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का हो गइल

ka ho gail

तैयब हुसैन पीड़ित

और अधिकतैयब हुसैन पीड़ित

    बुझल-बुझल लागत बा जियरा के जोत

    दिन जनमल रात अइसन घटा के अलोत

    डूब गइल सूरुज मन के कवनो घाट

    आँखिया में उग आइल नदिया के पाट

    बदरिया के का हो गइल!

    देख रंगल पोखरा में भोर के नहात

    पुरवइया चुनरी से फुद-फुद बतियात

    गँवई गुजरिया के लट बारम्बार

    ऐनक से करे रोज झगड़ा-तकरार

    बेयरिया के का हो गइल!

    चान मुअल लाश अइसन जल में दहाय

    महुआ के लोर भरल हाट में बिकाय

    लेहू पिअले लडके सेमर के फूल

    मौसम के कपड़ा में लंगटे बबूल

    नजरिया के का हो गइल!

    दूर-दूर रहे कबो अनचिन्हल अन्हार

    अब सबसे उहे नगीच के चिन्हार

    जिनगी दू-सांसन के डोर में टंगात

    कटल अस तिलंगी के हवा में पतात

    उमिरिया के का हो गइल!

    स्रोत :
    • पुस्तक : सुर में सब सुर (पृष्ठ 22)
    • रचनाकार : तैयब हुसैन पीड़ित
    • प्रकाशन : शब्द संसार, पटना
    • संस्करण : 2011

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