Font by Mehr Nastaliq Web

हाँ! ये कुरुक्षेत्र की नगरी

haan! ye kurukshetr ki nagri

ज्ञानवती सक्सेना

ज्ञानवती सक्सेना

हाँ! ये कुरुक्षेत्र की नगरी

ज्ञानवती सक्सेना

और अधिकज्ञानवती सक्सेना

    हाँ! ये कुरुक्षेत्र की नगरी

    सुनकर बिखर पड़ी हूँ

    नगर कोट कितनी ही सीढ़ी

    उतरी और चढ़ी हूँ

    कोई कहो कृष्ण से जाकर

    प्रीत-प्रिया आई है

    कहो कि बरसाने वाली की

    संध्या दुखदाई है

    कहो कि पतझर की वेला में

    लतिका मुरझाई है

    परस बिना घुटती स्वर-लहरी

    वंशी घबराई है

    जीवित रहने की हठ ठाने

    निज से बहुत लड़ी हूँ

    मेरे मोहन यहीं मिलेंगे

    ये सुनकर आई हूँ

    अंतिम समय नैन हरषेंगे

    इस कारण धाई हूँ

    सूखे वृक्ष हठात् गिरेंगे

    ख़ूब समझ पाई हूँ

    प्रिय काँधे मृत-देह धरेंगे

    इस पर ललचाई हूँ

    सिर से पग तक तब से अव तक

    पावन प्रीत मढ़ी हूँ

    कहो कि हारी-थकी-मरी-सी

    और नहीं चल सकती

    गगरी भर रह गई नदी मैं

    और नहीं ढल सकती

    बंधन कसते हुए काल को

    और नहीं छल सकती

    धर्मव्रती हो रही वर्तिका

    और नहीं जल सकती

    कोई कहो विजय माला की

    टूटी हुई लड़ी हूँ

    अमर प्रीत है लेकिन निष्ठुर

    साँसें अमर नहीं हैं

    घाट नदी के तीर्थ प्रलय की

    बाढ़े सुघर नहीं हैं

    संग रहे पर अंग परसे

    पावन अधर कहीं हैं?

    मात्र गंध से तृप्त रहें जो

    ऐसे भ्रमर कहीं हैं?

    जाने कैसे नियति धुरी पर

    उखड़ी हुई खड़ी हूँ

    स्रोत :
    • पुस्तक : राधा की अंतिम यात्रा (पृष्ठ 14)
    • रचनाकार : ज्ञानवती सक्सेना
    • प्रकाशन : श्रीमती लीला गुप्ता
    • संस्करण : 1999

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY