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कहिया अड़िकऽ बजतै

kahiya aDikऽ bajatai

विभूति आनंद

विभूति आनंद

कहिया अड़िकऽ बजतै

विभूति आनंद

और अधिकविभूति आनंद

    तीतल काया, पसरल माया

    मोह कोनाकऽ टुटतै

    मीता,

    कलजोड़ी छिच्छा ऐ मन सँ

    कहिया कोनाक हँटतै!

    खेतमे गाड़ल 'धूह' बनल छै

    बित्ता-बित्ता देशक

    चालनि सन छै एकर व्यवस्था

    डर नै ककरो ठेसक

    बिनु ठेपी केर शासन एत्तऽ

    एहिना कोनाकऽ चलतै!

    मीता...

    भूआ क्रमशः पसरि रहल छै

    देशक एहि सोहिजनपर

    अमरबेलि छै लतरि गेल

    ऐ जन-मन केर उपवनपर

    मेहदी लागल हाथ एतुक्का

    कहिया खुरपी धरतै!

    मीता...

    लोकक सोचक सीमा ऐ ठाँ

    व्यक्तिवादपर अँटकल

    श्रमजीवी वर्गक छै मीता

    रस्ता भटकल-भटकल

    जाबी लागल मूँह एतुक्का

    कहिया अड़िकऽ बजतै!

    मीता, एना कोनाकऽ चलतै!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पीयर रौद पियरगर धरती (गीत-संग्रह) (पृष्ठ 77)
    • रचनाकार : विभूति आनन्द
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2018

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