उत्तम जन की होड़ करि
uttam jan ki hoD kari
उत्तम जन की होड़ करि नीच न होत रसाल।
कौवा कैसे चल सकै राजहंस की चाल॥
भावार्थ: कवि कहता है कि उत्तम जनों से प्रतिस्पर्धा रखने पर नीच व्यक्ति उनकी तरह सहृदय नहीं बन सकता। जैसे जिस तरह राजहंस चलता है, वैसी चाल लाख कोशिश करने पर भी कौवा नहीं चल सकता। भाव यह है कि नीच व्यक्ति श्रेष्ठ जन बनने की होड़ तो करता है, परंतु उसका स्वभाव सदैव नीच ही रहता है। इस कारण वह लाख कोशिश करने पर भी रसाल (आम) की तरह सरस−मधुर अर्थात् सरल−व्यवहारशील नहीं बन पाता है।
- पुस्तक : सतसई सप्तक (पृष्ठ 296)
- संपादक : श्यामसुंदर दास
- प्रकाशन : हिंदुस्तानी एकेडमी
- संस्करण : 1931
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