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लेभरल अरिपन सन सबहक नजरि

lebhral aripan san sabhak najri

गंगेश गुंजन

गंगेश गुंजन

लेभरल अरिपन सन सबहक नजरि

गंगेश गुंजन

और अधिकगंगेश गुंजन

    ससरि गेल छू कऽ इतिहास बहुत रास

    सभ कान्हपर जरैत तरहत्थी भरि

    लेभरल अरिपन सन सबहक नजरि

    जतेक रंगक बीतल दिन-राति सभ

    सुनगि-सुनगि दुखा जाइछ मनक बात

    मन अपनहुँ तेँ बुझौअलि भरि।

    ससरि गेल छू कऽ इतिहास बहुत रास।

    छातीमे एक ‘मकबरा’ भरि स्मृति

    आँजुरमे एक मरुस्थल भरि बालु

    आँखिमे एक आकाश भरि रिक्तता

    भरि धरती अंतर हृदयक निसबद्दता

    जे अप्पन लोक गेल संबन्धी सभ छोड़ि।

    ससरि गेल छू कऽ इतिहास बहुत रास।

    घून खायल सभक सभ प्रतीक्षा

    ठाम-ठाम ठाढ़ भेल ठुठ्ठ स्नेह

    मुँह नुका कऽ भागि रहल लोक सभ

    सूखल नदीपर किछु बालुक घर

    गेल सोखि समय एकर धार बहुत रास।

    ससरि गेल छू कऽ इतिहास बहुत रास।

    सतरंगा छपुआ सन मृदु बिहुँसी

    झरकि गेल आँचरक किनारी सन

    घन अन्हारमे कयल किछु संबोधन

    अछि हेरायल टूटि गेल आसरा सन

    आगू अछि महल फेर बनयबा लेल

    एक संग ठाढ़ अछि ताश बहुत रास।

    ससरि गेल छू कऽ इतिहास बहुत रास।

    स्रोत :
    • पुस्तक : दुःखक दुपहरिया (पृष्ठ 3)
    • रचनाकार : गंगेश गुंजन
    • प्रकाशन : क्रान्तिपीठ प्रकाशन, पटना
    • संस्करण : 1999

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