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इस पुल से गुज़रा कभी पूरा छायावाद

is pul se guzra kabhi pura chhayavad

ओम निश्चल

ओम निश्चल

इस पुल से गुज़रा कभी पूरा छायावाद

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    आज सुबह मन हो चला, चलें रसूलाबाद

    देखें कवि की आँख से नया इलाहाबाद।

    पुल गुहराता-सा हुआ आया बिल्कुल पास

    कहने लगा पधारिए हिय में भर उल्लास।

    फिर मुझसे कहने लगा कैसे थे वे लोग

    कैसा-कैसा था समाँ कैसे थे संयोग।

    इस पुल से गुज़रा कभी पूरा छायावाद

    क्या प्रसाद क्या पंत हों सबका मिला प्रसाद।

    कभी निराला जी दिखे जाते चुपचाप

    छोड़ गए हैं वे यहाँ पद-चापों की छाप।

    मैंने देखे पंत के क्या घुँघराले बाल

    क्या तो मीठे बैन थे क्या ही नैन विशाल।

    कभी गुज़रती कार में बैठे होते पंत

    उनके सारे फैन थे कितने तो श्रीमंत।

    मगर महादेवी सदा दिखती रहीं उदार

    आकर मेरे वक्ष को दुलरातीं हर बार।

    उमाकांत के गीत की क्या थी मादक गंध

    यहीं टहलते घूमते रच लेते थे छंद।

    यहीं कालिया जी कभी ममता जी के साथ

    आते थे मस्ती भरे और हिलाते हाथ।

    गंगा-जमुना का यही है उर्वर दो-आब

    यहीं बैठ वे लिख गए 'ग़ालिब छुटी शराब'।

    यहीं हरीशचंद्र पांडे आते यश के साथ

    मंद-मंद मुस्कान से पकड़े कवि का हाथ।

    मगर कोई कवि नित्य प्रति रहता मेरे साथ

    यश ही उसका नाम है उसे झुकाऊँ माथ।

    कवि के हिय में डोलती है इस पुल की पीर

    आँखें उस की ज्यों बिछी हों गंगा के तीर।

    इस पुल से वे देखते जीवन अगम अपार

    कोई भी पुल है नहीं जो पहुँचा दे पार।

    लेकर कविता लौटते पुल से वे हर बार

    आँखों में गंगा भरे और यमुना की धार।

    उनकी कविता फूटती ज्यों गंगा की धार

    'गंगातट' में ज्‍यों बसा है कवि का संसार।

    मेंहदौरी—'रामेश्वरम' है कवियों का धाम

    जहाँ मंत्र-सी गूँजती कविता आठो याम।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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