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ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

khaab dekha to dekha tujhe dekhte

क्षितिज

क्षितिज

ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

क्षितिज

और अधिकक्षितिज

    ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

    देखते-देखते ख़ाब में खो गया

    ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

    देखते-देखते ख़ाब में खो गया

    खो गया तो ये देखा तेरी गोद में

    रख के सर अपना मैं चैन से सो गया

    ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

    सो गया तो लगा जैसे जन्मों से मैं

    जागता ही रहा हूँ किसी के लिए

    कौन है किन्तु वो क्या है क्या है उसका पता

    मैं अँधेरा हूँ किस रौशनी के लिए

    तट पे बैठा हुआ धार को देखता

    सोचता हूँ कि मैं हूँ या ये धार है

    तट के उस पार भी मैं गया तैर कर

    धार इस पार थी धार उस पार है

    कौन अँजुरी में भरकर मेरी धड़कनें

    पी गया जैसे अमृत कलश पी रहा

    मेरी साँसों की वीणा के संगीत में

    मृत्यु कुछ भी नहीं है ये किसने कहा

    किसने छोड़े हृदय की नदी में सनम

    वेदना से भरे आँसुओं के दिए

    मेरे मन के नगर में हर इक मोड़ पर

    कौन फिरता है ये आईनों को लिए

    कौन ख़ाबो में रूमाल लेकर मेरे

    ज़ख़्म को दे रहा आज आराम है

    बस यूँ ही ये मेरे प्रेम में गया

    या इसे मुझसे कुछ और भी काम है

    जब छुआ धार को ज्यों छुआ प्यार को

    मैंने उस धार को उसने इस धार को

    धार से धार मिल के नदी हो नदी हो गई

    फिर नदी में नदी में नदी खो गई

    वेदना के दिए पुष्प बन के खिले

    टूटकर आईने आईनों में मिले

    फिर जो छवि बन के उभरी अमसताल पर

    बस वही सत्य है काल के भाल पर

    मैं हूँ जिसका उसी का ही मैं हो गया

    ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

    देखते-देखते ख़ाब में खो गया

    ख़ाब देखा तो देखा तुझे देखते

    देखते-देखते ख़ाब में खो गया

    स्रोत :
    • रचनाकार : क्षितिज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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