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मोन पड़इए अप्पन गाम

mon paDaiye appan gaam

अमित पाठक

अमित पाठक

मोन पड़इए अप्पन गाम

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    मोन कते परतारिकेँ राखब

    अप्पन कत् आनहुमे ताकब

    भेल व्यथित सन हृदय कहइए

    कतय गेल स्वर्ग सुधाम

    मोन पड़इए अप्पन गाम

    कतय गेल भुतही गाछी

    मालक थैरिमे बान्हल बाछी

    इनार, पोखरि-झाँखरि

    डोभहा खत्ता, भिन-भिन माछी

    ताकि रहल नैन बराबर

    अपना गाछक मिठुआ आम

    मोन पड़इए...

    गाछीमे खोपड़ी बनबइतौं

    खोपड़ि तर मचान बिछइतौं

    जइतौं नित ओगरै लए मिलिक'

    खेल ताश केर ओतहि मचइतौं

    दुरई की सपना आबि गेल

    आब कहाँ दिन हे राम

    मोन पड़इए...

    व्यंजन तेहने गामक नीमन

    बारिक तरकारी-तीमन

    कतबो चिक्केन-मटन कहै क्यो

    माछक झोर चहटगर अप्पन

    बथुआ-झूरी, साग गेन्हारी

    मुँहमे पानि अदौरीक नाम

    मोन पड़इए...

    पाबनि एहेन कतौ नहि देखल

    एक पर एक विविध विध डेबल

    भरि गाम भ' एकजुट निमाहए

    क्यो ककरोसँ रारि ने टेकल

    धए जुलुसक रूपमे गौआँ

    मनबै जश्न दलाने-दलान

    मोन पड़इए...

    दिन ओहेन क्यो फेर घुराबए

    गामक नेहसँ हिया जुड़ाबए

    काटितहुँ जीवन, अपने बीचहि

    क्यो एहन जँ युक्ति भिराबए

    दैव तोरे पर आश लगाओल

    पूर करह एक मनकाम

    मोन पड़इए...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : राग-उपराग (पृष्ठ 79)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2017

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