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ककरा लेल जोगा रखने छी

kakra lel joga rakhne chhi

अमित पाठक

अमित पाठक

ककरा लेल जोगा रखने छी

अमित पाठक

और अधिकअमित पाठक

    कोमल तन रूप सुरेबगर

    ककरा लेल जोगा रखने छी

    घुरि एकहु बेर एम्हरो ताकू

    हमहुँ आश लगा रखने छी

    ककरा लेल जोगा...

    मोनमे बैसल छी, जेना मूरति कोनो

    जँचए ने हिरदयकेँ, आन सुरति कोनो

    प्यास पिरीतक जानि कखन धरि

    आबि मिझाएब अहाँ

    मद-मातल आएलि यौवन लए हम

    रातुक स्वप्न सजा रखने छी

    ककरा लेल जोगा...

    विधाता गढ़ि-गढ़िकेँ बनौलनि अहाँकेँ

    रूप-गुण गहि-गहिक' सजौलनि अहाँकेँ

    प्राण बसए अहींमे हम्मर

    जानए भरि दुनियाँ

    रैन-दिवस अहीक सुधिमे

    आँखिक निन्न बिला रखने छी

    ककरा लेल जोगा...

    सेहन्ता मोनक जे बाँहिमे भरि लीतहुँ

    प्रेमक सागरमे डूबि जिनगी जीतहुँ

    मोन कते परतारब कहू प्रिय

    ताकब कत् आशा

    दुरि सभक सोझाँ कएलहुँ फेर,

    लाजक घोघ खसा रखने छी

    ककरा लेल जोगा...।

    स्रोत :
    • पुस्तक : राग-उपराग (पृष्ठ 28)
    • रचनाकार : अमित पाठक
    • प्रकाशन : नवारम्भ
    • संस्करण : 2017

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