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अहाँ छी हमर महाजन

ahan chhi hamar mahajan

मायानंद मिश्र

मायानंद मिश्र

अहाँ छी हमर महाजन

मायानंद मिश्र

और अधिकमायानंद मिश्र

    अहाँ छी हमर महाजन।

    आँखिक मुसुकानक गाहक हम

    बदलामे जीवन।

    राति हमर बन्हकी लागल अछि

    दिन अछि हमर उधारी,

    साँझ अपन हम बेचि रहल छी

    भोरुक कोन पुछारी,

    जै साँझक नहि भोर बनल अछि

    ओहि रातुक छी चानन।

    यौवन पड़ल हमर अछि भरना,

    हम रैयत खतियानी,

    दस्तावेज लिखल आँचरपर,

    हम मोहरिल खनदानी,

    लहना आर तगेदा थिकहे

    एहि सम्बन्धक कारण।

    कुरकी जपती सबटा भोगल

    भोगल मनक निलामी,

    दखल देहानिक डिगरी हाथहि

    भेल करओ बदनामी,

    यौवन केर चपरासी घुसहा,

    माङय किदन कहाँदन।

    बाटक सबटा मोड़ टपल छी

    आगूमे चौबटिया,

    साँझ पड़त कुन पंथ कहतके

    उसरत पसरल हटिया,

    फोलल जतेक बन्हायल ततबे

    लागल तेहने बन्हन।

    अहाँ छी हमर महाजन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : अवान्तर (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : मायानन्द मिश्र
    • प्रकाशन : मैथिली चेतना परिषद्, सहरसा
    • संस्करण : 1977

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