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अब ना होवी यार किसी के

ab na howi yar kisi ke

ईसुरी

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ईसुरी

अब ना होवी यार किसी के

ईसुरी

और अधिकईसुरी

    अब ना होवी यार किसी के!

    जनम जनम खों सीके!

    यार करे में बड़ी बिबूचन, बिन यार के नीके॥

    निठुआँ ज्वाप दै दऔ उनने, हते जीके नीके॥

    नेकी करतन समजें रहयौ, जे फल पाए बदी के॥

    मानुस जनम करौ ना ‘ईसुर’ पथरा करौ नदी के॥

    अब हम किसी से यारी नहीं करेंगे। जनम-भर के लिए सीख गए। यार बनाने में बड़ा झंझट है। बिना यार के ही अच्छे। उसने साफ़ जवाब दे दिया। वह बहुत ख़राब निकला। समझ लो कि नेकी करने में बदी के फल मिलते हैं। ईसुरी को अब मनुष्य कभी बनाना। इससे तो नदी के पत्थर ही भले।

    स्रोत :
    • पुस्तक : ईसुरी की फागें (पृष्ठ 278)
    • संपादक : घनश्याम कश्यप
    • प्रकाशन : शब्दपीठ
    • संस्करण : 1995

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