खेतवा में खटऽ खरिहनवां में खटऽ
khetva mein khatऽ kharihanvan mein khatऽ
रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
Rambahadur ‘Adhir Pindvi’
खेतवा में खटऽ खरिहनवां में खटऽ
khetva mein khatऽ kharihanvan mein khatऽ
Rambahadur ‘Adhir Pindvi’
रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
और अधिकरामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
खेतवा में खटऽ खरिहनवां में खटऽ
करखनवां में ना।
लेके केतना सपनवां तू मनवां में ना॥
घरवा दुआर छोड़ि जालऽ परदेसवा।
चिठिया में लिखिके भेजेल सन्देसवा॥
सीधा सादा भेस भूसा रुख सुख खनवा,
करखनवां में ना, खटऽ संझवा बिहनवां॥
लेके केतना सपनवां...
काम करऽ हाड़ तोड़ि पइसा धरऽ जोड़ि जोड़ि।
खेतवा तू कोड़ि-कोड़ि, पत्थर तू फोड़ि फोड़ि॥
महल-आलीशान तू बनावऽ तजि जनवां,
कि चढ़ि जाल ना, सीढ़िया के असमनवां॥
लेके केतना सपनवां...
श्रम के पुजारी हउवऽ नाहीं तू भिखारी।
बदली जमाना आई अब तोहरी बारी॥
मेहनति के लिलरा लगाइलऽ चन्दनवां,
कि डटल रहऽ ना, मजदूर के ललनवां॥
लेके केतना सपनवां...
- पुस्तक : गँउवा के माटी अनमोल (पृष्ठ 42)
- रचनाकार : रामबहादुर ‘अधीर पिण्डवी’
- प्रकाशन : अखिल भारतीय भोजपुरी समाज, गोमतीनगर, लखनऊ
- संस्करण : 2010
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