Font by Mehr Nastaliq Web

आदमी बा बहुते घवाइल

adami ba bahute ghavail

ब्रजभूषण मिश्र

ब्रजभूषण मिश्र

आदमी बा बहुते घवाइल

ब्रजभूषण मिश्र

और अधिकब्रजभूषण मिश्र

    बिन बियहल रह गइल सपना

    दुअरे बारात नाहीं आइल,

    घाव भले लउके, ना लउके;

    आदमी बा बहुते घवाइल।

    केकई के मन भरमावे,

    मंथरा के चल गइल बा मंतर,

    पटकाइल दाव में बा दशरथ,

    राम भरत में बा अंतर।

    सभे केहू बाटे सँकाइल,

    सभे केहू बाटे चिहाइल।

    बान्ह बन्हा गइल बा ओनहीं

    इहाँ तक नदी बा सुखाइल,

    धूप में जेठ के जलन बा

    छाँह बाटे कतहीं घेराइल;

    गायब बा भीतर के कागद,

    खाली लिफाफा बा आइल।

    जहाँ-तहाँ टूटल सड़क बा,

    नदी पर पुल बन सकल,

    कहाँ मिट सकल बाटे दूरी

    मन से ना मन मिल सकल;

    इहाँ-उहाँ ठोकर पर ठोकर,

    मुँहकुरिये सभे भहराइल।

    अंतरा के ओटे में सुबके,

    बहरा हँसे के जतन,

    अँगना लगल गम के मेला,

    दुअरा मनेला जसन;

    एतना ना चेहरा बदलल,

    दरपन में मुँह ना चिन्हाइल।

    स्रोत :
    • पुस्तक : खरकत जमीन बजरत आसमान (पृष्ठ 92)
    • रचनाकार : ब्रजभूषण मिश्र
    • प्रकाशन : वनांचल प्रकाशन, तेनुघाट (बोकारो)
    • संस्करण : 2015

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY