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आब न हर परतारिअ

aab na har partaria

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

आब न हर परतारिअ

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    आब हर! परतारिअ, भवसँ तारिअ हे,

    दगधल मन बहटारिअ, बूझि टारिअ हे।

    हमर हृदय बड़ हलचल, हिअ बिच हल चल हे,

    थाकल पद दुहु निर्बल, संग संबल हे।

    रहलहुँ दुखक झमारल, विपतिक मारल हे,

    जीवन जीबि बिगाड़ल मन नहि गाड़ल हे।

    अपनहिँ आगि पजारल, सब सुख जारल हे,

    आदि भेल सम्हारल, पौरुष हारल हे।

    मन लहरल, हिअ हहरल, लोचन झहरल हे,

    हर हरल दुख देखल, खल हँस खलखल हे।

    विषय विषहि मन बाँटल, बाट सूझय हे,

    बिलटल लटल-बुड़ल मति, बात बूझय हे।

    मन-नभ दुख-घन छारल, पकड़ि पछाड़ल हे,

    साहल सन्मति दूरहि, कुमति बेसाहल हे।

    'अमर' सुयश पद गाओल आश लगाओल हे,

    शिवक शरण गहि सेवल, से बल पाओल हे।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 303)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

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