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दयानंद सरस्वती

1824 - 1883 | टंकारा, गुजरात

आर्य समाज के संस्थापक और हिंदू पुनर्जागरण के प्रमुख विचारक।

आर्य समाज के संस्थापक और हिंदू पुनर्जागरण के प्रमुख विचारक।

दयानंद सरस्वती की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 28

सब स्त्री और पुरुष अर्थात् मनुष्य मात्र को पढ़ने का अधिकार है।

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जब विद्वान लोगों में सत्या-असत्य का निश्चय नहीं होता; तभी अविद्वानों को महाअंधकार में पड़ कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिए सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ-मित्रता से वाद वा लेख करना, हमारी मनुष्यजाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी हो।

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जैसे पशु बलवान् होकर निर्बलों को दुःख देते और मार भी डालते हैं। जब मनुष्य शरीर पा कर वैसा ही कर्म करते हैं, तो वे मनुष्य स्वभावयुक्त नहीं, किंतु पशुवत् हैं। और जो बलवान् होकर निर्बलों की रक्षा करता है, वही मनुष्य कहाता है और जो स्वार्थवश होकर परहानि मात्र करता रहता है, वह जानो पशुओं का भी बड़ा भाई है।

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जब तक इस मनुष्य जाति में परस्पर मिथ्या मतमतांतर का विरुद्ध वाद छूटेगा, तब तक अन्योऽन्य को आनंद होगा।

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जो वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता। विद्यमान जीव का अभाव नहीं हो सकता। देह भस्म हो जाता है, जीव नहीं।

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