Font by Mehr Nastaliq Web

समुझ ना आवे बात रे!

samujh na aave baat re!

तैयब हुसैन पीड़ित

तैयब हुसैन पीड़ित

समुझ ना आवे बात रे!

तैयब हुसैन पीड़ित

और अधिकतैयब हुसैन पीड़ित

    हमनी बानी जंगली

    बाटे घर हमार जंगलात रे!

    कइसे हम दुश्मन दुनिया के

    समुझ आवे बात रे!

    खाइले जंगल के फल

    पीऽले झरना के पानी

    पेड़-पतइयन, नदी-पहाड़ी

    संग आपन जिनगानी

    जड़ी-बुटी तेंदु के पत्ता

    धन-दौलत औकात रे!...

    हमरे से बा साफ हवा

    बादल से हमरे इयारी

    उल्टे ठीकेदार मुदइया

    देवे हमके गारी,

    साफ-साफ केस

    अदालत तबहूँ ना पतिआत रे!...

    पूर्वज के जवना धरती पर

    सालों-साल से रहलीं,

    काहे आज उजारल जाता

    हम जो जाने चहलीं,

    नाम धराइल बागी

    मरलीं या गइलीं हवलात रे!...

    कादो हमरे जरवे-तर बा

    उनकर सोना-चानी,

    सरकारो ना कहलक पहिले

    अब होता मनमानी,

    जाइब कहवाँ, जिअब कइसे

    केहू ना बतिआत रे!...

    कादो हम गँवार बानी

    अब सभ्य बनावल जाएब,

    बस जइहंन इहाँ अउर

    हम शहर शहर छिछिआएब,

    देस तरक्की करी भले

    मोर जिनगी रही तवाँत रे!...

    विकास पहिले काहे ना

    काहे ना सब जगहा?

    पूछीं राजाजी हमके

    घोषित करीं बेबहरा!

    रक्षा में हथियार उठवलीं

    तब नक्सली कहात रे!

    कइसे हम दुश्मन दुनिया के

    समुझ ना आवे बात रे!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सुर में सब सुर (पृष्ठ 45)
    • रचनाकार : तैयब हुसैन पीड़ित
    • प्रकाशन : शब्द संसार, पटना
    • संस्करण : 2011

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY