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हम रोपी छप-छप-छप धान

hum ropi chhap chhap chhap dhaan

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

हम रोपी छप-छप-छप धान

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    झम-झम झमकय कारी बदरिया,

    हम रोपी छप-छप-छप धान हो बाबा।

    चम-चम-चम चमकय सोहागिन बिजुरिया

    गम-गम-गम गमकय परान।

    हो बाबा! हम रोपी छप-छप-छप धान॥

    अदरा बरसि गेल भरि भरि मौनी,

    पुरिबा लगौलक फेरो सुखौनी।

    उमड़ल सङे-सङ सटकल सङे-सङ

    कोसी कमला-बलान।

    हो बाबा! हम रोपी छप-छप-छप धान॥

    तोरो चढ़यबह हम बेलपतिया,

    भाङ पिअयबह पिसि भरि पथिया।

    हथियामे तोँ बाबा झपसी लगा दैह,

    बरखा हो अरिया नँघान।

    हो बाबा! हम रोपी छप-छप-छप धान॥

    बम-बम-बम कहि गालो बजबयह,

    अपनो नाचब, सङमे तोरो नचयबह।

    तोहेँ पशुपति छह पशु केर मालिक,

    हमहूँ छी छेहा किसान।

    हो बाबा! हम रोपी छप-छप-छप धान।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 304)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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