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काहे आजु धरती बिलाप करे हो

kahe aaju dharti bilap kare ho

विजेन्द्र अनिल

विजेन्द्र अनिल

काहे आजु धरती बिलाप करे हो

विजेन्द्र अनिल

और अधिकविजेन्द्र अनिल

    (एगो कलाकार के मौत के बाद लिखाइल गीत)

    काहे आजु धरती बिलाप करे हो, होला केकर तलास?

    काहे कुम्हिलाइ गइल फुलवा हो, काहे तितिली उदास?

    मनवा ना लागे कवनो कामवा हो, काहे बिलखे बतास?

    कवना पिंजरवा के चिरई हो, धइ लिहलस अकास?

    सुनऽ सुनऽ गँउआ के लोगवा हो, सुनऽ लइका सेआन,

    सुनि लेहू बहिनी मतरिया हो, सुनऽ चतुर नदान,

    पिंजरा के सुगना हिरामन हो, धइ लिहलस अकास,

    ओकरे वियोग के कचोटवा हो, सभे भइल उदास,

    सहर-बजार गली-अँगना में, जेकर पिहिकत बोल,

    गलवा में जेकरा शहद रहे हो, जेकर सुर अनमोल,

    उहे मोर सुगना हिरामन हो, छोड़ि हमनीं के साथ,

    चलि गइल मोरंग देसवा हो, टूटल गीतियन के हाथ,

    एही से विलाप करे धरती हो, सभकर जियरा बेहाल,

    बड़ नाही होखेला अदिमियां हो, बड़ सभके से काल,

    कालवा के गालवा में जाई हो, बूढ़ लइका जवान,

    केहू नाहीं पिअले बा अमरित हो बाँची केहू के ना जान,

    रहि जइहें सभके कीरितिया हो, ओह के खइहें ना काल

    केहू से ना मिटिकी कीरितिया हो, हउए मशाल,

    सुगना धइलस अकासवा हो, बाकिर जियत वा बोल,

    गावत बा आजु ओकर गीतिया हो इतिहसवा भूगोल,

    सुनऽ सुनऽ सुनऽ मोरे सथिया हो, सुनऽ गँउआ के लोग,

    कविता कला के जमीनियाँ के नाहीं लागे कवनो रोग,

    जवना मुलुक में ना कविता हो, नाहीं कला के अड़ान

    निअराई जाला ओकर दिनवाँ हो, ओहिजा होला ना बिहान,

    स्रोत :
    • पुस्तक : विजेन्द्र अनिल के गीत (पृष्ठ 17)
    • रचनाकार : विजेन्द्र अनिल
    • प्रकाशन : संरचना प्रकाशन, आरा
    • संस्करण : 1993

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