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ओह! मैं इक नृत्य करते मोर के

oh! main ik nritya karte mor ke

क्षितिज

क्षितिज

ओह! मैं इक नृत्य करते मोर के

क्षितिज

और अधिकक्षितिज

    ओह! मैं इक नृत्य करते मोर के पंजों से उड़ती धूल

    ओह! मैं ही इंद्रधनुषी डाल पे धरती का पहला फूल

    ओह! मैं तारों का हल, मैं आसमाँ का खेत

    ओह! मैं ही बूँद की आँखों में खिलती रेत

    ओह! मैं बिजली के दुःख सहता धरा का वक्ष

    ओह! मैं नभ की जटा में बादलों का वृक्ष

    ओह! मैं आकाशगंगाओं में बहता नीर

    बंसरी कान्हा की मैं, मैं द्रौपदी का चीर

    ओह! मैं ही तो हूँ पल, प्रतिपल, महीना, साल

    ओह! मैं ही तो निरंतर हूँ समय की चाल

    ओह! मैं मंदिर की घँटी के हृदय का नाद

    मैं ही परमेश्वर के कँठों का प्रथम संवाद

    ओह! मैं ही वो हूँ वो मुझमें हैं मैं उनमें

    है नहीं जो कुछ भी, जो कुछ भी है, है जिनमें

    स्रोत :
    • रचनाकार : क्षितिज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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