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आइल फिर 26 जनउरी

aail phir 26 janauri

रामजियावान दास ‘बावला’

रामजियावान दास ‘बावला’

आइल फिर 26 जनउरी

रामजियावान दास ‘बावला’

और अधिकरामजियावान दास ‘बावला’

    आइलि बा छब्बीस जनउरी कच्चा पक्का छान्हि लगउरी, ध्वजा तिरंगा फहरैला।

    उमड़लि जन मानस के गंगा ध्वजा तिरंगा फहरैला।

    ऋतु मधुमास करै अगुवानी भँवरा बीन बजावै।

    तितिलिन रंग गइल पिछौरी कोयल कूकत गावै।

    रसगुल्ला नेवता दिहलस ले लिहलस मोर चोखा भउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    राम राज के कइलस हल्ला। लगल बुझावै टल्ला वल्ला।

    आवैले हर साल दउर के बाकी बा अबहीं कुछ अउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    हिन्दू मुसलिम सिक्ख इसाई। आपस में सब भाई-भाई।

    इहै कहत जुग बीतल जाला भइल एकता सरकन सउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    जरत बा घर सब सेकैं हाथ। केहू देला केहू साथ।

    राजनीति विष बोइ बोइ समुझाइ रहल बा अउरी तउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    झंडा फहर फहर सियराला। भगत बिलरिया फेरै माला।

    सम्प्रदाय छीना झपटी उथल पुथल बा चउरी चउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    सुरूजु उगै फिर भी अन्हियारी। अपने घर में चलै कटारी।

    सत्य अहिंसा भूल भूलइया। लोक तंत्र फटल पिछउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    जन मत भटकल बाग पँड़हरू। चोरन के पाँती में पहरू।

    कइसन जनतंत्र बाबा कवने देव करीं चिरउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    समझ पाईं कइसन माया। धूप कहीं बा कहीं बा छाया।

    कुरबानी बेकार हो गइल उठा रखलैं गनपत गउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    स्वागत में हम लगल रहीला। जइसन आवै समय सहीला।

    अबौं बावला छूटल नाहीं माँग माँग के खाब बिधउरी।

    आइल फिर 26 जनउरी॥

    स्रोत :
    • पुस्तक : गीतलोक (पृष्ठ 119)
    • रचनाकार : रामजियावान दास ‘बावला’
    • प्रकाशन : सेवक प्रकाशन, वाराणसी
    • संस्करण : 1997

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