ताकी, लागय सुन्न-मसान!

पापक तापेँ हलक सुखाइछ, निर्मल नीर पिआउ।

सत्कर्मक अभ्यास रहल नहि, पापक बनल पथार,

मोटरी नहि, मोटा अति भारी, उठा पाबी घाड़।

'बतहू' सुत अकबक करैत अछि, आबहु अंक लगाउ।

त्रिपथगे! ककर शरण हम जाउ?

स्रोत :
  • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 307)
  • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
  • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
  • संस्करण : 2025

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