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उपकारी उपकार जग

upkari upkar jag

वृंद

वृंद

उपकारी उपकार जग

वृंद

और अधिकवृंद

    उपकारी उपकार जग सबसे करत प्रकास।

    क्यों कटु मधुरे तरु मलय मलयज करत सुबास॥

    भावार्थ: कवि कहते हैं कि उपकारी व्यक्ति अपने उपकारों के माध्यम से सबके मन को प्रसन्न करता रहता है। किसी के भी मन में उसके कार्यों के कारण खिन्नता का भाव नहीं जागता है। उसकी उपकारिता उसी प्रकार सबके मन को अह्वादित करती है जिस प्रकार मलय पर्वत के निकट रहने वाले बुरे और अच्छे सभी पेड़ मलयाचल की वायु से सुवासित रहते हैं, अर्थात् मलयाचल की वायु सभी को सुवासित करती है।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सतसई सप्तक (पृष्ठ 289)
    • संपादक : श्यामसुंदर दास
    • प्रकाशन : हिंदुस्तानी एकेडमी
    • संस्करण : 1931

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