चैत हे सखि फुललि बेली विकसु कुंज नेवार यौ
chait he sakhi phulali beli vikasu kunj nevar yau
(बारहमासा)
चैत हे सखि फुललि बेली विकसु कुंज नेवार यौ
तेजि मोहन गेल मधुपर हमर कोन अपराध यौ।
बैसाख हे सखि उषम ज्वाला घामसँ भिजल शरीर यौ,
रगड़ि चन्दन अंग लेपितहुँ गृहे रहितथि जौं कन्त यौ।
जेठ हे सखि हेठ बरषा श्याम गेल परदेश यौ,
सुमिरि हरि गुण जीव तरसय नयन झहरय नीर यौ।
असाढ़ हे सखि बुन्द बरिसत दादुर शब्द सुनाब यौ,
मोर जीव नहि थिर एक छन पहु भेल कठिन कठोर यौ।
साओन हे सखि सर्व सोहावन कोइली कुहुके मयूर यौ,
नयन ढरि-ढरि भिजय साड़ी दादुर रंग मचाव यौ।
भादब हे सखि रैन भयावनि कतेक सोचब दिन-राति यौ,
ककरा लग हम ठाढ़ि होयब के कहत नीक बात यौ।
आसिन हे सखि लिखब पाँती मोहन निकट पठायब यौ,
अपन बिनती कहब हरिसँ चहु दिशि खबरि जनायब यौ।
कार्तिक हे सखि छल मनोरथ आओत नन्द गोपाल यौ,
अगहन हे सखि उपजल सारि भाँति भाँतिक धान यौ,
सीस डोलय मदन दमकय तैयो ने आयल कन्त यौ।
पूस हे सखि जाड़ आयल पहु बिनु जाड़ न जाय यौ,
सगर रैन हम बैसि गमाओल कखन होयत आब परात यौ।
माघ हे सखि कान्ह कामरू मुरली टेरय नन्दलाल यौ,
चलहु सखि सब घाट जमुना होयब कदम तर ठाढ़ि यौ।
फागुन हे सखि खेलय होरी उड़य रंग गुलाब यौ,
अबीर अबरख धए जौं रखितहुँ कृष्ण संग जे केलि यौ।
- पुस्तक : मैथिली लोकगीत (पृष्ठ 364)
- संपादक : अणिमा सिंह
- प्रकाशन : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
- संस्करण : 1993
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