[१]
कैक बेर चिट्ठीमे लिखलहुँ हाथ पयर-ए खाली
ब्याह भेना बरखो बीति गेलै, देलहुँ ने कंगन बाली।
काल्हि ललिताक माइकेँ, हाथमे कंगन देखलहुँ
नाकमे नथिया आर पयरमे पायल देखलहुँ
नूआ जर्जेट पहिरने चूड़ी खनकाबैत छली
हमरा दिसि ताकि-ताकिकऽ मनकेँ लोहछाबैत छली
देखिकेँ हमरा तखने बाटमे टोकि देलनि
मुन्नाक पापा की सभ देलनि से बात पुछलनि
मोन केर बात एकटा खोलि कहै छी प्रियतम
सौख होइये पहिरतहुँ नूआ जर्जेट प्रियतम
पतिया लीखिकेँ पूछी अहीँसँ कोना मोनकेँ ढ़ाली
सखीक नूआ रंग-विरंगक हमर देह-ए खाली।
[२]
चिट्ठीकेँ पढ़ैत-पढ़ैत कैक बेर रामू हँसला
पत्रक उतारा दै लऽ कागत फोन्टेन लऽ बैसला
लिखलनि हे प्राण-प्रिया हाल सभ जानै छी
ताहिपर मनमे की-की, किदन सभ मानै छी
चारि सौ टाका तनखा मासमे भेटैए
समटा टाकाकेँ महगी दुर्वाशा सौखैए
तै पर अफसर बाबूकेँ दू-चारि घूस चाही
मोन जँ होयतनि तखनहिं बर्फी आ जूस चाही
महगी बाजार केर ठोंठकेँ मोकि रहल
काँटी गत्तर-गत्तरमे साहेब सभ ठोकि रहल
मुन्ना आ सुम्नी दूनू, आब स्कूल जाइए
बुढ़वा-बुढ़िया तँ सभ दिन घरमे बेमार रहैए
जीबाक नहि मोन करैए कोना दुःखकेँ टाली
जँ भेटितय तँ पिबिये जयतहु विष जहर केर प्याली।
[३]
पत्रकेँ पढ़ितहि देरी कोँढ़ तँ फाटि गेलनि
आबि कऽ साँप कोनो मोनमे काटि गेलनि
आँखिसँ झर-झर-झर-झर नोर तँ झहरय लागल
साओन केर मेघ जकाँ जोरसँ बरिसय लागल
पत्रमे लिखलनि तखने गलतीकेँ माफ करू
सीताक छाया बनब चित्तकेँ साफ करू
हमरा नहि कोनो तरहक नूआ जर्जेट चाही
कंगन, पायल की बाली कोनो ने सेट चाही
चाही बस चाही हमरा माथक सिन्दूर चाही
हाथ केर चूड़ी आर मोन भरपूर चाही
अहाँक औरदा आ हम्मर सोहाग चाही
मरुआक रोटी संगे माछ आ साग चाही
दुख तँ अहिना रहबे करतै कहुना दुखकेँ टाली
हमर देवता हमरा खातिर अहीँ छी कंगन बाली।
- पुस्तक : द्विपर्णा [मैथिली गीत एवं गजल] (पृष्ठ 21)
- रचनाकार : राम चैतन्य धीरज
- प्रकाशन : किसुन संकल्प लोक, सुपौल
- संस्करण : 1982
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