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मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

mujhe wo chiththi lauta do!

रमेश शर्मा

रमेश शर्मा

मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

रमेश शर्मा

और अधिकरमेश शर्मा

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    दूरभाष की सुविधाओं, मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    फाड़ के फैंकी उस चिठ्ठी का, पुरजा पुरजा ला दो!

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    चिठ्ठी आये, या ना आए, भय संशय व्याकुलता!

    आँख उनींदी, नींद आए, एक आनंद अलग-सा!

    चिठ्ठी तो बढ़ चढ़ कर लिखना, सम्मुख थर-थर कम्पन—

    भय के पाँवों, दबे समर्पण का संबंध अलग-सा!

    मन के मौलिक, सुख-दुख की उस दुनिया को दोहरा दो!

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    वो भी दिन थे, घर में जब जब, चिठ्ठी कोई आती!

    अनपढ़ दादी, मनुहारें कर, पोतों से पढवाती!

    अपने नाम नमस्ते पढ़कर, काका ख़ुश हो जाते—

    वंदन चरण का सुन के ताई, फूली नही समाती!

    अपनी नहीं मिले तो चिठ्ठी, औरों की ही ला दो!

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    सोच के लिक्खी, जाँच के लिक्खी, काट-छाँट कर लिक्खी!

    रात गए तक जाग लिखी, कुछ छत पर छुप कर लिक्खी!

    क्या सोचेगी, उसकी जगह, ख़ुद को रख के सोचा

    पूरी कॉपी फाड़़ के लिक्खी, एक ज़रा-सी चिठ्ठी!

    उसकी किताबों में ख़त मेरे, चुपके से रखवा दो!

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    छोटे बच्चे को लालच दे, भेजे ख़त का उत्तर

    कंकर से लिपटे काग़ज़ में लिखा हुआ आया था!

    “ख़त लिखती हूँ खून से स्याही, तुम समझना प्रियतम”

    ऐसे ही कुछ शेरों के संग, फूल बना पाया था!

    उस मुशायरे की जाजम फिर, काग़ज़ पे बिछवा दो!

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    फ़ुर्सत की रातों में हम, संदूक सम्भाला करते!

    सभी पुराने ख़त पढ़ कर, यादों का उजाला करते!

    उस ने सीधे, सरल भाव से लिक्खा होगा फिर भी—

    एक ही बात के, जाने कितने अर्थ निकाला करते!

    चाबी गुम है, तार से तुम, संदूक मेरा खुलवा दो!

    मुझे वो चिठ्ठी लौटा दो!

    स्रोत :
    • रचनाकार : रमेश शर्मा
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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