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तोहर ठोर

tohar thor

कालीकान्त झा ‘बूच’

और अधिककालीकान्त झा ‘बूच’

    कि जहिना कुरकुर पानक ठोर।

    कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर।

    लगौलह बातक पाथर चून।

    सजौलह कऽथ कपोलक खून।

    कि रहलह एक्के बातक चूक,

    कतऽ छह प्रेमक पुंगी टूक?

    कि जहिना लाली पसरल भोर।

    कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर।

    देखि कऽ लहरल हमर करेज,

    त्यागि अयलहुँ उदयाचल गेह।

    अहाँ बिनु व्याकुल वाटक माँझ

    सुमुखि भऽ रहल जीवनक साँझ।

    कि जहिना वक्र सुधाकर गोर।

    कि जहिना सुन्नरि तोहर ठोर।

    पिपासित आयब अहँक दुआरि,

    प्रेम पीयूष पीयब झटढ़ारि,

    बधिक जँ बनत अहँक बर बाहु

    तऽ हमहूँ बनव विखंडित राहु,

    कि जहिना सुधा स्वर्ग में थोर,

    कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर।

    सीखि विश्वकर्मा सँ विज्ञान,

    बनायब सकरी मिल महान।

    भरब माधुर्यक कोषागार,

    सेहंतित भऽ जायत संसार।

    जेना कुसियारक पाकल पोर,

    कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर।

    बनव हम पुर्नजन्म मे धान,

    धान सँ भऽ जायब चिष्टान्न।

    पड़ब पुनि अहँक प्रतीक्षापात

    अछिंजल से सद्यः स्नात।

    जेना छाल्ही साजल नव खोर।

    कि तहिना सुन्दरि तोहर ठोर।

    भऽ रहल वर्ण-वर्ण निःशेष,

    शब्द सँ प्रगटल नहि उद्येश्य।

    मने मे रहल मनक सब बात

    अनल मे पड़ल नवला जल गात।

    जेना आगू अलभ्य चित चोर।

    कि तहिना सुन्नरि तोहर ठोर।

    स्रोत :
    • पुस्तक : कलानिधि (पृष्ठ 43)
    • रचनाकार : कालीकान्त झा ‘बूच’
    • प्रकाशन : श्रुति प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2010

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