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कहि कऽ किए बिसरि गेलहुँ

kahi kaऽ kiye bisari gelahun

अमित पाठक

अमित पाठक

कहि कऽ किए बिसरि गेलहुँ

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    बात एकहक टा मोनहि अछि धरि कहबै

    ककरा के सुनतै

    सए-सए किरिया सप्पत खा कऽ मनमीते जँ

    नैठि जेतै

    संग जियब संगहि मऽरब कहि कऽ किए

    बिसरि गेलहुँ

    प्रीत लए भरि दुनियाँसँ लऽड़ब कहि कऽ किए

    बिसरि गेलहुँ

    संग जियब संगहि...

    नेहक बन्हन जतबे मजगुत ततबे तन्नुक

    बूझल छल

    तखनहुँ हम सपना संजोगल आँखि किए

    नहि फूजल छल

    चान-तरेगन खोंइछमे भऽरब कहि कऽ

    किए बिसरि गेलहुँ

    संग जियब संगहि...

    बिसरि गेलहुँ अहाँ हमरा मुदा हऽम बिसरब

    कोना

    छलहुँ मोनमे रचल-बसल से चित परसँ

    उतरब कोना

    एक अकास-पतालहुँ कऽरब कहि कऽ किए

    बिसरि गेलहुँ

    संग जियब संगहि...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीत-गगन (पृष्ठ 26)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2024

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