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बरखा बहार

barkha bahar

भोलानाथ गहमरी

भोलानाथ गहमरी

बरखा बहार

भोलानाथ गहमरी

और अधिकभोलानाथ गहमरी

    मगन मन आइल बरखा बहार।

    मगन…

    ऊंचे अकसवा से बाजन बाजे,

    आवे बदरवा बिदेसवा से आजे,

    खोलति धरती दुआर;

    मगन मन आइल बरखा बहार।

    परत फुहार जुड़इली तपनियाँ,

    रिमि-झिमि बुनियाँ पर चढ़ली जवनियाँ,

    जेंब-जेंब ढरके असाढ़,

    मगन मन आइलि बरखा बहार।

    बाग बगइचा मन हरियाइल,

    तपती धरतिया के जियरा जुड़ाइल

    शीतल भइली बयार,

    मगन मन आइल बरखा बहार।

    छम-छम बुनियाँ पायल बाजे,

    घुमरि-घुमरि पुरवइया नाचे,

    नाचत जियरा हमार,

    मगन मन आइल बरखा बहार।

    उमड़ति नदिया नेहियाँ फंफाइलि,

    परत-परत परती जे अघाइलि,

    डुबि गइलें संबसे जवार,

    मगन मन आइल बरखा बहार।

    हरि-हरि चुनरी पहिरि फहरावे,

    जल दरपन, भुंइ मंगिया सजावे,

    सजि गइलें सोरहो सिंगार;

    मगन मन आइल बरखा बहार।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बयार पुरवइया (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : भोलानाथ गहमरी
    • प्रकाशन : भारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद
    • संस्करण : 1964

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