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मन को छोटा कर लूँ

man ko chhota kar loon

प्रदीप बहराइची

प्रदीप बहराइची

मन को छोटा कर लूँ

प्रदीप बहराइची

और अधिकप्रदीप बहराइची

    मन को छोटा कर लूँ दुख में,

    पर तन को कहाँ छुपाऊँ मैं,

    शब्दों में जो कह ना जाए,

    फिर कैसे उसे बताऊँ मैं।

    पर्वत-सी पीड़ा इंगित है

    कुसमय कुछ दिन और रहेंगे,

    संकल्पों की अग्नि-परीक्षा में

    हँसकर सब पीर सहेंगे,

    शांत करे जो आकुल मन को

    वह गीत कहाँ से गाऊँ मैं।

    व्यंग्य बाण की आँधी में अब

    ध्येय हज़ारों मील खड़ा है,

    खुला निमंत्रण समय दे रहा

    भाग्य डरा श्रीहीन पड़ा है,

    निर्मम तीखे आघातों से

    अब बचकर कैसे जाऊँ मैं।

    गहन-मनन करता रहता हूँ

    इन हाथों और लकीरों में,

    घूम रहा हूँ धर्मस्थल और

    उलझा-सा रहूँ फकीरों में,

    शूल से चुभते संबंधों को

    किस तरहा से निभाऊँ मैं।

    मन को...॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : प्रदीप बहराइची
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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