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लहरे फसलिया...

lahre phasaliya. . .

अशोक द्विवेदी

अशोक द्विवेदी

लहरे फसलिया...

अशोक द्विवेदी

और अधिकअशोक द्विवेदी

    लहरे फसलिया

    पहिरि गहना!

    मोरि लहरे फसलिया...

    सोनरंग बलिया झपरझप डोले

    जाँतल मन के बान्हन खोले

    बहुते दिनन प'

    हँसल सजना! मोरि लहरे फसलिया...

    पौरुख-पसेवा लउकल कमाई

    लड़िकन के दूध-भात चिउरा भेंटाई

    हमरा के चाहीं

    चटक तियना! मोरी लहरे...

    धनवाँ से घर हँसी कोठिला-बखारी

    उखिया उतारि देई कर्जा-उधारी

    चनवा-चननिया

    चनन अँगना! मोरि लहरे फसलिया...

    बजड़ा के बेचि दुइ कमरा लियाई

    सासु ननद जी के लुग्गा किनाई

    पुछिहें जो हमसे

    कहबि 'किछु ना!' मोरि लहरे फसलिया...

    हमके मिलत रहे उनकर नेहियाँ

    भर आँखि देखते फुलाइ जाले देहियाँ

    फुर होइ जाला

    सुघर सपना! मोरि लहरे फसलिया...

    स्रोत :
    • पुस्तक : फूटल किरिन हजार (पृष्ठ 74)
    • रचनाकार : अशोक द्विवेदी
    • प्रकाशन : पाती प्रकाशन, बलिया
    • संस्करण : 2003

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