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मैं समुइयौ निरधार

main samuiyau nirdhar

बिहारी

बिहारी

मैं समुइयौ निरधार

बिहारी

और अधिकबिहारी

    मैं समुइयौ निरधार, यह जग काँचो काँच सौ।

    एकै रूपु अपार प्रतिबिंबित लखियतु जहाँ॥

    मैंने तो इस संसार को काँच के समान कच्चा और नश्वर समझा था लेकिन इस सृष्टि के विविध रूप में एक ही के तत्व के अनेक रूप झलकते हैं। ब्रह्म ज्ञानी और अद्वैतवादी कहता है कि मैंने तो यह समझा था कि वह संसार कच्चे काँच के समान है जिसमें एक ही ईश्वर का रूप अनंत रूपों में प्रतिबिंबित होता है अर्थात् सृष्टि के समस्त पदार्थ एक ही ईश्वर के अनंत रूप हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : बीहारी सतसई (पृष्ठ 275)
    • रचनाकार : डॉ. हरिचरण शर्मा
    • प्रकाशन : श्याम प्रकाशन
    • संस्करण : 2007

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