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आत्मकथ्य

आत्मकथा भोगे हुए जीवन का आत्मावलोकन करते हुए स्वयं के जीवन के मूल्यांकन की साहित्यिक विधा है। यह स्वयं की कथा के आश्रय से मनुष्य जीवन की जटिलता और रहस्यात्मकता, हर्ष-विषाद, जय-पराजय और आपबीती-जगबीती की संश्लिष्ट दुनिया से साक्षात्कार का उपक्रम है। वर्ण्य-विषय, चरित्र-चित्रण, देशकाल, उद्देश्य और भाषा-शैली इसके पाँच प्रमुख तत्त्व माने गए हैं। सत्यकथन, तथ्यात्मकता, अनुभूति-प्रवणता, मौलिकता, उदात्तता, समन्वय, सुसूत्रता आदि इसके प्रमुख गुण हैं। स्त्री, दलित और हाशिए के अन्य वर्गों की आत्मकथाओं के साथ इस विधा ने संवाद और विमर्श के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्त्व प्राप्त कर लिया है।

1911 -1987

समादृत कवि-कथाकार-अनुवादक और संपादक। भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित।

1884 -1941

समादृत आलोचक, निबंधकार, साहित्य-इतिहासकार, कोशकार और अनुवादक। हिंदी साहित्य के इतिहास और आलोचना को व्यवस्थित रूप प्रदान करने के लिए प्रतिष्ठित।

1950 -2013

नवें दशक में उभरे कवि-गद्यकार। दलित-संवेदना और सरोकारों के लिए उल्लेखनीय।

हिंदी संस्मरण साहित्य में योगदान। ‘वरदान’ कृति के लिए उल्लेखनीय।

1926 -1997

समादृत कवि-कथाकार और अनुवादक। ‘धर्मयुग’ साप्ताहिक के संपादक के रूप में भी चर्चित।

1897 -1973

हिंदी भाषा के पहले वैज्ञानिक इतिहासकार के रूप में समादृत। ‘हिंदी विश्वकोश’ और ‘हिंदी साहित्य कोश’ के संपादन में योगदान।

1891 -1932

द्विवेदी युग के सुपरिचित व्यंग्यकार, नाटककार और पत्रकार। बालसखा’ पत्रिका के संस्थापक-संपादक के रूप में योगदान।

1931 -2021

‘नई कहानी’ की स्त्री-त्रयी की समादृत कथाकार। ‘आपका बंटी’ के लिए बहुप्रशंसित।

1873 -1953

नागरी प्रचारिणी सभा के संस्थापक सदस्य और सभापति। भारतेंदु युग में साहित्यिक योगदान के लिए उल्लेखनीय।

1931

प्रगतिशील धारा से संबद्ध प्रमुख आलोचक और कवि। संस्मरण विधा में भी योगदान।

1893 -1963

द्विवेदीयुगीन प्रमुख उपन्यासकार, कथाकार और संपादक। पद्म भूषण से सम्मानित।