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मैं समय-सागर के तट पे

main samay sagar ke tat pe

क्षितिज

क्षितिज

मैं समय-सागर के तट पे

क्षितिज

और अधिकक्षितिज

    मैं समय-सागर के तट पे बह के आया इक रतन हूँ

    अर्थ निर्मल, भाव निश्छल, शब्द हैं नवजात मेरे

    नयन मंदिर, पाँव चौखट, फूल जैसे हाथ मेरे

    तेरी महिमा से अलंकृत हैं विशेषण साथ मेरे

    हो गई मुझ पर कृपा जबसे तुम्हारी नाथ मेरे

    भज रहे हैं चाँद-तारे, रात-दिन पलकें पसारे,

    मैं हृदय की धड़कनों के ग्रंथ में लिखा भजन हूँ

    मैं समय सागर के तट पर…

    वस्त्र मेरा इंद्रधनुषी, आसमानी रंग मेरा

    मैं ही घट-घट में हूँ जीवन, मरघटों से संग मेरा

    हैं अनोखे काम मेरे, हैं निराला ढंग मेरा

    मैं अगोचर, मैं ही गोचर, ये जगत् आहँग मेरा

    पेड़-छाया-धूप मेरे, सारे पुलकित रूप मेरे

    मैं प्रतिष्ठित, मैं ही खंडित, मैं ही प्राणों की अगन हूँ

    स्रोत :
    • रचनाकार : क्षितिज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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