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आचार्य क्षितिमोहन सेन

1880 - 1960 | वाराणसी, उत्तर प्रदेश

मध्यकालीन साहित्यमर्मज्ञ के रूप में समादृत साहित्यकार।

मध्यकालीन साहित्यमर्मज्ञ के रूप में समादृत साहित्यकार।

आचार्य क्षितिमोहन सेन की संपूर्ण रचनाएँ

उद्धरण 27

जितने दिन तक मनुष्य कर्मकांड और सांप्रदायिक ज्ञान से मुक्त नहीं होता, उतने दिन तक वह सर्वमानव के उपयुक्त नहीं होता।

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प्रेम-मिलन में वर और कन्या दोनों ही परस्पर के पूरक हैं। तुलना की तो वहाँ पर बात ही नहीं उठती, वहाँ दोनों ही—'वागर्थाविव सम्स्पृक्तौ—वाणी और अर्थ की तरह मिले हुए हैं।

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संसार में सांप्रदायिक सत्य, दलगत सत्य प्रभृति नाना प्रकार के संकीर्ण सत्य नामक सत्य नहीं है। सर्वसत्य का एकमात्र परख है—उसकी सार्वभौमिकता।

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जिस प्रकार गंगा की धारा को पर्वत-प्रदेशीय, या उत्तरप्रदेशीय या बिहारी, या बंगाली कहना निरर्थक है, उसी प्रकार सत्य, धर्म और संस्कृति प्रभृति महासंपद् भी अविच्छेद्य और सीमातीत है।

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अंतर में जो ऐक्य है, जो योग है, उसमें ही परमानंद है। इसको प्राप्त करना ही यथार्थ ज्ञान है।

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