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शरणमे राखि लिअऽ

sharanme rakhi liaऽ

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

शरणमे राखि लिअऽ

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    शरणमे राखि लिअ हे राम।

    दैवक मारल, दुखक झमारल, हारल हम संग्राम॥

    चसकल मन लसकल भोगहिमे गुनलक नहि परिणाम।

    तृष्णा दिन दिन बढ़ले जाइछ दैछ पूर्णविराम॥

    लौकिक सुख साधन संचयमे बिसरल छवि अभिराम।

    जानि कोन असत्कर्मक फल भेला विधाता वाम॥

    सबतरि दौड़ि लगबिते रहलहुँ, कयल कहाँ विश्राम।

    पाइ पाइ कय जोड़ल, मङनी लेल एक छदाम॥

    उच्छृंखल मन कहल मानय भेल फिरय उद्दाम।

    कतबो चाही लगा पाबी, मुँहपर एकर लगाम॥

    जाहि भूमिमे जन्म देलनि विधि से थिक मिथिला धाम।

    महाशक्तिकेँ अंक लगाओल अपनहु एही ठाम॥

    पिता वचन नहि टारल वनसँ अनलनि भरत खराम।

    जिति लंका, दय राज विभीषणकेँ पूरल मनकाम॥

    पिच्छड़ पथ, दुर्बल पद विचलित रहि सकल निष्काम।

    स्वीकारू पापी 'बतहू' केर शत-शत कोटि प्रणाम॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 306)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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