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आन्हर ई संसार

anhar ii sansar

सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

और अधिकसुधांशु ‘शेखर’ चौधरी

    राति अन्हरिया अन्हर बाटपर आन्हर संसार?

    कलुषित इच्छाकेर मोरीमे सह सह करै नङरिया,

    सद् इच्छा जिनगीक मोहारपर मारै छै ओंघरड़िया

    अकिलक ओर कतऽ भोतिआयल छै तकर किछु पता,

    अज्ञानक मेघक लपेटमे नुकल ज्ञान-बिजुलता।

    लटपटायल छै पाँखि सभक तँ करतै के उद्धार?

    राति अन्हरिया...अन्हर संसार।

    आइ वेगर्ताकेर पेठिग्रामे बढ़ल-चढ़ल छै हूलि,

    जकरा हाथ भरल छै ढौआ से सुख कीनय बूलि।

    भीतर खुक्ख घैल बासन तेँ ढनमनाइये सदिखन,

    भरल अशर्फीसँ कलसा की उनमुनाइये कौखन?

    जकर तराज़ू पासङ तकरे आइ चलै व्यापार।

    राति अन्हरिया...आन्हर संसार।

    सोझ न, जिनगी आइ बनल छै सतरंजक टा खेल,

    टेढ़ चालियेँ होइत रहै छै घोड़ा फर्जीक मेल।

    सोझ बात जे धरय, कहै तकरा सभ, अछि ढहलेल।

    सोझ बात जे बाजय, बूझल जाय सुद्ध, बकलेल,

    आजुक युगमे सुद्ध बुद्ध नहि, बुद्धू बनय हजार।

    राति अन्हरिया अन्हर बाटपर आन्हर संसार।

    स्रोत :
    • पुस्तक : गजल ओ गीत
    • रचनाकार : शेखर प्रकाशन, पटना
    • प्रकाशन : सुधांशु ‘शेखर’ चौधरी
    • संस्करण : 1991

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