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कब तक मग जोहूँगी

kab tak mag johungi

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

कब तक मग जोहूँगी

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    कब तक मग जोहूँगी

    अब तो उस पार चलूँ

    संध्या की वेला है

    प्रियतम के द्वार चलूँ

    कलसी के कंठ बँधी

    डोर टूटने को है

    मुट्ठी में दबा हुआ

    छोर छूटने को है

    वायु वेग में उड़ती

    पत्ती से ज्ञान मिला

    घर से पनघट तक का

    नेह रूठने को है

    सुधियों के चित्र टँगे

    भीति बिखर जाएगी

    अब तो गृह-स्वामी का

    मानूँ आभार चलूँ

    जो दृग से ओट रहा

    माना वह नहीं छुआ

    बंद जीर्ण पिंजरे में

    बोल रहा एक सुआ

    माथे पर हाथ धरे

    सोच रहा धवंतरि

    पक जाने वाला फल

    अपने ही आप चुआ

    विक्रेता तौल चुका

    ग्राहक भी बाँध रहा

    उठने वाला ही है

    सारा बाज़ार चलूँ

    साँसों के सिक्के से

    खेला हर एक जुआ

    सारे सुख जीत सके

    माँगे हर एक दुआ

    कितना भी यत्न करो

    भेद नहीं खुलता है

    कब खाता लिखा गया

    कब खाता बंद हुआ

    मालिक के घर में है

    धन की कोई कमी

    तख़्ती पर अंकित है

    मिलता उधार चलूँ

    मुरझाए फूलों को

    मंदिर भी फेंक रहा

    बूढ़ा पीपल अपनी

    चोटों को सेंक रहा

    संबोधन बदल गए

    अपनों के ही द्वारा

    डोली की दुल्हन को

    बाँसों पर टेक रहा

    सारे आशीषों की

    आब उतर जाती है

    अधरों पर तिरता है

    जीवन निस्सार चलूँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 3)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

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