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पाँच बरिस पर मोहर लगाके

paanch baris par mohar lagake

तैयब हुसैन पीड़ित

तैयब हुसैन पीड़ित

पाँच बरिस पर मोहर लगाके

तैयब हुसैन पीड़ित

और अधिकतैयब हुसैन पीड़ित

    पाँच बरिस पर मोहर लगाके

    बरम्हा तोहें बनाईं होऽ

    हमर करमिया आजो कोरा

    कहिया कलम लिखाई हो!

    भारत देश भरत के धरती, मुकुट हिमालयवाला

    धोए गोर समुन्दर, गंगा पहिरावेली माला,

    राम, कृष्ण, महवीर, बुद्ध अइलन

    कब सतयुग आई होऽऽ!...

    निल बोअनी चम्पारण में, ढाका में अंगुठा देलीं

    रेल उखरलीं, डाक जरवलीं, जे कहलऽ से कइलीं

    रामराज्य के असरे कबले

    चरखा अउर चलाईं होऽऽ!...

    खेती के अपने जमीन पर हम बेदखली भइलीं

    दादा भरलन, बाप कमइलन, तबो ना करज चुकइलीं

    कइसन आजादी हम

    बन्हुआ मजदूर कहाईं होऽऽ!...

    जात, धरम, भाषा के झगड़ा, सब में तोहरे चानी

    तू बाँटऽ राज करऽ, हम आपस में टकरानी

    बिलियन के जो मिली वजीफा

    बनरे बाँट लगाई होऽऽ!...

    जब कवनो अकाल होला तू मसीह बन जालऽ

    आसमान से निहुर-निहुर के हमरा पर पछतालऽ

    भाषण में रासन देलs

    फोटो में करऽ दवाई होऽऽ!...

    होरी के गउदान दुलम, बुधिया के कफन नदारथ

    हामिद के चिमटा तक ना, दिल्ली में सकल पदारथ

    हरिजन गाँव जराय सिया से

    रावण करे सगाई होऽऽ!...

    महकल बहुत गुलाब-गंध अब खाली पेट मानी

    खाएब गेहूँ, रहेब ना एहूँ, बोले गाँव गिरानी

    रजधानी के राजा सुख अब

    हमरा करम लिखाई होऽऽ!...

    स्रोत :
    • पुस्तक : सुर में सब सुर (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : तैयब हुसैन पीड़ित
    • प्रकाशन : शब्द संसार, पटना
    • संस्करण : 2011

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