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कइसे कहीं की भारत हौ

kaise kahin ki bharat hau

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

कइसे कहीं की भारत हौ

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    शिष्टाचार सभ्यता संस्कृति एक दम जहाँ नदारत हौ,

    कइसे कहीं की भारत हौ॥

    हरिश्चन्द्र महानगर बेइमानन किलकारी।

    पइसा पर ईमान बिकत बा उल्टा बेंट कुदारी।

    गो हत्या व्यापार हो गयल हिन्दू शान बघारत हौ॥

    भोजन बसन विदेशी आयल रहन सहन में दूरी।

    टी॰वी॰ और सिनेमा आयल हाथ में लिहले छूरी।

    विद्यालय भी बाँट रहल बा शिक्षा मूल बिगारत हौ॥

    पंछी करै पलायन निसदिन धरा भइल बीमार।

    रामराज का सपना देखै जन मानस लाचार।

    के दोषी बा कहल जाला पर्यावरण पुकारत हौ॥

    राम कृष्ण बुद्ध देव उर्वर पावन धरती।

    हमें बुझाला हो जाई कुल ऊसर बंजर परती।

    विश्व गुरु का डंका बाजै दानवता ललकारत हौ॥

    हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई कहै के भाई भाई।

    सामुह वा आतंकवाद आपस में होत लड़ाई।

    बमबारी विस्फोट होत बा सत्ता भाषण झारत हौ॥

    आखर-आखर भरल बाय यहि भारत कै इतिहास।

    उठल जात बा कारन का जनता के दृढ़ विश्वास।

    आज 'बावला' हिन्दू आपन हिन्दुस्तान बिसारत हौ॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत मंजरी
    • संपादक : हरिराम द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद द्विवेदी
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सर्व भाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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