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अजनबी लागे नगरिया हो

ajnabi lage nagariya ho

ओम निश्चल

ओम निश्चल

अजनबी लागे नगरिया हो

ओम निश्चल

और अधिकओम निश्चल

    मिल भी जाओ सताओ

    पास आओ

    गुजरिया हो

    अजनबी लागे नगरिया हो।

    दिल की क्या औक़ात चकनाचूर है

    है पिया का गाँव कितनी दूर है

    रात दिन का कितना लंबा है सफ़र

    और दिल भी प्यार में मजबूर है

    ऐसे मत देखा करो मुझको

    लागि जाएगी नजरिया हो...

    अजनबी लागे नगरिया हो..

    कैसा बेसुध-सा मिला संसार है

    संकटों में ही हमेशा प्यार है

    बेवफ़ाई के हैं क़िस्से अनगिनत

    और यह जीवन हुआ अख़बार है

    धड़कनों से मेरे कुछ मत पूछिए

    बन जाए कल ख़बरिया हो।

    अजनबी लागे नगरिया हो।

    ताल्लुक़ के कितने झंझावात से

    हम गुज़र ही गए उल्कापात से

    देखता हूँ कितने लोगों को मगर

    बच पाए जो यहाँ आघात से

    कितने सौदेबाज़ियाँ संबंध में

    बन जाए यह बजरिया हो।

    अजनबी लागे नज़रिया हो।

    दूर हैं पर फिर भी कितने संग हैं

    ज़िंदगी में कितने सारे रंग हैं

    पास होकर भी मगर कुछ लोग हैं

    जो कि जीवन से बहुत निस्संग हैं

    ज़िंदगी को साधना होता है यों

    खो जाए फिर डगरिया हो।

    स्रोत :
    • रचनाकार : ओम निश्चल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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