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गायक से

gayak se

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    सुनि-सुनि काँपि उठेला मोरा जियरा,

    दरद भरलि तोरी गीत।

    गवइया! दरद भरलि तोरी गीत॥

    सातों हि सुर से जनि तुँहुँ गइह,

    सूतल जिया मोरा जनि तूँ जगइह,

    हारलि बाजी पर जनि मुसुकइह,

    कबहूँ होइहनि जीत।

    गवइया! दरद भरलि तोरी गीत॥

    मनव भँवरा रे निति उठि धावे,

    उभरति कलिया से नेहियाँ लगावे,

    आखिर एक दिन बिरहा जरावे,

    आजु भइलि परतीत।

    गवइया! दरद भरलि तोरी गीत॥

    घायल जियरा कहलको माने,

    केहू मोरा आजु दरदियो जाने,

    दुरदिन में हो केहू ना पहिचाने,

    जगबा अइसन रीत।

    गवइया! दरद भरलि तोरी गीत॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 83)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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