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घाटी बना रहल छी

ghati bana rahal chhi

मार्कण्डेय प्रवासी

मार्कण्डेय प्रवासी

घाटी बना रहल छी

मार्कण्डेय प्रवासी

और अधिकमार्कण्डेय प्रवासी

    रुकि सकतै नहि बाट निर्झरक

    शिला-खण्ड खसि थकतै

    हम पहाड़केँ काटि-छाँटिकऽ—

    घाटी बना रहल छी।

    एक शम्भु विषपान कयल तेँ—

    अमृतक सत्ता बाँचल

    हम विषपायी-कुलक पैघ—

    परिपाटी बना रहल छी।

    युग-जीवनकेँ डँसि लेने छै

    अविश्वासमय विषधर,

    तेँ उचटल मन-प्राण-पेटपर—

    चाटी चला रहल छी।

    शीत-शान्ति चाही, अशान्त—

    वातावरणक धाहीकेँ,

    तेँ वासन्ती राग-रंगमय—

    बाटी बढ़ा रहल छी।

    नगरक नागफनीकेँ—

    फुलयबाक हिस्सक नहि लगतै,

    तेँ हम पिलखबार,

    मंगरौनी, राँटी बसा रहल छी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हम भेटब (मैथिली गीत-नवगीत संग्रह) (पृष्ठ 46)
    • रचनाकार : मार्कण्डेय प्रवासी
    • प्रकाशन : जखन-तखन, दरभंगा
    • संस्करण : 2004

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