पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ
patte jharne lage, buDha bargad hua
पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ,
बस, गई उम्र का आकलन रह गया!
पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ,
बस गई उम्र का आकलन रह गया!
मेरे गीतों पे जो, तुमने बांधी कभी,
ज़िल्द वो फट गई, संकलन रह गया!
एक बरसात की सील ऐसी ज़मी—
मन की दीवार, भीगी है बरसों हुए!
एक दशक बीत कर भी, ये लगता मुझे—
अलग जैसे, हम कल या परसों हुए!
एक हथेली तेरी, एक हथेली मेरी,
ओक बन ना सकी, आचमन रह गया!
पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ,
बस, गई उम्र का आकलन रह गया!
हैं वो कंकर अभी भी मेरे पास में—
बाँध चिठ्ठी में तेरे उछाले हुए!
दोपहर उम्र की, गाँव के छोर पर-
बीती पगडँडी पे प्याऊ डाले हुए!
ठँडा पानी भी था, गुड़ भी था नेह का,
लोग आए, तेरा आगमन रह गया!
पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ,
बस, गई उम्र का आकलन रह गया!
पात पीपल के तुम ने, गणित में रखे
तितलियाँ मार डाली थी इतिहास में!
पाठ पढ़ते वो हिंदी में तुम राम का
रोये कितने थे सीता के बनवास में!
बात भूले वो तुम, तितलियाँ खो गईं
याद मुझ को सभी, आदतन रह गया!
पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ,
बस, गई उम्र का आकलन रह गया!
धुँधले दर्पन में गालों की अरुणाईयाँ—
अपनी आँखों को दिखला के, छलता रहा!
उम्र की उंगलियाँ, दस्तख़त कर गईं—
मैं भुलावे का, उबटन ही मलता रहा!
कौन से रास्ते, जाने किस मोड़ पर,
कब बिछड़ कर मेरा, बांकपन रह गया!
पत्ते झरने लगे, बूढ़ा बरगद हुआ,
बस, गई उम्र का आकलन रह गया!
- रचनाकार : रमेश शर्मा
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
Additional information available
Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.
About this sher
rare Unpublished content
This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.