इकाई 3 : हिंदी भाषा की विविध भूमिकाएँ
ikai 3 ha hindi bhasha ki vividh bhumikayen
मुकेश अग्रवाल
Mukesh Aggarwal
इकाई 3 : हिंदी भाषा की विविध भूमिकाएँ
ikai 3 ha hindi bhasha ki vividh bhumikayen
Mukesh Aggarwal
मुकेश अग्रवाल
और अधिकमुकेश अग्रवाल
हिंदी के विविध रूप
संपर्क भाषा
संपर्क भाषा शब्द का प्रयोग अँग्रेज़ी के लिंग्वा फेंका (Lingua franca) के प्रतिशब्द के रूप में किया जाता है। 'लिंग्वा फ्रैंका' से तात्पर्य है लोक बोली अथवा सामान्य बोली। जिस भाषा के माध्यम से एक क्षेत्र के लोग देश के अन्य क्षेत्रों के निवासियों से अथवा एक भाषा के बोलनेवाले लोग अन्य भाषा-भाषियों से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, संपर्क करते हैं, संपर्क बनाए रख सकते है। उसे 'लिंग्वा फ्रेंका' अथवा 'संपर्क भाषा' कहा जाता है।
भारत विभिन्नताओं का देश है। यहाँ भाषाओं की संख्या सैकड़ों में है। बाईस भाषाएँ तो संविधान की अष्टम सूची में ही उल्लिखित हैं। इस दृष्टि से यहाँ संपर्क भाषा का विशेष महत्त्व है। भारत के इतिहास का अवगाहन करें तो हम पाते हैं कि यहाँ युगों से 'मध्य देश' की भाषा सारे देश की माध्यम भाषा अथवा संपर्क भाषा रही है। संस्कृत, पालि अथवा प्राकृत किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं थीं। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के अनुसार यास्क के समय में संस्कृत उत्तर में कंबोज (मध्य एशिया के पामीर पर्वत के निकट) से लेकर दक्षिण में अश्मक (गोदावरी प्रदेश) तक तथा पश्चिम में कच्छ से लेकर पूर्व में कलिंग के सूरमस (असम की सूरमस नदी) प्रदेश तक बोली जाती थी (पाणिनी और उसका शास्त्र)। पाणिनी के समय तक भी संस्कृत के प्रसार का यह क्षेत्र लगभग इतना ही था। पाणिनी ने प्राच्य-शरावती के दक्षिण पूर्व कलिंग-बंग तक—उदीच्य—शरावती के पश्चिमोत्तर से गांधार तक के विस्तृत भू भाग की भाषा को शिष्ट एवं व्याकरण सम्मत भाषा कहा है।
पतंजलि के समय तक यद्यपि शकों, यवनों आदि की विजयों के कारण उत्तर में आर्यों का क्षेत्र सीमित हो चला था पर संस्कृत का क्षेत्र दक्षिण तक जा पहुँचा था।
तमिलभाषी प्रदेश में 200 ई. से ही संस्कृत राजभाषा के रूप में स्वीकार कर ली गई थी। शिक्षा-दीक्षा, प्रशासकीय और सांस्कृतिक कार्यों में ही नहीं वरन् शिष्ट काव्य और शास्त्रों के प्रणयन में भी संस्कृत भाषा का प्रयोग होने लगा था। स्पष्ट है कि तमिल प्रदेश ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था।
हिंदी को संस्कृत की यह परंपरा विरासत के रूप में मिली है। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित के अनुसार, गौतम बुद्ध से लेकर मध्यकाल तक के सभी शासकों, संतों व समाज-सुधारकों ने जनसंपर्क के लिए जनभाषा का उपयोग किया है। बुद्ध और अशोक ने संस्कृत को 'अपर्याप्त समझकर जनभाषा पालि का उपयोग किया।' हिंदी साहित्य का आरंभ करने वाले सिद्धों, जैनियों और नाथपंथी योगियों ने आठवीं से बारहवीं शताब्दी तक समस्त भारत में घूम-घूमकर एक ऐसी संपर्क भाषा का विकास किया, जिसमें भारत की सभी भाषाओं के बहुप्रचलित शब्दों के लिए प्रवेश द्वार खुला हुआ था। यह समन्वित भाषा थी हिंदी।
हिंदी अपने उद्भव के समय से ही हिंदू-मुस्लिम, पूर्व-पश्चिम तथा उत्तर-दक्षिण को जोड़ने वाली कड़ी रही है। शंकराचार्य और रामानंद ने संपूर्ण भारत में भ्रमण कर हिंदी के विकास विस्तार में अपना पूर्ण सहयोग दिया। आदिकाल में हिंदी का अधिकांश साहित्य हिंदी क्षेत्र के बाहर ही लिखा गया है। स्वयंभू के 'पउमचरिउ' की रचना महाराष्ट्र और कर्नाटक में हुई, तो अब्दुर्रहमान ने 'संदेशरासक' पंजाब में लिखा। सिद्ध साहित्य पूर्व, नाथ साहित्य पश्चिम में और पर्याप्त भक्ति साहित्य उड़ीसा, असम, महाराष्ट्र तथा गुजरात में लिखा गया है।
मध्यकाल तो हिंदी विकास और अन्य क्षेत्रों से संपर्क का काल रहा है। इस काल में दक्षिण के आचार्यों—बल्लभाचार्य, रामानुज, निंबार्क, रामानंद आदि ने संपर्क-भाषा के महत्त्व को समझा और भरसक इसे संप्रेषण का माध्यम बनाया। दक्षिण में राष्ट्रकूटों और यादवों के राज्य में हिंदी का प्रचार हुआ। विजयनगर दरबार में हिंदी को विशिष्ट स्थान प्राप्त था। मछलीपट्टम के नादेल्ल पुरुषोत्तम कवि ने बत्तीस हिंदी नाटकों की रचना की। अलाउद्दीन की दक्षिण विजय तथा मुहम्मद तुग़लक़ के राजधानी परिवर्तन से वहाँ दक्कनी हिंदी का उदय हुआ। अहमद नगर, बीजापुर, गोलकुंड, बीदर आदि इसके केंद्र बने। ख़्वाजा बंदानेवाज गेसूदराज, मुल्लावजही (कुतुबमुश्तरी), शाह मीराबी, कुतुबशाह आदि वहाँ अनेक कवि-लेखक हुए। (सूर्य प्रसाद दीक्षित)
क्षेत्रवार दृष्टि डाले तो मध्यकाल में ब्रजभाषा के सार्वदेशिक प्रसार को देखा जा सकता है। बंगाल, असम, उड़ीसा, केरल, आंध्र सर्वत्र हिंदी साहित्य की रचना हुई है। बंगाल के वैष्णव कवि बलदेवदास लिखते हैं—
जय जय मंगल आरति दुहुंकि।
श्याम गोरि छवि उठत झझकि।
असम के कवि शंकर देव की एक रचना का अंश देखिए—
अधिर धन जन जीवन यौवन अथिर अहुं संसार।
पुत्र परिवार सबहि असार करबे के हरिसार।
आंध्र प्रदेश में हिंदी में काव्य-रचना का सर्वप्रथम रूप हमें तंजावूर के भोंसल अशीय मराठा शासक शाह जी महाराज के यक्षगानों में मिलता है। एक उदाहरण देखिए—
सुन सखी पिउ मेरो कहां, नैना दोऊ देखें चाहें।
धीर धरूं सखि कैसे के, मन में सहे बिना रहा न जाय॥
चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में जिस दक्खिनी भाषा का अस्तित्व पाया जाता है, वह भी खड़ी बोली हिंदी का ही एक रूप है। दक्खिनी के प्रारंभिक हित्यकार ख़्वाजा बंदानवाज गेसूदराज (1318-1430 ई.) की 'मिराजल आशिकीन' को दक्खिनी गद्य ही नहीं, खड़ी बोली गद्य की भी पहली रचना स्वीकार किया जाता है। खड़ी बोली, अरबी-फ़ारसी और दक्षिणी भाषाओं के मिश्रण से इस भाषा ने भी उत्तर और दक्षिण के बीच एक कड़ी का काम किया है।
केरल की भाषा मलयालम शब्दावली की दृष्टि से अन्य द्रविड़ भाषाओं की तुलना में हिंदी के अधिक निकट स्वीकार की जाती है। केरल में तिरु विनांकुर के राजा तिरुनाल श्री राम वर्मा ने ब्रजभाषा में अनेक पदों की रचना की है—
रामचन्द्र प्रभु! तुम बिन और कौन खबर ले मोरी।
बाज रही जिनकी नगरी मों सदा धरम की भेरी।
जाके चरण कमल की रज से तिरिया तन कूं फेरो।
और न के कछु और भरोसा हमें भरोसा तेरो।
महाराष्ट्र में नाथ योगियों, महानुभाव संप्रदाय, विठ्ठल संप्रदाय आदि ने हिंदी के प्रचार में पर्याप्त रुचि ली है। शिवाजी तथा उनके पुत्र शंभा जी हिंदी के प्रबल समर्थक थे। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और संत नामदेव की रचनाओं में हिंदी के भी अनेक पद्य मिलते हैं—
जागो हो गोपाल लाल जसुदा बलि आई,
उठो तात प्रात भयो, रजनि को तिमिर गयो,
टेरत सब ग्वाल बाल मोहना कन्हाई।
गुजरात इस दृष्टि से किसी से कम नहीं है। नरसी मेहता और दयाराम गुजरात के ही कवि हैं जिनकी हिंदी रचनाएँ आज भी प्रसिद्ध हैं। मीरा की जन्मस्थली गुजरात है। अष्टछाप के कवि कृष्णदास जी की भूमि भी गुजरात थी। महेरावण सह ने डिंगल मिश्रित ब्रज में 'प्रवीण सागर' महाकाव्य की रचना की। यहाँ अनेक विद्यालयों में हिंदी का अध्ययन होता था तथा अन्य अनेक मौलिक हिंदी ग्रंथों की भी रचना हुई।
पंजाब तो हिंदी क्षेत्र का पड़ोसी ही है। हिंदी और पंजाबी क्षेत्र के लोगों का एक-दूसरे के क्षेत्र में जाना सहज रहा है। दोनों भाषाओं ने एक-दूसरे को दूर तक प्रभावित किया है। पंजाब के गुरु गोविंद सिंह की गिनती हिंदी के मूर्धन्य कवियों में होती है। मिर्ज़ा खाँ ने भी 'तुहफतुल हिंद' में ब्रजभाषा के काव्यशास्त्र का प्रतिपादन किया है।
इसी प्रकार भारत के पूर्वी क्षेत्रों बंगाल, उडीसा आदि में हिंदी का पर्याप्त प्रचार-प्रसार रहा है। सनीति कुमार चटर्जी के अनुसार 1575 ई. में बंगाल से पठान राज्य की समाप्ति के बाद व मुग़ल राज्य के प्रसार के साथ बंगाल में हिंदी को बढ़ावा मिला। उड़ीसा में हिंदी का प्रवेश भक्ति कविता के माध्यम से हुआ। राय रामानंद (15वीं सदी), जगन्नाथ दास, वंशीलाल मिश्र, ब्रजनाथ बड़जेना, रामदास, कविचंद्र नरसिंह राय गुरु आदि इस क्षेत्र के प्रमुख हिंदी कवि रहे हैं।
हिंदी के अन्य भाषा-भाषी क्षेत्रों से संपर्क की यह कड़ी आधुनिक काल में और मज़बूत हुई है। अँग्रेज़ी के विरुद्ध स्वाधीनता संग्राम में हिंदी ने ही सभी क्षेत्रों में जाकर राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करने का कार्य किया है। हिंदीतर क्षेत्रों के स्वाधीनता सेनानियों, नेताओं, भाषाविदों, साहित्यकारों सभी ने एकमत से हिंदी को राष्ट्रभाषा स्वीकार करते हुए सभी क्षेत्रों के निवासियों को हिंदी में काम और बात करने की प्रोत्साहित किया। सन् 1826 ई. में हिंदी का पहला समाचार पत्र 'उदंत मार्तंड' बंगाल के कोलकाता से प्रकाशित हुआ। एम. ए. हिंदी का पाठ्यक्रम भी सबसे पहले कोलकाता विश्वविद्यालय में प्रारंभ हुआ।
हिंदी के अनेक प्रमुख रचनाकार ग़ैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के रहे हैं। हिंदुओं के अनेक प्रमुख तीर्थ अहिंदी भाषी क्षेत्रों में ही है। द्वारका पुरी, रामेश्वरम् और जगन्नाथपुरी में प्रतिदिन हज़ारों तीर्थ यात्री जाते हैं और हिंदी के माध्यम से व्यवहार करते हैं। अहिंदी भाषी क्षेत्रों के हज़ारों लोग प्रतिदिन हिंदी भाषी क्षेत्रों में तीर्थों में आते हैं और उनके लिए भी हिंदी संपर्क भाषा का काम करती है। यही स्थिति व्यापार के क्षेत्र की भी है। हिंदी और अहिंदी क्षेत्रों के निवासी एक-दूसरे के क्षेत्रों में जाकर हिंदी के माध्यम से ही संपर्क करते हैं। कुछ लोगों को लगता है कि अँग्रेज़ी ही संपर्क का काम करती है तथा कर सकती है। परंतु यह धारणा सही नहीं है। आज भी देश में अँग्रेज़ी बोलने वाले दो-तीन प्रतिशत से अधिक नहीं हैं। गाँधी जी कहते थे, विभिन्न प्रदेशों में अँग्रेज़ी बोलने वाले लोग काफ़ी मिल जाते हैं, किंतु उनकी संख्या बहुत ही थोड़ी है और हमेशा थोड़ी ही रहेगी। इसका मुख्य कारण यह है कि यह भाषा कठिन और विदेशी है। साधारण मनुष्य इसे ग्रहण नहीं कर सकता। इसलिए यह संभव नहीं कि अँग्रेज़ी के ज़रिए भारत एक राष्ट्र बन जाए। अतः भारतीयों को भारत की ही कोई भाषा पसंद करनी होगी।
हिंदी को संपर्क भाषा बनाने में बॉलीवुड का बहुत बड़ा हाथ रहा है। हिंदी फ़िल्मों का सबसे अधिक निर्माण महाराष्ट्र की मुंबई नगरी में होता है। मुंबई व्यापार का भी गढ़ है। रेडियो और टी. वी. के माध्यम से भी हिंदी का प्रसार हुआ है और सारे भारत के लोग हिंदी को थोड़ा-बहुत जानते-समझते हैं। दिल्ली में ही लगभग पूरे भारत के लोग एक साथ रहते हैं और हिंदी के माध्यम से अपने सारे कार्य निपटाते हैं। गुजरात का तो हिंदी प्रचार में विशेष योगदान रहा है। गाँधी जी, स्वामी दयानंद सरस्वती आदि के बाद आजकल मोरारी बापू आदि अनेक गुजराती संत हिंदी में अपनी कथाओं और प्रवचनों के माध्यम से संपूर्ण भारत के लिए संपर्क सूत्र बने हुए हैं।
यदि आँकड़ों पर दृष्टि डाले तो भी यही स्पष्ट होता है कि हिंदी ही भारत की एकमात्र संपर्क भाषा है। लगभग संपूर्ण भारतवर्ष में हिंदी को जानने और बोलने वाले बड़ी संख्या में हैं। 1991 की जनगणना के अनुसार अहिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी जानने की संख्या इस प्रकार है—जम्मू एवं कश्मीर 90%, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, चंडीगढ़, 80%, गोवा 70%, दीव व दमण 65%, दादरा एवं नगर हवेली, पं. बंगाल, सिक्किम, उड़ीसा 60%, असम 50%, कर्नाटक 45%, आंध्र प्रदेश 40%, केरल, मिज़ोरम 35%, अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय 30%, नागालैंड, त्रिपुरा, लक्षद्वीप 25% पांडिचेरी, तमिलनाडु 20%। हिंदी भाषी क्षेत्रों बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश दिल्ली तथा अंडमान-निकोबार में तो 100% लोग हिंदी जानते ही हैं। इस प्रकार संपूर्ण भारत में हिंदी जानने वालों की संख्या 73.31% प्रतिशत है। हिंदी के संपर्क भाषा होने का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है।
संपर्क भाषा राष्ट्रभाषा से एक अर्थ में भिन्न होती है। राष्ट्रभाषा में भाषा के मानक रूप को महत्त्व दिया जाता है, परंतु संपर्क भाषा दो भिन्न भाषा-भाषियों के मध्य सेतु का काम करती है। इसका एकमात्र उद्देश्य अपनी बात को दूसरे तक संप्रेषित करना होता है, अतः इसमें अनगढ़ता, व्याकरण दोष और अन्य भाषाओं का मिश्रण स्वाभाविक है। संपर्क भाषा हिंदी भी इससे अछूती नहीं है। इसमें भारत की अनेक भाषाओं के शब्दों का समावेश हुआ है। हिंदी में बंगाली, पंजाबी, गुजराती, मराठी, तमिल, मलयालम आदि भाषाओं से अनेकानेक शब्दों को ग्रहण किया है। यह हिंदी की सार्वदेशिकता और संपर्क भाषा के रूप में उसकी क्षमता का परिचायक है।
डॉ. सुनीति कुमार चटर्जी ने कलकत्ता सम्मेलन में स्वागताध्यक्ष के रूप में अपने भाषण में कहा था, चूँकि हिंदी को सबसे अधिक संख्यक भारतीय लोग समझ लेते हैं, चाहे इसके टूटे-फूटे बाज़ारू रूप में या पछाही मुहावरों के मुताबिक़ इसके शुद्ध हिंदी रूप में। क्योंकि सबसे अधिक संख्या के लोग इसे बोल सकते है और चूँकि उत्तर भारत के विभिन्न प्रांतों की भाषा और साहित्य की धाराएँ नदियों की तरह कई सदियों से हिंदी के सागर में समाती हैं, इसलिए हिंदी को आधुनिक भारत की भाषाओं में Primus into pares अर्थात् 'समानों में प्रथम' और representative speech of modern India अर्थात् आधुनिक भारत की प्रमुख बोली मानना पड़ेगा।
हिंदी के संदर्भ में डॉ. चटर्जी का उपर्युक्त मत आज भी शत प्रतिशत सही है। हिंदी आधुनिक भारत की सर्वप्रमुख भाषा है, राजभाषा है और राष्ट्रभाषा है। भारत की एकमात्र संपर्क भाषा तो वह है ही और इसे यहाँ से कोई पदच्युत नहीं कर सकता
राष्ट्रभाषा
किसी भी भाषा का प्रारंभिक रूप बोली होता है। सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि कारणों से कोई बोली विकसित होकर भाषा का रूप धारण कर लेती है। उसका प्रयोग क्षेत्र विस्तृत हो जाता है। भिन्न-भिन्न बोलियों के प्रयोक्ता समाज-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उस भाषा का प्रयोग करने लगते हैं। विद्वानों के प्रयासों से भाषा के रूप को स्थायित्व मिलता है और इसका एक आदर्श तथा मानक रूप बन जाता है। शिष्ट जन उस मानक रूप का प्रयोग करने लगते हैं तथा सामान्य जन यत्किंचित् क्षेत्रीय प्रभाव के साथ उस भाषा का प्रयोग करते रहते हैं। धीरे-धीरे उन्नत होकर यह मानक भाषा संपूर्ण राष्ट्र की सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करने लगती है। उस क्षेत्र के निवासियों का उस भाषा के प्रति भावात्मक लगाव हो जाता है। वे अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के समान ही उसके प्रति गौरव की भावना रखते हैं। तब उस भाषा को राष्ट्रभाषा कहा जाता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी के शब्दों में, जब कोई आदर्श भाषा बनने के बाद भी उन्नत होकर और भी महत्त्वपूर्ण बन जाती है तथा पूरे राष्ट्र या देश में अन्य भाषा क्षेत्र तथा अन्य भाषा परिवार क्षेत्र में भी उसका प्रयोग सार्वजनिक कामों आदि में होने लगता है तो वह राष्ट्रभाषा का पद पा जाती है। राष्ट्रभाषा के संबंध में उपर्युक्त मत से यह स्पष्ट है कि जिन देशों में किसी एक भाषा का प्रयोग होता है वहाँ की भाषा 'राष्ट्रभाषा' का पद आसानी से प्राप्त कर सकती है। परंतु भारत जैसे बहुभाषा भाषी देशों में राष्ट्रभाषा का स्वरूप उतना स्पष्ट नहीं हो पाता। ऐसे देशों के निवासी अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रति भी भावनात्मक लगाव रखते हैं, उसकी प्रगति के लिए प्रयासरत रहते हैं। कभी-कभी ऐसी स्थिति में भाषाई प्रतिस्पर्द्धा भी दिखाई देती है। हिंदी भारत के अधिकांश भू-भाग के निवासियों की भाषा है। हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तरांचल, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ प्रदेशों की भाषा तो यह है ही; जम्मू क्षेत्र, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश आदि प्रदेशों की भी प्रमुख भाषा है। यों, हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या भारत के सभी प्रदेशों में पर्याप्त है। हिंदी को भारत के सभी प्रदेशों में अपेक्षित महत्त्व मिला है। हिंदी को यह महत्त्व दिलाने में ग़ैर हिंदीभाषी-महात्मा गाँधी, सुभाषचंद्र बोस, दयानंद सरस्वती, बालगंगाधर तिलक आदि बुद्धिजीवी नेताओं क विशेष योगदान रहा है।
राष्ट्रभाषा हिंदी का स्वरूप
राष्ट्रभाषा हिंदी के स्वरूप से तात्पर्य है, सर्वसाधारण से लेकर शिक्षित वर्ग तक सबके द्वारा प्रयुक्त की जानेवाली भाषा का सर्वमान्य रूप। इसका प्रयोग भारत अधिकांश भू-भाग में किया जाता है। पश्चिम में राजस्थान, हरियाणा से लेकर उत्तर में हिमाचल प्रदेश और पर्व में बिहार, झारखंड तथा छत्तीसगढ़ तक प्रायः सभी इसका प्रयोग करते हैं। हिंदी लगभग ग्यारवीं शताब्दी से ही भारत के अधिकांश 5 भाग में बोली जाती रही है। चंदबरदाई, विद्यापति, सूर, तुलसी, जायसी, कबीर बोधा, बिहारी, घनानंद, भारतेंदु आदि कवियों ने हिंदी की विभिन्न बोलियों साहित्य की रचना कर इसे समृद्ध किया है, परंतु सर्वसामान्य की एकमात्र भाषा के रूप में आदर्श हिंदी का यह स्वरूप इसे द्विवेदी युग से मिलना प्रारंभ हुआ। अपने विस्तृततम अर्थ में 17-18 बोलियों को स्वयं में समेटे, हिंदी का आज का आदर्श रूप वस्तुतः दिल्ली-मेरठ में बोली जानेवाली खड़ी बोली का परिष्कृत रूप है। यह खड़ी बोली की संरचनागत विशिष्टताओं को अपने में समेटे होते हुए भी उससे पर्याप्त भिन्न है। इसका अपना निश्चित व्याकरण है। महावीर प्रसाद द्विवेदी किशोरी दास वाजपेयी, कामता प्रसाद गुरू आदि वैयाकरणों ने इसे मानक रूप देने का प्रयास किया गया है। हिंदी में विभिन्न प्रयुक्तियों का विकास भी हुआ है और इसके कारण भी इसे राष्ट्रव्यापी रूप प्राप्त करने में आसानी हुई है।
सन् 1917 ई. में भरुच में होने वाले गुजरात शिक्षा परिषद् के अधिवेशन के सभापति-पद से गाँधीजी ने जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि कौन-सी भाषा भारत की राष्ट्रभाषा बन सकती है। गाँधीजी के विचार में राष्ट्रभाषा के लिए निम्नलिखित लक्षण होने चाहिए :
1. अमलदारों के लिए वह भाषा सरल होनी चाहिए।
2. यह ज़रूरी है कि भारतवर्ष के बहुत से लोग उस भाषा को बोलते हों।
3. उस भाषा के द्वारा भारतवर्ष का आपसी धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवहार हो सकना चाहिए।
4. राष्ट्र के लिए वह भाषा आसान होनी चाहिए।
5. उस भाषा का विचार करते समय किसी क्षणिक या अल्पस्थायी स्थिति पर ज़ोर नहीं देना चाहिए।
गाँधीजी के अनुसार अँग्रेज़ी भाषा में इनमें से एक भी लक्षण नहीं है। पहला लक्षण आख़िर में देना चाहिए था, लेकिन मैंने उसे पहला स्थान दिया है, क्योंकि ऐसा आभास होता है, मानो अँग्रेज़ी भाषा में यह लक्षण है। ज़्यादा विचार करने पर शासन-विधान की कल्पना यह है कि अँग्रेज़ लोग कम होते जाएँगे और यो भी इस हम देखेंगे कि आज भी अमलदारों के लिए यह भाषा सरल नहीं है। यहाँ के अँग्रेज़ अमलदार ही यहाँ रह जाएँगे। बाक़ी तादाद आज भी हिंदुस्तानियों की ही है हद तक कि आख़िर में एक वायसराय और अँगुलियों पर गिने जाने वाले कुछ और वह बढ़ती ही जाएगी। इन लोगों के लिए हिंदुस्तान की किसी भी भाषा के मुक़ाबले अँग्रेज़ी मुश्किल है, इस बात को तो सभी कोई क़बूल करेंगे। इसरे लक्षण पर विचार करने पर हमें पता चलता है कि जब तक अँग्रेज़ी भाषा को हमारा जनसमाज बोलने न लग जाए...जब तक यह मुमकिन न हो, तब एक...हमारा धार्मिक व्यवहार अँग्रेज़ी में चल ही नहीं सकता। समाज में अँग्रेज़ी का इस हद तक फैल जाना नामुमकिन मालूम होता है।
तीसरा लक्षण अँग्रेज़ी में हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह भारतवर्ष के बहुजन-समाज की भाषा नहीं है। चौथा लक्षण भी अँग्रेज़ी में नहीं है, क्योंकि सारे राष्ट्र के लिए वह उतनी आसान नहीं।
पाँचवें लक्षण का विचार करने से हमें पता चलता है कि आज अँग्रेज़ी भाषा को जो सत्ता प्राप्त है, वह क्षणिक है। चिरस्थायी स्थिति तो यह है कि हिंदुस्तान में जनता के राष्ट्रीय कामों में अँग्रेज़ी भाषा की ज़रूरत कम ही रहेगी। हाँ, अँग्रेज़ों की ज़रूरत रहेगी। हम कहीं भी अँग्रेज़ी भाषा से द्वेष नहीं चाहते। साम्राज्य की भाषा तो अँग्रेज़ी ही रहेगी, और इस कारण हम अपने मालवीय जी, शास्त्री जी और बैनर्जी वग़ैरह को उसे सीखने के लिए बाध्य करेंगे और यह विश्वास रखेंगे कि दूसरे देशों में हिंदुस्तान की कीर्ति फैलाएँगे, किंतु राष्ट्र की भाषा अँग्रेज़ी नहीं हो सकती अँग्रेज़ी को राष्ट्रीय भाषा बनाना देश में 'एस्पेरेण्टो' को दाख़िल करना है। अँग्रेज़ी को राष्ट्रीय भाषा बनाने की कल्पना हमारी निर्बलता की निशानी है। 'एस्पेरेण्टो' का प्रयास निरे अज्ञान का सूचक होगा। तो फिर किस भाषा में ये पाँच लक्षण मिलते हैं? हमें यह क़बूल कर ही लेना होगा कि हिंदी भाषा में ये सब लक्षण है।
आज संपूर्ण हिंदी भाषी क्षेत्र तथा कतिपय अहिंदी भाषी क्षेत्रों में भी हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है। इन क्षेत्रों में यह बोलचाल की भाषा तो है ही; साहित्य, राजनीति, शिक्षा, व्यवसाय, संचार माध्यम, धर्म के साथ ही विभिन्न शास्त्रों एवं विज्ञान की भाषा भी यह बन चुकी है। भारत में हिंदी जानने वालों की संख्या लगभग 74 करोड़ है। हिंदी भारतीयों की आस्था, रीति-रिवाज की भाषा है। उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक सभी तीर्थों और धार्मिक स्थलों पर हिंदी का प्रयोग देखा जा सकता है। होली, दीवाली, दशहरा, रक्षाबंधन सभी त्यौहारों के भजन, गीत और मरती की भाषा है हिंदी। हिंदी में लोकगीत, लोकनाटक आदि लोक साहित्य भरा पड़ा है। अलग-अलग प्रदेशों के लोगों की आशा-आकांक्षाओं, स्वप्न तथा निराशा को व्यक्त करने में राष्ट्रभाषा हिंदी पूरी तरह सफल है। इन प्रदेशों की कुछ स्थानीय मान्यताएँ और समस्याएँ हो सकती हैं, परंतु मूल स्वर पूरे भारत का एक है। पूरी भारतीय संस्कृति इस लौक साहित्य में प्रतिबिंबित हुई है। भारत के विभिन्न प्रदेशों के संतों ने भी अलग-अलग क्षेत्रों की बोलियों से शब्द ग्रहण कर जैसे पूरे हिंदी प्रदेश को एक किया, उसी प्रकार पूरे भारत की आत्मा को स्वर प्रदान किया। कबीर जैसे संतों की वाणी इसका प्रमाण है। राष्ट्रभाषा हिंदी सिर्फ़ हिंदुओं की भाषा नहीं है। भक्तिकाल के सूफ़ी कवियों—जायसी, कुतुबन, मंझन से लेकर भक्त कवि रसखान, नीति काव्य के रचयिता रहीम और आधुनिककाल के अनेक मुस्लिम कवि जहाँ हिंदी में काव्य-रचना करते रहे हैं, वहीं उत्तर भारत के मुसलमान और दक्षिण में दक्खिनी के प्रयोक्ता मुस्लिमों ने हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्वरूप प्रदान करने में मदद की है। भिन्न-भिन्न प्रदेशों में बंबइया हिंदी, कलकतिया हिंदी आदि के नाम से हिंदी अहिंदी प्रदेशों में अपनी जड़ें जमा चुकी है। इन प्रदेशों में हिंदी को राष्ट्रभाषा का स्वरूप प्रदान करने में जहाँ 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' जैसी संस्थाओं ने योग दिया है, वहीं हिंदी फ़िल्मों और दूरदर्शन ने भी इसमें प्रत्यक्ष जैसी परोक्ष रूप से अपना योगदान दिया है। समवेततः और दूरदर्शन ने भी इसमें अपनी सहोदरा भाषाओं—मराठी, गुजराती, असमी, बंगाली आदि के साथ-साथ दक्षिण भारतीय भाषाओं तथा पूर्वांचलीय भाषाओं को साथ लेकर चल रही है। हिंदी इन प्रदेशों में तो अपनी पैठ बना ही रही है, इन प्रदेशों की भाषाओं से शब्द ग्रहण कर स्वयं को समृद्ध भी कर रही है।
राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी का विकास
भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था। 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारतीय संविधान में राजभाषा के रूप में स्थान दिया गया। सरकार का दायित्व निश्चित किया गया कि वह हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य करेगी। पर तथ्य तो यह है कि हिंदी का राष्ट्र के स्तर पर व्यापक प्रयोग पिछले एक हज़ार वर्षों में देखा जा सकता है। इस काल में कभी-कभी, कहीं-कहीं वह राजभाषा भी रही, पर राष्ट्रभाषा तो वह सदैव ही रही। आम आदमी की बोलचाल, अस्मिता, साहित्य की भाषा के रूप में हिंदी भारत की प्रमुख भाषा रही है। राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी के विकास को तीन कालखंडों में विभाजित कर देखा जा सकता है।
1. आदिकाल 1000 ई - 1500 ई.
2. मध्यकाल 1500 ई. - 1800 ई.
3. आधुनिककाल 1800 ई. - अद्यतन
हिंदी के आदिकाल का प्रारंभ लगभग सन् 1000 ईसवीं से माना जाता है। यद्यपि हिंदी का प्रारंभिक दर्शन आठवीं शताब्दी में हिंदी के प्रथम कवि माने जाने बाले सरहपाद की रचनाओं में किया जा सकता है—
जह मन पवन न संचरइ, रवि शशि नाह पवेश।
तह वट चित्त विसाम करु, सरहें कहिउ उवेश॥
तथापि लगभग 200 वर्षों के अंतराल के बाद तो हिंदी साहित्य की अविच्छिन्न धारा दिखाई देती है। यहाँ यह ध्यातव्य है कि कोई भी भाषा, अपनी उत्पत्ति से ही काव्य की भाषा नहीं बनती, इसके लिए कम से कम सौ-दो सौ वर्षों का समय अपेक्षित है। इसका तात्पर्य है कि हिंदी सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही बोलचाल की भाषा के रूप में भारत में प्रचलित रही होगी। यह अवश्य है कि साहित्य की दृष्टि से वह अपभ्रंश का काल था। यों अपभ्रंश लगभग 15 वीं शताब्दी तक साहित्य की भाषा रही है, उत्तर अपभ्रंश को कुछ विद्वान पुरानी हिंदी और कुछ अवहट्ठ का नाम देते रहे हैं, परंतु वास्तव में थी वह हिंदी ही। डॉ. रामगोपाल शर्मा दिनेश के शब्दों में, यद्यपि अपभ्रंश अपने मूल रूप में पंद्रहवीं शताब्दी तक साहित्य की भाषा बनी रही, तथापि आठवीं शताब्दी से ही बोलचाल की भाषा पृथक् होकर उसके समानांतर साहित्य-रचना का माध्यम बन गई थी। इसी भाषा को कुछ विद्वानों ने 'उत्तर अपभ्रंश' या 'पुरानी हिंदी' कहा है और कुछ विद्वानों में 'अवहट्ठ' नाम दिया है। परंतु वास्तविकता यह है कि वह भाषा 'हिंदी' है, उसे 'उत्तर अपभ्रंश' या अवहट्ठ नाम देना भ्रम उत्पन्न करना है। जिन विद्वानों ने ये नाम दिए हैं, वे भी अपने मत के अंतर्गत प्रायः उक्त तथ्य का समर्थन करते रहे हैं। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' पहले विद्वान हैं जिन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की थी कि 'उत्तर अपभ्रंश' ही पुरानी हिंदी है। यहाँ 'उत्तर' शब्द काल का बोधक न होकर साहित्यिक अपभ्रंश से इतर बोलचाल की उस भाषा को बोधक है जो साहित्यिक अपभ्रंश के एक रूप की स्वीकृति के पश्चात् उसके बाद के रूप में स्थापित होती जा रही थी।
रामचंद्र शुक्ल, राहुल सांकृत्यायन, हजारीप्रसाद द्विवेदी, श्यामसुंदर दास आदि आलोचकों ने मुक्तभाव अथवा कुछ संकोच के साथ 'उत्तर अपभ्रंश' की रचनाओं को हिंदी साहित्य में स्थान दिया है। इस काल में नाथों, सिद्धों, जैन साधुओं, योगियों, महात्माओं ने संपूर्ण उत्तर, उत्तर-पूर्व तथा पश्चिम भारत में हिंदी की विभिन्न बोलियों और लोक भाषाओं में अपने सिद्धांतों का प्रचार-प्रसार किया। भारत की जनता की आत्मा में समान रूप में अनुस्यूत धार्मिक-आध्यात्मिक-सांस्कृतिक चेतना को उसकी भाषा में ही प्रचारित-प्रसारित किया जा सकता था। इतना ही नहीं चंदबरदाई और उनके समान अन्य चारण-भाट कवियों ने वीर काव्य की जिस भाषा में रचना की है, उसे नाम भले ही 'डिंगल' दिया जाए, है वह हिंदी ही। इसी प्रकार इस काल में मधुर भावों के लिए प्रचलित 'पिंगल' भी हिंदी है। मिथिला प्रदेश में अपनी जिस ललित-सुमधुर भाषा में विद्यापति ने रचना की, और जिसे उन्होंने 'देसिल बयना' कहा, वह भी हिंदी का ही एक रूप है। आदिकाल में हिंदी के लिए हिन्दवी, हिन्दुई या हिन्दुवी का प्रयोग भी होता रहा है। तेरहवीं शताब्दी में औफ़ी और अमीर ख़ुसरो ने इसका प्रयोग किया है। अमीर ख़ुसरो सूफ़ी थे, यद्यपि दिल्ली के शाही दरबार की ओर से उन्होंने युद्धों में भी सक्रिय भाग लिया। उन्होंने फ़ारसी के अतिरिक्त हिंदी की भी बोलियों में रचनाएँ लिखीं। इसमें प्रमुख हैं—ब्रज, बुंदेलखंडी, कन्नौजी, बाँगरू और कौरवी।
तेरहवीं शताब्दी के अंतिम दशक तक दिल्ली की खिलजी सल्तनत का दक्षिण तक विस्तार हो गया था। परिणामस्वरूप उत्तर भारत की भाषा और बोलियों का भी प्रसार वहाँ प्रारंभ हो गया। बीजापुर, गोलकुंडा, अहमद नगर, विजयवाड़ा, देवगिरि, बरार आदि दक्षिण भारतीय प्रदेशों में सूफ़ियों, संतों तथा अन्य साहित्यकारों ने बोलचाल और साहित्य के माध्यम से जिस भाषा का प्रचार-प्रसार किया, वह फारसी और हिंदी का मिला-जुला रूप था। इसी को सत्रहवीं शताब्दी में दक्खिनी या दक्कनी कहा गया।
इस प्रकार हिंदी अपने उद्भव के दो-तीन सौ वर्षों में ही संपूर्ण भारतवर्ष के भाषिक व्यवहार और साहित्य की भाषा बन गई और दक्षिण भारत के भी कुछ क्षेत्रों में इसका प्रचार-प्रसार प्रारंभ हो गया। यह सही है कि इस समय तक खड़ी बोली का महत्त्व अन्य भाषा रूपों से अधिक नहीं था। साहित्य के क्षेत्र में तो कम-से-कम हिंदी की अन्य बोलियों और शैलियों को पर्याप्त महत्त्व मिला।
मध्यकाल
मध्यकाल भारत के लिए सांस्कृतिक पुररुत्थान का काल कहा जा सकता है। सांस्कृतिक दृष्टि से सारा भारत एक ही रहा है। 'विविधता में एकता' ही भारत की सबसे बड़ी विशेषता है। भारत के विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न धर्मों के जो तीर्थस्थान हैं, उन्होंने हिंदी को देश के कोने-कोने में पहुँचाने में बहुत मदद की है। हिंदीतर प्रदेशों के लोग हिंदी प्रदेशों में अपने तीर्थ स्थानों पर आते थे और हिंदी प्रदेश के निवासी भी आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु आदि प्रदेशों में अपने तीर्थों पर जाते थे। ऐसे में एक ऐसी भाषा की आवश्यकता थी जो उन भिन्न भाषा-भाषियों के बीच सेतु का कार्य कर सके। हिंदी ने उस काल में इस दायित्व का निर्वाह किया। डॉ. मलिक मोहम्मद लिखते हैं, देश के एक छोर से दूसरे छोर तक यात्रा करने वालों को एक सामान्य भाषा का सहारा लेना पड़ता था। उन दिनों एक सामान्य व्यापक भाषा केवल हिंदी थी जो उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम के तीर्थ यात्रियों के बीच में बातचीत की सामान्य भाषा थी। विशेषकर दक्षिण और उत्तर के सांस्कृतिक संबंध की दृढ़ शृंखला के रूप में हिंदी भाषा सशक्त माध्यम बनी थी। सच्चाई तो यह है कि जनभाषा किसी के बनाए नहीं बनती, परंतु उसको सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियाँ सदियों से स्वरूप देती हैं। हमारे देश की सांस्कृतिक परंपराओं को अक्षुण्ण रखने में पालि, प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के बाद हिंदी को व्यापक रूप धारण करने का अवसर मिला है।
दक्षिण की ओर से जो भक्तिधारा प्रवाहित हई उसने उत्तर भारत को पर्णतः आप्लावित कर दिया। रामानंद दक्षिण से भक्ति का बिरवा लेकर आए और उत्तर की उपजाऊ भूमि में वह विशाल वट बन गया। नाथों और संतों की काव्यधारा से विकसित ज्ञान और मुस्लिम एकेश्वरवाद से अपने प्रेम (निर्गुण) के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त करने का सपना कबीर, जायसी आदि ने देखा तो तुलसी और सूर ने सगुण राम और कृष्ण की आराधना की। लेकिन इन सभी धाराओं के भक्त कवियों में एक बात सामान्य थी और वह थी लोकभाषा। राम और कृष्ण की जन्मभूमि की भाषा के रूप में अवधी और ब्रज का प्रचार हुआ तो संत भी हिंदी में पद और साखियाँ गाते हुए देशभर में घूमे।
निर्गुण संत जाति, धर्म, समाज और भाषा के बंधनों में विश्वास नहीं रखते थे। वे एक स्थान पर रुकते भी नहीं थे। अपने सिद्धांतों के प्रचार के लिए इन्होंने खड़ी बोली का सहारा लिया परंतु भ्रमणकारी प्रवृत्ति के कारण इनकी भाषा में अनेक अन्य बोलियों और भाषाओं के शब्द सहज रूप से आ गए। अपनी इस सधुक्कड़ी भाषा के माध्यम से उन्होंने देश भर में साखियों और पदों का गायन किया और हिंदी को सार्वदेशिक रूप दिया। इस संबंध में सत्यकेतु विद्यालंकार का कहना है कि संतों की भाषा प्रारंभ से ही एक व्यापक भाषा थी, इसलिए विचारों के आदान-प्रदान के लिए अहिंदी भाषी प्रदेशों में भ्रमण करते समय संत लोग इसी भाषा का अधिक प्रयोग करते थे। संतों की वाणी के प्रति जन-साधारण का स्वाभाविक आकर्षण रहता था, इसलिए वे उसे सुनने और समझने के लिए सदा लालायित रहते थे। इस प्रकार संत-समागम से हिंदी का प्रचार बढ़ता गया और यह भाषा अहिंदी भाषी प्रदेशों में अधिक-से-अधिक व्यापक बनती गई।
मध्यकालीन सूफ़ी संतों ने भी जनभाषा में ही रचनाएँ की हैं। वे जानते थे कि अपनी रचनाओं को जनसामान्य तक पहुँचाने के लिए जनभाषा के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। फलतः उन्होंने 'अवधी' को अपने काव्य का माध्यम बनाया। सूफ़ी संतों ने अपनी प्रेमाधारित भक्ति रचनाओं के माध्यम से सांस्कृतिक और सामाजिक समन्वय के विशेष प्रयास किए। दक्षिण भारत में भी अनेक सूफ़ी संतों ने दक्खिनी में विपुल साहित्य की रचना की। दक्खिनी के सूफ़ी कवियों में शाह मीराजी, शाह बुरहानुद्दीन, सैयद मुहम्मद हुसैनी आदि को विशेष ख्याति मिली है। दक्खिनी वस्तुतः हिंदी की एक शैली है। रामविलास शर्मा, भोलानाथ तिवारी आदि विद्वान इसे खड़ी बोली का ही एक रूप मानते हैं। इस प्रकार सुफ़ियों ने हिंदी को देशव्यापी बनाने में विशिष्ट भूमिका का निर्वाह किया है।
हिंदी को देशव्यापी बनाने में वैष्णव धर्म ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दक्षिण में भक्ति आंदोलन तीसरी शताब्दी से नौवीं शताब्दी तक चला। बाद में दक्षिण के वैष्णव आचार्यों ने इस भक्ति आंदोलन का प्रचार पूरे देश में किया। संभवतः इन आचार्यों ने अपने मत का प्रचार उत्तर भारत की लोकभाषा हिंदी में किया होगा। दक्षिण से आए इन आचार्यों में रामानंद तथा वल्लभाचार्य ने भी हिंदी के माध्यम से ही भक्ति आंदोलन को सशक्त बनाया। इसका एक कारण यह भी है कि इनके आराध्य राम और कृष्ण की जन्मभूमि अयोध्या और मथुरा हिंदी क्षेत्र में ही हैं। डॉ. अंबाशंकर नागर लिखते हैं, इस प्रकार हिंदी को व्यापक बनाने में वैष्णव संप्रदाय के अनुयायियों का प्रमुख हाथ रहा है। जहाँ-जहाँ यह धर्म पहुँचा, ब्रजभाषा भी उसके साथ पहुँची। वल्लभाचार्य और उनके अनुयायियों ने कृष्णभक्ति और ब्रजभाषा के प्रचार में अभूतपूर्व योग दिया है। रामभक्तों में तुलसी तथा उनके 'मानस' की लोकप्रियता ने भी अहिंदीभाषी लोगों को अवधी भाषा की ओर आकर्षित किया।
डॉ. मलिक मोहम्मद का भी यही मानना है कि राम और कृष्ण की भक्ति अवधी और ब्रज के माध्यम से हिंदी प्रदेश की सीमाओं को लाँघकर की गई। यहाँ तक कि मुसलमान कवियों ने भी कृष्ण और राम की आराधना ब्रज और अवधी के माध्यम से ही की है। मध्ययुगीन वैष्णव भक्ति आंदोलन इतना व्यापक रहा कि वैष्णव धर्म की विचारधारा की सुंदर अभिव्यक्ति का माध्यम ब्रज और अवधी को समझकर इसके द्वारा देश के विभिन्न प्रदेशों के कवि रस-विभोर होने लगे। हिंदी के कृष्णभक्त और रामभक्त कवियों की रचनाओं से प्रभावित होकर हिंदीतर प्रदेशों के बहुत से कवियों ने ब्रज या अवधी को माध्यम बनाकर भक्तिपरक काव्य रचे हैं।
हिंदीतर भाषाओं के भक्त कवियों में गुरु नानक देव तथा अन्य सिख गुरु (पंजाब), वल्लभ देव, कविदत्त (कश्मीर) गोपालदास, कृष्णदास, नरहरिदास चक्रवर्ती, नशीर मामूद (बंगाल), दामोदर चम्पतिराय, दीनकृष्ण दास, अनंत दास (उड़ीसा), मुक्तानंद, ब्रह्मानंद, प्रेमानंद, दादू, प्राणनाथ (गुजरात), संत एकनाथ, संत ज्ञानेश्वर (महाराष्ट्र) स्वामी तिरुनाल (केरल), अली आदिलशाह द्वितीय, कुली कुतुबशाह (कर्नाटक), वल्लभाचार्य, नादल्ल पुरुषोत्तम (आंध्र प्रदेश) आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
इस प्रकार निर्गुण संतों, सूफ़ियों तथा वैष्णवभक्तों ने हिंदी को राष्ट्रव्यापी बनाने में पूरा योगदान दिया। भारत के बाहर काबुल आदि में भी अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए संतों ने हिंदी को ही अपनाया। इस काल में रचित विपुल भक्ति काव्य ने हिंदीतर क्षेत्र के कवियों को भी हिंदी में काव्य रचना के लिए प्रेरित कर इसे पूरे राष्ट्र की भाषा बनाने में योगदान दिया।
साहित्य एवं संगीत की दृष्टि से हिंदी समृद्ध भाषा है। इस कारण भी हिंदीतर प्रदेशों के अनेक कवियों ने हिंदी में रचनाएँ प्रस्तुत कीं। समान उद्गम स्रोतवाली भाषाओं—मराठी, गुजराती, बंगाली, उड़िया आदि से समानता के कारण भी हिंदी को प्रोत्साहन मिला। मुग़ल शासन काल में व्यापार के केंद्र उत्तर भारत में थे। इन व्यापारिक केंद्रों में हिंदीतर प्रदेशों के लोग भी व्यापार के लिए आते थे और लेन-देन के मामलों में उस समय की उत्तर भारत की भाषा हिंदी का ही प्रयोग किया जाता था। राजनीतिक कारणों ने भी हिंदी को पूरे देश में पहुँचाने में योग दिया। मुस्लिम शासन के अधिकारियों को युद्ध एवं शांति के समय में देश के विभिन्न भागों में जाना पड़ता था और उनके साथ हिंदी का भी प्रचार इन क्षेत्रों में होता था। इन सब सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक कारणों से मध्यकाल में हिंदी पूरे देश की भाषा का स्वरूप प्राप्त कर रही थी।
आधुनिक काल में हिंदी राष्ट्रीय अस्मिता और अभिमान की प्रतीक बन गई। हिंदी भाषा के संदर्भ में आधुनिक काल का प्रारंभ सन् 1800 ई. में कलकत्ता में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना से स्वीकार किया जा सकता है। इस कॉलेज में अन्य विषयों के साथ अरबी, फ़ारसी, संस्कृत, हिंदुस्तानी, बंगला, ग्रीक आदि भाषाओं को पढ़ाने की भी व्यवस्था थी। हिंदुस्तानी विभाग के प्रथम अध्यक्ष डॉ. गिलक्रिस्ट ने हिंदुस्तानी का गंभीर अध्ययन किया था। गिलक्रिस्ट की भाषा-नीति हिंदी के विरोध में पड़ती थी। गिलक्रिस्ट ने हिंदुस्तानी के जिस रूप का समर्थन किया वह वास्तव में उर्दू ही थी। इसके कारण आगे चलकर हिंदी, उर्दू का भयंकर विवाद खड़ा हुआ। सन् 1823 में विलियम प्राइस के विभागाध्यक्ष बनने तक हिंदुस्तानी के स्थान पर हिंदी का अध्ययन प्रारंभ हो गया था। प्राइस हिंदी और हिंदुस्तानी में लिपि और शब्दों का ही अंतर मानते थे। गिलक्रिस्ट की भाषा-नीति के कारण हिंदी का विशेष लाभ तो नहीं हुआ परंतु फिर भी खड़ी बोली को विकसित होने का कुछ अवसर अवश्य मिला। कॉलेज ने खड़ी बोली में 'गद्य रचना' को प्रोत्साहित किया। कॉलेज द्वारा प्रकाशित अनेक पुस्तकों द्वारा भी हिंदी के प्रचार-प्रसार में सहायता मिली। यहाँ यह ध्यातव्य है कि यह सब कार्य हिंदी क्षेत्र में नहीं बल्कि बंगला भाषी कलकत्ता को केंद्र बनाकर हो रहा था।
सन् 1857 में भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम लड़ा गया। इस संग्राम में हिंदी ही भाषाई दायित्व निभा रही थी। सभी क्रांति-समाचार, संवाद और संदेश हिंदी में ही प्रसारित किए जाते थे। परंतु फिर भी यह माना गया कि उपयुक्त सार्वदेशिक भाषा के अभाव में क्रांति का संदेश करोड़ों लोगों तक नहीं पहुँचा तथा देशी भाषाओं में उचित शिक्षा के अभाव में जनमानस की अँग्रेज़ों के विरुद्ध तैयार नहीं किया जा सका। फलतः आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन के उन्नायकों ने यह अनुभव किया कि हिंदी के प्रचार-प्रसार से ही स्वाधीनता में मदद मिल सकती है। इस संबंध में हिंदीतर प्रदेशों के लोगों ने नेतृत्व की बागडोर संभाली। इस समय जिन चिंतकों, नेताओं ने हिंदी की राष्ट्रभाषा के रूप में कल्पना की, उनमें केशवचंद्र सेन मूर्धन्य हैं। सन् 1873 में अपने बंगाली पत्र' सुलभ समाचार' में उन्होंने लिखा, यदि भाषा एक न होने पर भारतवर्ष में एकता न हो तो उसका उपाय क्या है? समस्त भारतवर्ष में एक भाषा का प्रयोग करना इसका उपाय है। इस समय भारत में जितनी भी भाषाएँ प्रचलित हैं, उनमें हिंदी भाषा प्रायः सर्वप्रचलित है। इस हिंदी भाषा को यदि भारतवर्ष की एकमात्र भाषा बनाया जाए तो अनायास ही (यह एकता) शीघ्र ही संपन्न हो सकती है।
प्रसिद्ध बंगला साहित्यकार और 'वन्देमातरम्' के रचयिता बंकिमचंद्र चटर्जी ने भी हिंदी की सहायता से पूरे भारत को एकसूत्र में बाँधने की कल्पना की थी।
सन् 1916 के लगभग महात्मा गाँधी राष्ट्रीय परिदृश्य पर आए। गुजराती भाषी महात्मा गाँधी ने स्वाध्याय से हिंदी का ज्ञान प्राप्त किया था। वे जानते थे कि हिंदी के बिना देश को एक कर अँग्रेज़ों के विरुद्ध सफल आंदोलन नहीं चलाया जा सकता। सन् 1925 में कांग्रेस ने यह प्रस्ताव पास किया कि कांग्रेस का, कांग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का काम-काज आमतौर पर हिंदुस्तानी में चलाया जाएगा। इस घोषणा से हिंदुस्तानी आंदोलन को पर्याप्त बल मिला। राजगोपालाचारी भी हिंदी के प्रबल समर्थक थे। सन् 1939 में जब भारत के कई प्रदेशों में कांग्रेस की निर्वाचित सरकारों का गठन हुआ तो मद्रास के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने मद्रास (वर्तमान तमिलनाडु) के सभी विद्यालयों में हिंदी शिक्षण अनिवार्य कर दिया। उनके इन प्रयासों को गाँधी जी का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। जब गाँधी जी और राजा जी के प्रयत्नों पर कुछ लोगों ने शंका उठाई तो गाँधी जी ने कहा, कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि हम प्रांतीय भाषाओं को नष्ट करके हिंदी को सारे भारत की एकमात्र भाषा बनाना चाहते हैं। इस ग़लतफहमी में प्रेरित होकर वे हमारे प्रचार का विरोध करते हैं। मैं हमेशा से यह मानता रहा हूँ कि हम किसी भी प्रांतीय भाषाओं को मिटाना नहीं चाहते। हमारा मतलब तो सिर्फ़ यह हैं कि विभिन्न प्रांतों के पारस्परिक संबंध के लिए हम हिंदी भाषा सीखें।
हिंदी को राष्ट्रभाषा की ओर अग्रसर करने में उस समय अन्य अनेक लोगों ने अपनी भूमिका निभाई। ब्रह्मसमाज के केशवचंद्र सेन के विचारों का उल्लेख ऊपर हो चुका है। इन्हीं की प्रेरणा से महर्षि दयानंद ने हिंदी में भाषण देना प्रारंभ किया हिंदी में 'सत्यार्थ प्रकाश' की रचना की। ब्रहासमाज के संस्थापक राजा राममोहन मानते थे कि केवल हिंदी ही अखिल भारतीय भाषा बन सकती है। आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती मूलतः गुजराती थे परंतु अपने भाषणों, ग्रंथों, लेखों में उन्होंने हिंदी को वरीयता दी। आर्यसमाज के नियमों में एक नियम कहता है कि प्रत्येक आर्यसमाजी के लिए हिंदी पढ़ना अनिवार्य है। आर्यसमाज की हिंदी के संबंध में श्री रामगोपाल लिखते हैं। आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद अपने निजी उदाहरण से अपने अहिंदीभाषी अनुयायियों को भी हिंदी का प्रयोग करने की प्रेरणा दी। वह स्वयं गुजराती थे। उन्होंने हिंदी सीखी और केवल उसे ही व्याख्यानों तथा लेखनी का माध्यम बनाया। उनका उद्देश्य आर्यसमाज के सिद्धांतों का प्रसार करना था, परंतु उनके तथा उनके अनुयायियों के धर्म प्रचार में अधिक उत्तम चीज़ जीवन को प्राप्त हुई, वह था राष्ट्रभाषा का प्रचार।
आर्यसमाज के ही समान सनातनधर्म सभा ने भी भारत के विभिन्न प्रदेशों में नांदी को प्रोत्साहन दिया। पं. मदनमोहन मालवीय, गोस्वामी गणेशदत्त तथा श्रद्धाराम अत्तौरी आदि ने पंजाब में हिंदी की लगभग दो सौ सायंकालीन पाठशालाओं की स्थापना, लाहौर से 'विश्वबंधु' हिंदी दैनिक का प्रकाशन तथा रोचक उपदेशों एवं आख्यानों द्वारा हिंदी-सेवा का कार्य किया। महाराष्ट्र में 'प्रार्थना समाज' के महादेव गोविंद रानाडे के अतिरिक्त 'थियोसोफिकल सोसाइटी'—(अंतरराष्ट्रीय कार्यालय, मद्रास) की श्रीमती ऐनी बेसेंट ने भी हिंदी का समर्थन किया। श्रीमती बेसेंट ने हिंदी हो सर्वाधिक प्रचलित भारतीय भाषा स्वीकार करते हुए उसे राष्ट्र की एकता का मुख्य साधन माना। रामकृष्ण किशन; राधास्वामी संप्रदाय; काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग; दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास; राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा; गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद; बम्बई हिंदी विद्यापीठ, बंबई; साराष्ट्र राष्ट्रसभा, पुणे; हिंदी विद्यापीठ, देवधर, असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, गुवाहाटी; हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद; मैसूर रियासत हिंदी प्रचार समिति बैंगलौर; मैसूर हिंदी प्रचार परिषद्, बैंगलौर; केरल हिंदी प्रचार सभा, त्रिवेंद्रम; कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति, बैंगलौर; उड़ीसा राष्ट्रभाषा परिषद्, पुरी; सौराष्ट्र हिंदी प्रचार समिति, राजकोट; मणिपुर हिंदी परिषद्, इम्फाल आदि अनेक संस्थाएँ इस दिशा में सक्रिय हां हैं। उपर्युक्त सूची से स्पष्ट है कि आधुनिक युग में हिंदी के प्रचार-प्रसार का कार्य हिंदी भाषी क्षेत्रों के अलावा अहिंदी भाषी क्षेत्रों में भी पर्याप्त गति से हुआ है।
वास्तव में आज भी ये सभी संस्थाएँ हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की उसी दिशा में सक्रिय है, जिसका स्वप्न गाँधी जी ने देखा था। स्वतंत्रता-प्राप्ति के तुरंत बाद उन्होंने कहा था, हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित करने में एक दिन भी खोना देश को भारी सांस्कृतिक नुक़सान पहुँचाना है।... जिस तरह हमारी आज़ादी की ज़बरदस्ती छीनने वाले अँग्रेज़ों की सियासी हुकूमत की हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति की दवानेवाली अँग्रेज़ी भाषा को भी यहाँ से निकाल बाहर करना चाहिए।
इन संस्थाओं की ओर से हिंदी शिक्षण की दृष्टि से विभिन्न परीक्षाओं का आयोजन होता है। पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती है। उदाहरणार्थ, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की ओर से सभा में 'स्नातकोत्तर अध्ययन और अनुसंधान विभाग' की स्थापना की गई है तथा हिंदी प्रचार समाचार और 'दक्षिण भारत' नामक मासिक पत्रिकाएँ प्रकाशित करती हैं। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा भी 'राष्ट्रभाषा' और 'राष्ट्रभाषी' नामक पत्रिकाएँ प्रकाशित करती हैं। गुजरात विद्यापीठ, अहमदाबाद और बंबई हिंदी विद्यापीठ, बुंबई की ओर से आयोजित हिंदी परीक्षाओं में हज़ारों परीक्षार्थी सम्मिलित होते हैं।
आज़ादी के बाद भी राष्ट्रभाषा हिंदी का प्रचार अभियान निरंतर आगे बढ़ रहा है। अनेक व्यक्तियों, विद्वानों एवं साहित्य कर्मियों द्वारा किए गए अनुवाद कार्य के माध्यम से ही हिंदी को बढ़ावा मिला है। रेडियो, दूरदर्शन और फ़िल्मों ने भी इस दिशा में अपने दायित्व की पूर्ति की है। अनेक स्थानों पर हिंदी की स्थिति एक नई शैली जैसी हो गई है। बंबइया हिंदी और कलकतिया हिंदी इसका प्रमाण हैं। भारत सरकार ने भी इस दिशा में काफ़ी सहयोग दिया है।
यद्यपि आज नागर परिवेश को देखने पर लगता है कि देश में अँग्रेज़ी का वर्चस्व बढ़ रहा है। सरकार राजभाषा के रूप में अँग्रेज़ी की समय सीमा को निरंतर बढ़ा रही है। पूँजीपति, अधिकारी वर्ग और नेताओं के बच्चे अँग्रेज़ी विद्यालयों में पढ़ रहे हैं। अँग्रेज़ी विद्यालय शहरों में कुकुरमुत्तों के समान फैल रहे हैं। परंतु समवेततः निराशा की कोई बात नहीं है। पूरे देश में आज भी अधिकांश जनता हिंदी बोलती अथवा समझती है। सरकार का ऐसा कोई कार्य आज भी सफल नहीं हो पाता जिसका प्रचार हिंदी के माध्यम से न किया जाए। वास्तव में हिंदी जन-जन को भाषा है, पूरे राष्ट्र की भाषा है, राष्ट्र की आत्मा इसमें बसती है। यह भारत को राष्ट्रभाषा है और पूरे भारत में इसका निरंतर प्रचार-प्रसार हो रहा है।
राजभाषा
भाषा के विविध रूपों में राष्ट्रभाषा और राजभाषा की चर्चा प्रायः की जाती है। सामान्य नागरिक राजभाषा और राष्ट्रभाषा में कभी-कभी भेद नहीं कर पाते। ‘राजभाषा’ का प्रयोग अँग्रेज़ी के Official Language के प्रतिशब्द के रूप में किया जाता है। पहले इसके लिए State Language शब्द का प्रयोग किया गया। परंतु इसके कारण होनेवाले भ्रम से बचने के लिए संविधान में इसके लिए Official language शब्द ही रखा गया। इसका तात्पर्य है 'राज' अर्थात 'राज-काज' अथवा सरकारी काम-काज या कार्यालय की भाषा। इस दृष्टि से 'राजभाषा' से तात्पर्य है—राज (शासक) या राज्य (सरकार) द्वारा प्राधिकृत भाषा। राजभाषा देश के प्रशासक वर्ग की भाषा होती है। इसका प्रयोग मुख्यतः चार क्षेत्रों में अपेक्षित है—शासन, विधान, न्यायपालिका और कार्यपालिका। सामान्यतः किसी भी देश की राजभाषा में ही वहाँ की संसद की कार्यवाही चलती है, सचिवालय का काम-काज होता है, और न्यायालयों तथा प्रशासनिक इकाइयों द्वारा कार्य किया जाता है। कई देशों में राष्ट्रभाषा और राजभाषा एक ही होती है, परंतु भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देशों में 'राजभाषा' की घोषणा स्वतंत्र रूप से की जाती है।
हम जानते हैं कि पिछले एक हज़ार वर्षों में हिंदी भारत की सर्वप्रमुख भाषा रही है। परंतु अँग्रेज़ों ने अपने शासनकाल में अँग्रेज़ी के प्रयोग को महत्त्व दिया। मैकाले की शिक्षा-नीति ने सरकारी काम-काज के लिए काले बाबुओं को बढ़ावा दिया। फलतः देश की आज़ादी के समय राजभाषा के लिए अँग्रेज़ी के नाम की व्यापक चर्चा चल पड़ी। गाँधी जी इसके विरोध में थे। उनका कहना था, अँग्रेज़ी से किसी को नफ़रत नहीं, उसमें ज्ञान का अटूट भंडार है। यह विश्व भाषा है फिर भी हिंदुस्तानियों को अनिवार्य रूप से अँग्रेज़ी सीखने की आवश्यकता नहीं है...अँग्रेज़ी कभी भी हमारी राष्ट्रभाषा या राजभाषा नहीं बन सकती। यदि हम भारत को एक राष्ट्र बनाना चाहते हैं तो केवल हिंदी ही हमारी राजभाषा हो सकती है। गाँधी जी के इन स्पष्ट विचारों के बावजूद अँग्रेज़ी के पक्षधर पीछे नहीं हटे। अतः भारत के संविधान-निर्माताओं के सामने भारत की राजभाषा के संदर्भ में दो विकल्प थे—हिंदी और अँग्रेज़ी।
भारत में संविधान सभा का गठन सन् 1947 में हुआ था। उसी समय यह निर्णय ले लिया गया था कि सभा के कामकाज की भाषा हिंदुस्तानी या अँग्रेज़ी होगी। बाद में 'हिंदुस्तानी' के स्थान पर 'हिंदी' शब्द रख दिया गया। फ़रवरी 1948 में सभा द्वारा प्रस्तुत 'संविधान' के प्रारूप में राजभाषा संबंधी कोई विधेयक नहीं था, केवल इतना ही उल्लेख था कि संसद की भाषा अँग्रेज़ी या हिंदी होगी। पं. नेहरू ने एक अखिल भारतीय भाषा की आवश्यकता पर बल दिया। लेकिन कांग्रेस की वर्किंग कमेटी ने 'द्विभाषिक स्थिति' पर प्रस्ताव पारित किए और यह भी स्पष्ट कहा कि अखिल भारतीय काम-काज के लिए भी State Language होनी चाहिए। संविधान सभा में इस विषय पर पर्याप्त वाद-विवाद के बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा स्वीकार कर लिया गया। लेकिन यह भी कहा गया कि अगले पंद्रह वर्ष तक अँग्रेज़ी सह-राजभाषा रहेगी। तब से आज तक अनेक बार अँग्रेज़ी के इस काल को बढ़ाया जा चुका है और आज हिंदी के साथ अँग्रेज़ी भारत की सह-राजभाषा बनी हुई है।
राजभाषा हिंदी : ऐतिहासिक विकास-क्रम
हिंदी का विकास लगभग सन् 1000 से स्वीकार किया जाता है। यद्यपि उस समय मुसलमानों के भारत में आने के कारण राजभाषा के रूप में हिंदी के स्थान पर अरबी-फ़ारसी को महत्त्व मिल रहा था तथापि उस काल की भाषा में अनेक ऐसे हिंदी शब्द मिलते हैं जो राजभाषा के रूप में प्रयुक्त होते रहे हैं, जैसे—मंत्री, पुर (नगर), अन्त्येपुर (अंतःपुर), आएस (आदेश), सभा, णिग्गम् (निर्गम), परधान (प्रधान), उनमाद (अनुमोदन), परवान (प्रमाण), अग्य (आज्ञा), समेल (सम्मेलन), एकंग (एकमत) आदि।
यद्यपि अपने उद्गम से लेकर स्वाधीनता प्राप्ति तक हिंदी किसी राज्य की एकमात्र राजभाषा कभी नहीं बनी, परंतु इसकी उपेक्षा भी कोई नहीं कर सका। मौहम्मद गजनवी, खिलजी वंश, तुग़लक़ वंश, मुग़ल वंश सभी के समय में राजकाज में हिंदी का प्रयोग होता था। ये जानते थे कि भारत में प्रशासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए हिंदी का प्रयोग आवश्यक है। सिकंदर लोदी के समय में भी राज्य का बहुत-सा काम हिंदी में होता था। शेरशाह सूरी के शासनकाल में 'सिक्कों' पर नागरी और फ़ारसी दोनों का प्रयोग होता था। अकबर तथा जहाँगीर तो हिंदी के अच्छे जानकार थे ही, औरंगज़ेब के शासन में भी नागरी (हिंदी) भाषा का प्रयोग मिलता है। यह अवश्य है कि इस समय तक हिंदी की ब्रजभाषा तथा राजस्थानी बोलियों का प्रयोग अधिक होता था। डॉ. कृष्णकुमार गोस्वामी के अनुसार उत्तर भारत में 'अमलदस्तूर', मुग़लकालीन राजकाजी हिंदी का मानक प्रलेख माना जाता है जो बीकानेर के राजकीय अभिलेखागार में उपलब्ध है। इसमें खड़ी बोली, ब्रजभाषा और राजस्थानी का मिश्रण था जो तत्कालीन परिनिष्ठित हिंदी मानी जाती थी। बीच-बीच में विदेशी भाषा के अरबी और फ़ारसी शब्दों का प्रयोग भी हुआ। इसमें उपर्युक्त तीनों बोलियों के विभिन्न व्याकरणिक रूप मिलते हैं। 'अमलदस्तूर' की भाषा के कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं—
1. अधिकारियों द्वारा मध्य मार्ग पालन के आदेश—मक़सूद बीच का चलन गहे-सुबह और शाम तथा अधी रात को साए नहीं —साहब का भजन करे
2. मृत्यु दंड—अर चूक मारणे की ही होई तो मेरी दरगाह भेजे।
उन्नीसवीं शताब्दी में पूरे राजस्थान की रियासतों के कामकाज की भाषा हिंदी थी। ग्वालियर रियासत ने तो 27 नवंबर 1853 ई. को फ़ारसी शब्दों का प्रयोग करने पर दंड की घोषणा की थी। औरंगज़ेब के बाद जब मराठों ने प्रयाग काशी तक अपना शासन फैलाया तो उन्हें हिंदी को अपने राजकाज की भाषा बनाना पड़ा। मुग़लों और मराठों के शासन में विभिन्न विषयों पर उनके कार्य की प्रवृत्ति के अनुसार विभिन्न प्रकार के पत्र लिखे जाते थे, जैसे—सनद, रुक्का, टीप, आज्ञापत्र आदि। इस पद्धति का अनुसरण आज के राजकाज मैं भी किया जाता है। 'टीप' वर्तमान 'टिप्पणी' का ही पूर्व रूप है।
ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब भारत में प्रशासन की दृष्टि से हस्तक्षेप किया तो राजनैतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए हिंदी का ही आश्रय लिया। परंतु ब्रिटिश सरकार ने अनुभव किया कि हिंदी का कोई विकल्प नहीं है। अतः सन् 1881 में भारत में आनेवाले सिविल सर्विस के उच्चाधिकारियों के लिए हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान अनिवार्य कर दिया गया। बिहार में सन् 1875 से न्याय-क्षेत्र में हिंदी का आरंभ हो गया था, परंतु सन् 1881 में प्रांतीय अदालतों के लिए हिंदी को एकमात्र भाषा घोषित कर दिया गया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार चाहकर भी राजकाज में कभी हिंदी की उपेक्षा नहीं कर पाई। भारत के स्वाधीन होने पर तो हिंदी को संविधान में राजभाषा का स्थान दिया ही गया है। यद्यपि राजनैतिक विवशताओं के कारण अँग्रेज़ी भी आज भारत में सह राजभाषा के पद पर है तथापि हिंदी एक समर्थ और विकसित राजभाषा के रूप में अपना स्थान बनाए हुए है।
भारतीय संविधान में राजभाषा संबंधी प्रावधान
भारत के संविधान के सत्रहवें भाग के चार अध्यायों में राजभाषा संबंधी प्रावधान हैं। प्रथम अध्याय में (343 एवं 344 अनुच्छेदों में) संघ की भाषा के संबंध में निर्देश दिए गए हैं। द्वितीय अध्याय में (345, 346 तथा 347 अनुच्छेदों में) राजभाषा के रूप में प्रांतीय भाषाओं के प्रयोग के संबंध में बताया गया है। तृतीय अध्याय में (348 तथा 349 अनुच्छेदों में) उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की भाषा के संबंध में निर्देश हैं। चौथे अध्याय में (350 तथा 351 अनुच्छेदों में) व्यथा के निवारण हेतु अभिवेदन में प्रयुक्त भाषा और हिंदी भाषा के विकास के संबंध में विशिष्ट निर्देश दिए गए हैं। इन अनुच्छेदों में किए गए प्रावधानों से यह बात स्पष्ट है कि हमारे संविधान में विवेकपूर्ण भाषा नीति को अपनाया गया है।
ये प्रावधान इस प्रकार हैं—
संघ की राजभाषा
संविधान का अनुच्छेद-343
1. संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप, भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।
2. खंड (1) में किसी बात के होते हुए भी इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि के लिए संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग जारी रहेगा जिनके लिए प्रारंभ के ठीक पहले उसका प्रयोग होता था; परंतु राष्ट्रपति उक्त कालावधि में आदेश द्वारा संघ के राजकीय प्रयोजनों में से किसी के लिए अँग्रेज़ी भाषा के साथ-साथ हिंदी देवनागरी रूप का प्रयोग प्राधिकृत कर सकेंगे।
इस अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी संसद विधि द्वारा उक्त पंद्रह साल की अवधि के पश्चात्—
(क) अँग्रेज़ी भाषा का, अथवा
(ख) अंकों के देवनागरी रूप का
ऐसे प्रयोजनों के लिए प्रयोग उपबंधित कर सकेगी जैसे कि ऐसी विधि में उल्लिखित हों।
राजभाषा के लिए आयोग और संसद-समिति
अनुच्छेद-344
1. राष्ट्रपति, इस संविधान के लागू होने से पाँच वर्ष की समाप्ति पर तथा तत्पश्चात् ऐसे प्रारंभ से दस वर्ष की समाप्ति पर, आदेश द्वारा एक आयोग गठित करेंगे जो एक अध्यक्ष और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित भिन्न भाषाओं का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जैसे कि राष्ट्रपति नियुक्त करे, तथा आयोग द्वारा अनुसरण की जानेवाली प्रक्रिया के भी आदेश परिभाषित करेंगे।
2. राष्ट्रपति को :
(क) संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी भाषा के उत्तरोत्तर अधिक प्रयोग के;
(ख) संघ के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए अँग्रेज़ी भाषा के प्रयोग पर निर्बंधनों के;
(ग) अनुच्छेद 348 में वर्णित प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए प्रयोग की जानेवाली भाषा के;
(घ) संघ के किसी एक या अधिक उल्लिखित प्रयोजनों के लिए प्रयोग किए 'जाने वाले अंकों के रूप के;
(ङ) संघ की राजभाषा तथा संघ और किसी राज्य के बीच अथवा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच संचार की भाषा तथा उनके प्रयोग के बारे में राष्ट्रपति द्वारा आयोग से पृच्छा किए हुए किसी अन्य विषय के बारे मैं सिफ़ारिश करने का आर्योग का कर्त्तव्य होगा।
(3) खंड (2) के अधीन अपनी सिफ़ारिशें करने में आयोग भारत की औद्योगिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक उन्नति का तथा लोक सेवाओं के बारे में अहिंदी भाषा-भाषी क्षेत्रों के लोगों के न्यायपूर्ण दावों और हितों का सम्यक् ध्यान रखेगा।
(4) तीस सदस्यों की एक समिति गठित की जाएगी जिसमें से बीस लोकसभा के सदस्य होंगे तथा दस राज्यसभा के सदस्य होंगे जो कि क्रमशः लोकसभा के सदस्यों तथा राज्यसभा के सदस्यों द्वारा प्रतिनिधित्व-पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे।
(5) खंड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफ़ारिशों की परीक्षा करना तथा उन पर अपनी राय का प्रतिवेदन राष्ट्रपति को करना समिति का कर्त्तव्य होगा।
(6) अनुच्छेद 343 में किसी बात के होते हुए भी राष्ट्रपति खंड (5) में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् उस सारे प्रतिवेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निर्देश निकाल सकेंगे।
भाषाएँ : राज्य की राजभाषा/राजभाषाएँ
अनुच्छेद 345
अनुच्छेद 346 और 347 के उपबंधों के अधीन रहते हुए राज्य का विधान-मंडल विधि द्वारा उस राज्य के राजकीय प्रयोजनों में से सब या किसी के लिए प्रयोग के अर्थ राज्य में प्रयुक्त होने वाली भाषाओं में से किसी एक या अनेक को या हिंदी को अंगीकार कर सकेगा :
परंतु जब तक राज्य का विधान-मंडल विधि द्वारा इससे अन्यथा उपबंध न करे तब तक राज्य के भीतर उन राजकीय प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा प्रयोग की जाती रहेगी जिनके लिए इस संविधान के लागू होने के ठीक पहले वह प्रयोग की जाती थी।
एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच में अथवा राज्य और संघ के बीच में संचार के लिए राजभाषा
अनुच्छेद 346
संघ में राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने के लिए तत्समय प्राधिकृत भाषा एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच में तथा किसी राज्य और संघ के बीच में संचार के लिए राजभाषा होगी—
परंतु यदि दो या अधिक राज्य करार करते हैं कि ऐसे राज्यों के बीच में संचार के लिए राजभाषा हिंदी भाषा होगी तो ऐसे संचार के लिए वह भाषा प्रयोग की जा सकेगी।
किसी राज्य में जनसमुदाय के किसी विभाग द्वारा बोली जानेवाली भाषा के संबंध में विशेष अनुबंध
अनुच्छेद 347
तद्विषयक माँग किए जाने पर यदि राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि किसी राज्य के जनसमुदाय का पर्याप्त अनुपात चाहता है कि उसके द्वारा बोली जानेवाली किसी भाषा को राज्य द्वारा मान्यता दी जाए तो वे निदेश दे सकेंगे कि ऐसी भाषा को भी उस राज्य में सर्वत्र अथवा उसके किसी भाग में ऐसे प्रयोजन के लिए, जैसा कि वे उल्लिखित करें, राजकीय मान्यता दी जाए।
उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों की भाषा
अनुच्छेद 348
(1) इस भाग के पूर्ववर्ती उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे, तब तक—
(क) उच्चतम न्यायालय में तथा प्रत्येक उच्च न्यायालय में सब कार्यवाहियाँ,
(ख) जो—
(i) विधेयक, अथवा उन पर प्रस्तावित किए जाने वाले जो संशोधन संसद के प्रत्येक सदन में अथवा राज्य के विधान-मंडल के सदन या प्रत्येक सदन में पुनःस्थापित किए जाएँ, उन सबके प्राधिकृत पाठ,
(ii) अधिनियम संसद द्वारा या राज्य के विधान-मंडल द्वारा पारित किए जाएँ, तथा जो अध्यादेश राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित किए जाएँ, उन सबके प्राधिकृत पाठ, तथा
(iii) आदेश, नियम, विनियम और उपविधि इस संविधान के अधीन, अथवा संसद या राज्यों के विधान-मंडल द्वारा निर्मित किसी विधि के अधीन, निकाले जाएँ, उन सबके प्राधिकृत पाठ, अँग्रेज़ी भाषा में होंगे।
(2) खंड (1) के उपखंड (क) में किसी बात के होते हुए भी किसी राज्य का राज्यपाल राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से हिंदी भाषा का या उस राज्य में राजकीय प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होनेवाली किसी अन्य भाषा का प्रयोग उस राज्य में मुख्य स्थान रखनेवाले उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों के लिए प्राधिकृत कर सकेगा—परंतु इस खंड की कोई बात वैसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय आज्ञप्ति अथवा आदेश पर लागू न होगी।
(3) खंड (1) के उपखंड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी राज्य के विधान मंडल ने, उस विधान मंडल में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उपखंड की कंडिका (iii) मे निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि में प्रयोग के लिए अँग्रेज़ी भाषा से अन्य किसी भाषा के प्रयोग को विहित किया है, वहाँ उस राज्य के राजकीय सूचना-पत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अँग्रेज़ी में उसका अनुवाद उस खंड के अभिप्रायों के लिए उसका अँग्रेज़ी भाषा में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।
भाषा संबंधी कुछ विधियों को अधिनियमित करने के लिए विशेष प्रक्रिया
अनुच्छेद 349
इस संविधान के लागू होने की पंद्रह वर्षों की कालावधि तक अनुच्छेद 348 के खंड (1) में वर्णित प्रयोजनों में से किसी के लिए प्रयोग की जानेवाली भाषा के लिए उपबंध करनेवाला कोई विधेयक या संशोधन संसद के किसी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंज़ूरी के बिना पुरःस्थापित या प्रस्तावित नहीं किया जाएगा तथा ऐसे किसी विधेयक के पुरःस्थापित अथवा ऐसे किसी संशोधन के प्रस्तावित किए जाने की मंज़ूरी अनुच्छेद 344 के खंड (1) के अधीन गठित आयोग की सिफ़ारिशों पर तथा उस अनुच्छेद के खंड (4) के अधीन गठित समिति के प्रतिवेदन पर विचार करने के पश्चात् ही राष्ट्रपति देंगे।
अनुच्छेद 350
किसी व्यथा के निवारण के लिए संघ या राज्य के किसी पदाधिकारी या प्राधिकारी को यथास्थिति संघ में या राज्य में या राज्य में प्रयोग होने वाली किसी भाषा में अभिवेदन देने का प्रत्येक व्यक्ति को हक़ होगा।
हिंदी भाषा के विकास के लिए विशेष निर्देश
अनुच्छेद 351
हिंदी भाषा की प्रसार वृद्धि करना, उसका विकास करना, ताकि वह भारत की सामाजिक संस्कृति के सब तत्त्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम हो सके तथा उसको आत्मीयता में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्तानी और अष्टम अनुसूची में उल्लिखित अन्य भारतीय भाषाओं के रूप, शैली और पदावली को आत्मसात करते हुए तथा जहाँ तक आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द-भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से तथा गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करना संघ का कर्त्तव्य होगा।
संसद में प्रयुक्त होने वाली भाषा
अनुच्छेद 120
(1) भाग 17 किसी बात के होते हुए भी, किंतु अनुच्छेद 348 के उपबंधों के अधीन रहते हुए संसद में कार्य हिंदी में या अँग्रेज़ी में किया जाएगा। परंतु, यथास्थिति, राज्यसभा का सभापति या लोकसभा का अध्यक्ष अथवा ऐसे रूप में कार्य करनेवाला व्यक्ति किसी सदस्य को जो हिंदी या अँग्रेज़ी में अपनी पर्याप्त अभिव्यक्ति नहीं कर सकता, अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा।
(2) जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि की समाप्ति के पश्चात् अनुच्छेद ऐसे प्रभावी होगा मानो कि 'या अँग्रेज़ी में' ये शब्द उसमें से लुप्त कर दिए गए हों। परंतु हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और त्रिपुरा के राज्य विधान मंडलों के संबंध में यह खंड इस प्रकार प्रभावी होगा मानो कि उसमें आनेवाले 'पंद्रह वर्ष' शब्दों के स्थान पर 'पच्चीस वर्ष' शब्द रख दिए गए हों।
भारतीय संविधान के सत्रहवें भाग के कथित चारों अध्यायों के उपर्युक्त अनुच्छेदों (343 से 351) के प्रावधानों को संक्षेप में इस प्रकार समझा जा सकता है—
संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार संघ की राजभाषा देवनागरी लिपि में लिखित हिंदी है। संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि (26 जनवरी 1965) तक सभी सरकारी कामकाज के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग पूर्ववत होता रहेगा। अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति संविधान के प्रारंभ से पाँच वर्षों के बाद और फिर प्रारंभ से दस वर्षों के पश्चात् एक राजभाषा आयोग का गठन करेंगे। इसका मुख्य उद्देश्य था कि वे राजभाषा हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के बारे में अँग्रेज़ी के प्रयोग पर रोक लगाने के बारे में सिफ़ारिश करें। इन आयोगों की सिफ़ारिशों पर विचार करने तथा उन पर अपना प्रतिवेदन राष्ट्रपति को प्रस्तुत करने के लिए संसद के तीस सदस्यों (20 लोकसभा और 10 राज्य सभा के) की एक समिति की स्थापना की भी व्यवस्था थी।
अनुच्छेद 345 के अनुसार राज्य का विधानमंडल विधि द्वारा एक या अधिक प्रादेशिक भाषाओं अथवा हिंदी को सरकारी प्रयोजनों के लिए स्वीकार कर सकेगा।
अनुच्छेद 346 में यह व्यवस्था है कि एक राज्य और दूसरे राज्य के बीच तथा राज्य और संघ के बीच में पत्र-व्यवहार के लिए संघ की राजभाषा का ही प्रयोग होगा।
अनुच्छेद 347 के अनुसार यदि किसी राज्य के जनसमुदाय का एक पर्याप्त अनुपात में अपने द्वारा बोली-समझी जानेवाली भाषा को राज्य द्वारा अभिज्ञात कराना चाहे तो राष्ट्रपति उस भाषा को सरकारी अभिज्ञा देने के अधिकारी हैं।
अनुच्छेद 348 में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों आदि की भाषा की व्यवस्था है। इसके अनुसार जब तक संसद विधि द्वारा अन्य उपबंध न करे तब तक न्यायालयों में सभी कार्य अँग्रेज़ी भाषा में होंगे।
अनुच्छेद 349 में यह व्यवस्था है कि संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्षों की अवधि तक अँग्रेज़ी के स्थान पर कोई दूसरी भाषा प्राधिकृत पाठ के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती।
अनुच्छेद 350 में भाषागत अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित रखा गया है।
अनुच्छेद 351 के अनुसार संघ सरकार का कर्त्तव्य है कि वह हिंदी भाषा के विकास एवं प्रसार हेतु समुचित प्रयत्न करेगी जिससे वह सारे देश में प्रयुक्त हो सके और भारत की मिली-जुली संस्कृति को अभिव्यक्त कर सके। इसके लिए संविधान में इस बात का भी निर्देश किया गया है कि हिंदी में अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को समाहित कर उसके शब्द-भंडार को समृद्ध किया जाए।
भारतीय संविधान में स्वीकृत भाषा-नीति की समीक्षा
भारतीय संविधान में स्वीकृत इस भाषा-नीति में कुछ बातें विशेष रूप से ध्यातव्य हैं। उदाहरणार्थ, अनुच्छेद 343 के भाग 3 में संसद को यह अधिकार दिया गया है कि वह पंद्रह वर्ष के बाद विधि द्वारा अँग्रेज़ी भाषा को प्रतिबंधित कर सकती है। हम जानते हैं कि प्रारंभिक पंद्रह वर्षों में अँग्रेज़ी को सह राजभाषा इसलिए नहीं बनाया गया था कि हिंदी राजकाज चलाने में अक्षम थी बल्कि अँग्रेज़ी भाषा में काम करने के अभ्यस्त कर्मचारियों के लिए नए भाषा माध्यम को अपनाने के लिए समय देना उचित समझा गया होगा। संविधान निर्माता यह भी चाहते हैं प्रगति कि पारिभाषिक शब्दावली आदि की दृष्टि से हिंदी और प्रगति कर ले। परंतु उपर्युक्त प्रावधान का अर्थ यह निकला कि संसद के लिए पंद्रह वर्ष बाद अँग्रेज़ी को प्रतिबंधित करना अनिवार्य नहीं किया गया। इसके भयंकर परिणाम हुए। संसद अँग्रेज़ी वालों के दबाव में निरंतर झुकती गई और अँग्रेज़ी आज पैंसठ वर्ष बाद भी सह राजभाषा बनी हुई है और इस बीच भाषाई दंगों में अनेक लोग अपनी जान गवा चुके हैं।
अनुच्छेद 348 के अनुसार उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की सभी कार्यवाही अँग्रेज़ी में होगी तथा संसद, विधानमंडलों में पारित विधेयक और राष्ट्रपति तथा राज्यपालों द्वारा जारी सभी अध्यादेश, आदेश, विनियम, नियम आदि के प्राधिकृत पाठ अँग्रेज़ी भाषा में ही मान्य होंगे। इसका तात्पर्य है कि संविधान निर्माता विधि के क्षेत्र में हिंदी की क्षमता के प्रति संदेहशील थे। हिंदी मुग़लों और अँग्रेज़ी के समय में विधि की भाषा नहीं थी अतः यह सोच स्वाभाविक थीं। परंतु इसके लिए हिंदी को सक्षम बनाने की दृष्टि से कोई समय सीमा निश्चित नहीं की गई और इस प्रकार संसद को यह छूट दे दी गई कि वह इस ओर हिंदी की प्रगति की गति से निश्चित होकर अँग्रेज़ी को जारी रखे। इसका एक दुष्परिणाम यह है कि आज भी, भारत का शिक्षित व्यक्ति भी, विधि के क्षेत्र में स्वयं को अनपढ़ मानता है। एक प्रकार से यह अनुच्छेद अँग्रेज़ी के एकछत्र साम्राज्य की स्थापना करनेवाला है।
अनुच्छेद 349 के अनुसार 26 जनवरी 1965 तक अँग्रेज़ी का ही प्राधिकृत पाठ मान्य रहेगा किंतु किसी अन्य भाषा के प्राधिकृत पाठ हेतु भाषा आयोग तथा संसदीय समिति के प्रतिवेदनों और सिफ़ारिशों पर विचार करने के पश्चात् राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति प्रदान कर सकता है। इस अनुच्छेद में भी हिंदी का विकास अनिवार्य न कर राष्ट्रपति और अंततः संसद अथवा सरकार की अनुकंपा पर छोड़ दिया गया है।
अनुच्छेद 344 में राजभाषा के लिए आयोग तथा (30 सदस्यीय) संसदीय राजभाषा समिति गठित करने हेतु प्रावधान किया गया है। इस अनुच्छेद के कारण हिंदी के प्रयोग में कुछ प्रगति संभव हुई है। अनुच्छेद 350 में भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुरक्षित रखा गया है। यह निश्चय ही भारत में कुछ हिंदीतर भाषाओं की प्रगति में सहायक है।
संविधान का अनुच्छेद 351 सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इस अनुच्छेद के अनुसार संघ का कर्त्तव्य है कि यह हिंदी भाषा के विकास एवं प्रसार हेतु समुचित संस्कृति को अभिव्यक्त कर सके। यह अनुच्छेद कई बातों की ओर संकेत करता है। उदाहरणार्थ, इससे धर्मनिरपेक्षता की भावना को बल मिलता है। यदि हिंदी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, शैव, जैन आदि सभी धर्मों, संप्रदायों और संस्कृतियों को अभिव्यक्ति देगी तो निश्चय ही देश की धार्मिक, सांस्कृतिक, सांप्रदायिक एकता को बढ़ावा मिलेगा। इसमें हिंदी के माध्यम से संपूर्ण देश को जोड़ने की बात भी कही गई है, इस दृष्टि से हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में विकसित करने की बात भी इस अनुच्छेद में समाहित हो गई है। जब हिंदी सभी धर्मों, संस्कृतियों और भाषाओं के संपर्क सूत्र का कार्य करेगी तो स्वाभाविक रूप से उसके शब्द भंडार का भी विकास होगा। संविधान में यह बात अन्यत्र कही भी गई है कि हिंदी मुख्यतः संस्कृत तथा गौणतः अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ग्रहण कर स्वयं को समृद्ध करे। इस अनुच्छेद की भावना भी इसी प्रकार की है। इससे हिंदी तथा हिंदीतर भाषाओं के बीच साहित्यिक आदान-प्रदान की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।
राजभाषा संबंधी उपर्युक्त अनुच्छेदों में 'हिंदी' का उल्लेख दो स्थानों पर हुआ है; अनुच्छेद 343 में संघ की राजभाषा के रूप में तथा अनुच्छेद 351 में उल्लिखित अष्टम अनुसूची में बताई गई 17 अन्य भारतीय भाषाओं के साथ। इससे दो भिन्न प्रकार की हिंदी-संघीय और प्रादेशिक का अर्थ कुछ विद्वानों ने ग्रहण किया है। इस संबंध में डॉ. मलिक मोहम्मद का कहना है—कुछ हिंदी-भाषा विद्वानों ने हिंदी के इन दोनों रूपों की कल्पना से भयभीत होकर यह साबित करने का प्रयास किया है कि संविधान-निर्माताओं का कभी भी हिंदी के दो रूप को मानने का उद्देश्य नहीं था। दो जगहों पर हिंदी का उल्लेख होने से कोई आशंका भी नहीं है। संविधान के निर्माताओं ने उचित ढंग से ही यह आशा की थी कि राजभाषा हिंदी अपने भावी रूप का विकास करने में अन्य भारतीय भाषाओं का सहारा लेगी। यह इसलिए था कि राजभाषा हिंदी को सबके लिए सुलभ और ग्राह्य रूप धारण करना है और इस प्रक्रिया में वह सभी भारतीय भाषाओं में सरल से सरल शब्दों और शैलियों को अपना सकती है। इससे अष्टम अनुसूची में उल्लिखित हिंदी की शैली से कोई टकराहट नहीं है। हिंदी प्रादेशिक भाषा के रूप में भी अपना साहित्यिक स्वरूप बनाए रख सकती है। इस प्रकार हिंदी की दो शैलियों—साहित्यिक और आमफ़हम—का विकास हो सकता है। इस स्थिति से घबराने की कोई बात नहीं है। हिंदी के विकास में सभी भारतीय भाषाओं का सहयोग अपेक्षित और वांछनीय है। हिंदी के राष्ट्रीय स्वरूप का महत्त्व इसी में है कि वह अन्य भारतीय भाषाओं को भी अपने में आत्मसात करे। अनुच्छेद 351 हिंदी भाषा के निरंतर विकास में ही यह कल्पना करता है। यह संविधान-विषयक भाषा-नीति का मुख्य अंग है। इसके आलोक में हमें हिंदी के प्रगामी प्रयोग, अभिवृद्धि एवं विकास के विषय में दिशाएँ निर्धारित करनी हैं।
राजभाषा अधिनियम
राजभाषा अधिनियम 1963
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 344 के अनुसार राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया था कि वे संविधान लागू होने के पाँच वर्ष बाद एक राजभाषा आयोग नियुक्त कर सकते हैं। जून, 1955 में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त इस आयोग ने एक वर्ष बाद राजभाषा के प्रगामी प्रयोग के संबंध में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। राजनीतिक लाभ की दृष्टि से दक्षिण भारत में हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का विरोध हुआ। नेहरू जी ने स्पष्ट किया कि हिंदी किसी पर ज़बरदस्ती नहीं थोपी जाएगी। परिणामस्वरूप संसद ने 1963 में एक राजभाषा अधिनियम पारित किया। यह अधिनियम ही राजभाषा अधिनियम 1963 के नाम से ख्यात है। अधिनियम संघ के राजकीय प्रयोजनों, संसद कार्य, केंद्रीय और राज्य अधिनियमों तथा उच्च न्यायालयों में कुछ प्रयोजनों के लिए प्रयोग में लाई जानेवाली भाषा के संबंध में है। अधिनियम इस प्रकार है—
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
धारा 1 : (i) यह अधिनियम राजभाषा अधिनियम, 1963 कहा जा सकेगा। (ii) धारा 3, जनवरी 1965 के 26 वें दिन को प्रवृत्त होगी और इस अधिनियम के शेष उपबंध उस तारीख़ को प्रवृत्त होंगे जिसे केंद्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए विभिन्न तारीख़ें नियत की जा सकेंगी।
परिभाषाएँ
धारा 2 : इस अधिनियम में, जब तक कि प्रसंग से अन्यथा अपेक्षित न हो—(क) 'नियत दिन' से, धारा 3 के संबंध में, जनवरी 1965 का 26 वाँ दिन अभिप्रेरित है और इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में वह दिन अभिप्रेत है जिस दिन को वह उपबंध प्रवृत्त होता है; (ख) 'हिंदी' से वह हिंदी अभिप्रेत है जिसकी लिपि देवनागरी है।
संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए और संसद में प्रयोग के लिए अँग्रेज़ी का बना रहना
धारा 3 : (i) संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि की समाप्ति हो जाने पर भी, हिंदी के अतिरिक्त अँग्रेज़ी भाषा नियत दिन से ही—
(क) संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए जिनके लिए वह उस दिन से ठीक पहले प्रयोग में लाई जाती थी; तथा
(ख) संसद में कार्य-निष्पादन के लिए;
प्रयोग में लाई जाती रह सकेगी—
परंतु संघ और किसी ऐसे राज्य के बीच, जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप नहीं अपनाया है, पत्रादि के प्रयोजनों के लिए अँग्रेजी भाषा प्रयोग में लाई जाएगी :
परंतु यह और कि जहाँ किसी ऐसे राज्य के, जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाया है और किसी अन्य राज्य के जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, बीच पत्रादि के प्रयोजनों के लिए हिंदी को प्रयोग में लाया जाता है, वहाँ हिंदी में ऐसे पत्रादि के साथ-साथ उसका अनुवाद अँग्रेज़ी भाषा में भेजा जाएगा—
परंतु यह और भी कि इस उपधारा की किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी ऐसे राज्य को जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संघ के साथ या किसी ऐसे राज्य के साथ जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाया है, या किसी अन्य राज्य के साथ पत्रादि के प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग बाध्यकर न होगा।
(ii) और (i) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी जहाँ, पत्राादि के प्रयोजनों के लिए हिंदी या अँग्रेज़ी भाषा—
(क) केंद्रीय सरकार के एक मंत्रालय या विभाग या कार्यालय के और दूसरे मंत्रालय या विभाग या कार्यालय के बीच;
(ख) केंद्रीय सरकार के एक मंत्रालय या विभाग या कार्यालय के और केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी या उसके किसी कार्यालय के बीच;
प्रयोग में लाई जाती है वहाँ उस तारीख़ तक, जब तक पूर्वोक्त संबंधित मंत्रालय, विभाग, कार्यालय या निगम या कंपनी का कर्मचारी वर्ग हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता, ऐसे पत्रादि का अनुवाद, यथास्थिति, अँग्रेज़ी भाषा या हिंदी में भी दिया जाएगा—
(iii) उपधारा (i) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, हिंदी और अँग्रेज़ी भाषा दोनों में ही—
(क) संकल्पों, सामान्य आदेशों, नियमों, अधिसूचनाओं, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदनों या प्रेस विज्ञप्तियों के लिए, जो केंद्रीय सरकार द्वारा या उसके किसी मंत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी द्वारा या ऐसे निगम या कंपनी के किसी कार्यालय द्वारा निकाले जाते हैं या किए जाते हैं;
(ख) संसद के किसी सदन या सदनों के समक्ष रखे गए प्रशासनिक तथा अन्य प्रतिवेदनों और राजकीय काग़ज़ पत्रों के लिए;
(ग) केंद्रीय सरकार या उसके किसी मंत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या उसकी ओर से या केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी द्वारा या ऐसे निगम या कंपनी के किसी कार्यालय द्वारा निष्पादित संविदाओं और कराते के लिए तथा निकाली गई अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापत्रों, सूचनाओं और निविदा-प्रारूपों के लिए प्रयोग में लाई जाएगी।
(iv) उपधारा (i), उपधारा (ii) या उपधारा (iii) के अनुबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना केंद्रीय सरकार, धारा 8 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा उस भाषा या उन भाषाओं को उपबंध कर सकेगी जिसे या जिन्हें संघ के राजकीय प्रयोजन के लिए, जिसके अंतर्गत किसी मंत्रालय, विभाग, अनुभाग या कार्यालय का कार्यकरण है, प्रयोग में लाया जाना है और ऐसे नियम बनाने में राजकीय कार्य के शीघ्रता और दक्षता के साथ निपटारे का तथा जन-साधारण के हितों का सम्यक् ध्यान रखा जाएगा और इस प्रकार बनाए गए नियम विशिष्टतया यह सुनिश्चित करेंगे कि जो व्यक्ति संघ के कार्य-कलाप के संबंध में सेवा कर रहे हैं और जो या तो हिंदी में या अँग्रेज़ी भाषा में प्रवीण हैं वे प्रभावी रूप में अपना काम कर सकें और यह भी कि केवल इस आधार पर कि वे दोनों ही भाषाओं में प्रवीण नहीं हैं, उनका कोई अहित नहीं होता है।
(v) उपधारा (i) के खंड (क) के उपबंध और उपधारा (ii), उपधारा (iii) और उपधारा (iv) के उपबंध तब तक प्रवृत्त बने रहेंगे जब तक उनमें वर्णित प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए सभी राज्यों के विधान मंडलों द्वारा, जिन्होंने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित कर नहीं दिए जाते और जब तक पूर्वोक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के पश्चात् ऐसी समाप्ति के लिए संसद के हर एक सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं कर दिया जाता।
धारा 4 : (i) जिस तारीख़ को धारा 3 प्रवृत्त होती है उससे दस वर्ष की समाप्ति के पश्चात् राजभाषा के संबंध में एक समिति इस विषय का संकल्प संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व मंज़ूरी से प्रस्तावित और दोनों सदनों द्वारा पारित किए जाने पर गठित की जाएगी।
(ii) इस समिति में तीस सदस्य होंगे जिनमें से बीस लोकसभा के सदस्य होते तथा दस राज्यसभा के सदस्य होंगे जो क्रमश: लोकसभा के सदस्य तथा राज्यसभा के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित होंगे।
(iii) इस समिति का कर्त्तव्य होगा कि यह संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए हिंदी के प्रयोग में की गई प्रगति का पुनर्विलोकन करे और उस पर सिफ़ारिशें करते हुए राष्ट्रपति को प्रतिवेदन करे और राष्ट्रपति उस प्रतिवेदन को संसद के हर एक सदन के समक्ष रखवाएँगे और सभी राज्य सरकारों को भिजवाएँगे।
(v) राष्ट्रपति उपधारा (iii) में निर्दिष्ट प्रतिवेदन पर और उस पर राज्य सरकारों ने यदि कोई मत अभिव्यक्त किए हों तो उन पर विचार करने के पश्चात् उस समस्त प्रतिवेदन के या उसके किसी भाग के अनुसार निदेश निकाल सकेंगे।
परंतु इस प्रकार निकाले गए निदेश धारा 3 के उपबंधों से असंगत नहीं होंगे।
केंद्रीय अधिनियमों आदि का प्राधिकृत हिंदी अनुवाद
धारा 5 : (i) नियत दिन को और उसके पश्चात् शासकीय राजपत्र में राष्ट्रपति के प्राधिकार से प्रकाशित—
(क) किसी केंद्रीय अधिनियम का या राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित किसी अध्यादेश का, अथवा—
(ख) संविधान के अधीन या किसी केंद्रीय अधिनियम के अधीन निकाले गए किसी आदेश, नियम, विनियम या उपविधि का—
हिंदी में अनुवाद उसका हिंदी में प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।
(ii) नियत दिन से ही उन सब विधेयकों के, जो संसद के किसी भी सदन में पुरःस्थापित किए जाने हों और उन सब संशोधनों के, जो उनके संबंध में संसद के किसी भी सदन में प्रस्तावित किए जाने हों, अँग्रेज़ी भाषा के प्राधिकृत पाठ के साथ-साथ उनका हिंदी में अनुवाद भी होगा जो ऐसी रीति से प्राधिकृत किया जाएगा, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाए।
कतिपय दशाओं में राज्य अधिनियमों का प्राधिकृत हिंदी अनुवाद
धारा 6 : जहाँ किसी राज्य के विधानमंडल ने उस राज्य के विधानमंडल द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य में राज्यपाल द्वारा प्रस्थापित अध्यादेशों में प्रयोग के लिए हिंदी से भिन्न कोई भाषा विहित की है वहाँ, संविधान के अनुच्छेद 348 के खंड (3) द्वारा अपेक्षित अँग्रेज़ी भाषा में उनके अनुवाद के अतिरिक्त, उसका हिंदी में अनुवाद उस राज्य के शासकीय राजपत्र में, उस राज्य के राज्यपाल के अधिकार से, नियत दिन को या उसके पश्चात् प्रकाशित किया ज सकेगा और ऐसी दशा में ऐसे किसी अधिनियम या अध्यादेश का हिंदी में अनुवाद हिंदी भाषा में उस का प्राधिकृत पाठ समझा जाएगा।
धारा 7 : नियत दिन से ही या तत्पश्चात् किसी भी दिन से किसी राज्य को राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सम्मति से अँग्रेज़ी भाषा के अतिरिक्त हिंदी या उस राज्य की राजभाषा का प्रयोग उस राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा पारित या दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश (अँग्रेज़ी भाषा से भिन्न) ऐसी किसी भाषा में पारित किया या दिया जाता है, वहाँ उसके साथ-साथ उच्च न्यायालय के प्राधिकार निकाला गया अँग्रेज़ी भाषा में उसका अनुवाद भी होगा।
नियम बनाने की शक्ति
धारा 8 : (1) केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यांवित करने के लिए नियम, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेंगी।
(ii) इस धारा के अधीन बनाया गया हर नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, संसद के हर एक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र में हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र के, जिसमें वह ऐसे रखा गया हो, या ठीक पश्चातवर्ती सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई उपांतर करने के लिए सहमत हो जाएँ या दोनों सदन सहमत हो जाएँ कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए, तो तत्पश्चात् यथास्थिति, वह नियम ऐसे उपांतरित रूप में ही प्रभावशाली होगा या उसका कोई भी प्रभाव न होगा, किंतु इस प्रकार कि ऐसा कोई उपांतर या बातिलकरण उस नियम के अधीन पहले को गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा।
धारा 9 : धारा 6 और 7 के उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य में लागू नहीं होंगे। राजभाषा अधिनियम 1963 में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सन् 1965 के बाद भी हिंदी के साथ-साथ अँग्रेज़ी भी सह राजभाषा के रूप में प्रयुक्त होती रहेगी। इसके लिए कोई समय-सीमा भी निश्चित नहीं होगी। स्पष्ट है कि सरकार चंद अँग्रेज़ी समर्थकों के सामने झुक गई। यद्यपि लालबहादुर शास्त्री अनिश्चित काल तक अँग्रेज़ी के पक्ष में नहीं थे परंतु नेहरू जी ने संसद में कहा, मैं दो बातों में विश्वास रखता हूँ...किसी पर भी ज़बरदस्ती नहीं होनी चाहिए। दूसरी बात यह है कि अनिश्चित काल तक, मुझे मालूम नहीं कब तक—अँग्रेज़ी को एक अतिरिक सहयोगी भाषा के रूप में रखना चाहिए और मैं रखूँगा। मैं केवल इसमें उपलब्ध सुविधाओं के कारण ही ऐसा नहीं करना चाहता, यद्यपि इस प्रकार के लाभ की भी अवहेलना नहीं की जा सकती, परंतु इसलिए भी अँग्रेज़ी को बनाए रखना होगा क्योंकि मैं नहीं चाहता कि अहिंदी भाषी लोग ऐसा महसूस करें कि उन्नति के कुछ मार्ग उनके लिए बंद हैं क्योंकि सरकार का पत्र-व्यवहार हिंदी के माध्यम से होता है। अतः जब तक जनता की इच्छा होगी मैं अँग्रेज़ी को विकल्प भाषा बनाए रखूँगा और इस बात का निर्णय मैं हिंदी भाषा-भाषी लोगों के हाथों में नहीं वरन अहिंदी भाषा-भाषी लोगों पर छोड़ूँगा।
अँग्रेज़ी को यह अवधि छूट देने के पीछे जो भी कारण रहे हों, सत्य यह है कि इस अवसर पर नेहरू जी आवश्यकता से अधिक उदार हो गए जैसा कि बाद में फ्रैंक एंथनी ने कहा भी कि जितनी उन्होंने आशा की थी उन्हें उससे अधिक मिल गया है। नेहरू जी की इस नीति का दुष्परिणाम आज देश को भुगतना पड़ रहा है जहाँ एक ख़ास वर्ग हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति को दोयम दर्जे की सिद्ध करने पर तुला हुआ है। कार्यालयों में आज व्यावहारिक स्थिति यह है कि रूप से सह राजभाषा होने पर भी वास्तव में प्रमुख राजभाषा बन गई है। अँग्रेज़ी क़ानूनी इस अधिनियम की धारा 3(3) के अनुसरण में कार्यालयों में द्विभाषिक स्थिति निर्मित हो गई। अब संघ के सरकारी कार्यों में हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों भाषाएँ प्रयुक्त हो सकती थीं।
इस अधिनियम के अनुसार संसद तथा राज्यों की विधान सभाओं की समस्त कार्यवाही की भाषा मुख्यतः हिंदी तथा प्रादेशिक भाषाएँ होंगी, परंतु उनका प्राधिकृत अँग्रेज़ी अनुवाद भी देना होगा। इसकी धारा 5(2) के अनुसार सभी विधेयक दोनों भाषाओं में एक साथ प्रस्तुत करने तथा दोनों को प्रामाणिक मानने की व्यवस्था की गई। इस प्रकार सिद्धांतः भले ही हिंदी को प्रथम राजभाषा का दर्जा मिल गया हो, परंतु अँग्रेज़ी को भी अनिश्चित काल तक राजभाषा बने रहने की छूट मिल गई और व्यवहारतः संघ के सभी कार्यालयों में आज वह मुख्य राजभाषा बनी हुई है।
राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967
प्रस्तुत विधेयक 27 नवंबर 1967 को लोकसभा में प्रस्तुत किया गया। कुछ संशोधनों के साथ लोकसभा ने 16 दिसंबर 1967 तथा राज्य सभा ने 22 दिसंबर 1967 को इसे पारित कर दिया। 8 जनवरी 1968 को इसे राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हो गई। यह अधिनियम इस प्रकार है—
1. संक्षिप्त नाम—यह अधिनियम राजभाषा (संशोधन) अधिनियम, 1967 कहा जाएगा।
2. धारा 3 के स्थान पर नई धारा का प्रतिस्थान—राजभाषा अधिनियम, 1963 (जिसे इसमें आगे मूल अधिनियम प्रधान कहा गया है) की धारा 3 के स्थान पर निम्नलिखित धारा प्रतिस्थापित की जाएगी। अर्थात्—
3. संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए और संसद में प्रयोग के लिए अँग्रेज़ी भाषा का बना रहना
1. संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की कालावधि की समाप्ति के बाद भी हिंदी के अतिरिक्त अँग्रेज़ी भाषा, नियत दिन से ही
(क) संघ के उन सब राजकीय प्रयोजनों के लिए जिनके लिए वह उस दिन से ठीक पहले प्रयोग में लाई जाती थी, तथा
(ख) संसद में कार्य के संव्यवहार के लिए, प्रयोग में लाई जाती रह सकेगी, परंतु संघ और किसी ऐसे राज्य के बीच, जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, पत्रादि के प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा प्रयोग में लाई जाएगी;
परंतु यह और कि जहाँ किसी ऐसे राज्य के, जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में अपनाया है, और किसी अन्य राज्य के, जिसने हिंदी को अपनी राजभाग के रूप में नहीं अपनाया है, बीच पत्रादि के प्रयोजनों के लिए हिंदी को प्रयोग में लाया जाता है, वहाँ हिंदी में ऐसे पत्रादि के साथ-साथ उसका अनुवाद अँग्रेज़ी भाषा में भेजा जाएगा।
परंतु यह और भी कि इस उपधारा की किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी ऐसे राज्य को, जिसने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, या किसी अन्य के साथ उसकी सहमति से पत्रादि के प्रयोजनों के लिए हिंदी को प्रयोग में लाने से निवारित करती है, और ऐसे किसी मामले में उस राज्य के साथ पत्रादि के प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग बाध्यकर न होगा।
2. उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहाँ पत्रादि के प्रयोजनों के लिए हिंदी या अँग्रेज़ी भाषा—
(क) केंद्रीय सरकार के एक मंत्रालय या विभाग या कार्यालय के और दूसरे मंत्रालय या विभाग या कार्यालय के बीच,
(ख) केंद्रीय सरकार के एक मंत्रालय या विभाग या कार्यालय के और केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी या उसके किसी कार्यालय के बीच,
(ग) केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी उसके किसी कार्यालय के बीच किसी अन्य ऐसे निगम या कंपनी या उसके किसी कार्यालय के बीच प्रयोग में लाई जाती है, वहाँ इस तारीख़ तक जब तक पूर्वोक्त संबंधित मंत्रालय विभाग, कार्यालय या निगम या कंपनी का कर्मचारीवृंद हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता, ऐसे पत्रादि का अनुवाद यथास्थिति अँग्रेज़ी भाषा या हिंदी में भी दिया जाएगा।
3. उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, हिंदी और अँग्रेज़ी भाषा दोनों हो—
(क) संकल्पों, साधारण आदेशों, नियमों, अधिसूचनाओं, प्रशासनिक या अन्य प्रतिवेदनों या प्रेस विज्ञप्तियों के लिए, जो केंद्रीय सरकार द्वारा या उसके किसी मंत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी द्वारा या ऐसे निगम या कंपनी के किसी कार्यालय द्वारा निकाले जाते हैं या किए जाते हैं,
(ख) संसद के किसी सदन या सदनों के समक्ष रखे गए प्रशासनिक तथा अन्य प्रतिवेदनों और राजकीय काग़ज़ पत्रों के लिए,
(ग) केंद्रीय सरकार या उसके किसी मंत्रालय, विभाग या कार्यालय द्वारा या उसकी ओर से या केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में के या नियंत्रण में के किसी निगम या कंपनी द्वारा ऐसे निगम या कंपनी के किसी कार्यालय द्वारा निष्पादित संविदाओं और करारों के लिए तथा निकाली गई अनुज्ञप्तियों, अनुज्ञापनों, सूचनाओं, निविदा-प्रारूपों के लिए, प्रयोग में लाई जाएगी।
(घ) उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) के उपबंधों के प्रभाव डाले बिना यह है कि केंद्रीय सरकार धारा 8 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा उस भाषा या उन भाषाओं का उपबंध कर सकेगी जिसके या जिन्हें संघ के राजकीय प्रयोजन के लिए, जिसके अंतर्गत किसी मंत्रालय, विभाग, अनुभाग या कार्यालय का कार्यकरण है, प्रयोग में लाया जाना है और नियम बनाने में राजकीय कार्य के शीघ्रता और दक्षता के साथ निपटारे का तथा जनसाधारण के हितों का सम्यक् ध्यान रखा जाएगा और इस प्रकार बनाए गए नियम विशिष्टतया यह सुनिश्चित करेंगे कि जो व्यक्ति संघ में कार्यकलाप के संबंध में सेवा कर रहे हैं और जो या तो हिंदी में या अँग्रेज़ी भाषा में प्रवीण हैं वे प्रभावी रूप में अपना काम कर सकें और यह भी कि केवल इस आधार पर कि वे दोनों ही भाषाओं में प्रवीण नहीं हैं, उनका कोई अहित नहीं होता है।
(ङ) उपधारा (1) के खंड (क) के उपबंध और उपधारा (2) उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंध तब तक प्रवृत्त बने रहेंगे जब तक उनमें वर्णित प्रयोजनों के लिए अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यों के विधान-मंडलों द्वारा जिन्होंन हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित नहीं कर दिए जाते और जब तक पूर्वोक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के पश्चात् ऐसी समाप्ति के लिए संसद के हर एक सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं कर दिया जाता।
4. धारा 4 का संशोधन— प्रधान अधिनियम की धारा 4 की उपधारा (4) में संशोधन के लिए निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात बशर्ते इस प्रकार जारी किए गए निर्देश धारा 3 के उपबंधों के प्रतिकूल न हों।
राजभाषा (संशोधन) अधिनियम 1967 की समीक्षा
इस अधिनियम के अनुसार हिंदी को अपनाने वाले राज्यों के साथ तो केंद्र हिंदी में पत्र-व्यवहार करेगा, परंतु अन्य राज्यों के साथ पत्राचार अँग्रेज़ी में होगा। सरकारी संकल्पों, सरकारी आदेशों, नियमों, सूचनाओं, प्रशासनिक रिपोर्ट्स, प्रेस विज्ञप्ति आदि में हिंदी के साथ अँग्रेज़ी का प्रयोग भी अनिवार्यतः किया जाएगा। इसी प्रकार सरकारी संविदाओं, करारों आदि तथा लाइसेंस, परमिटों, टेंडर फ़ार्मों आदि में भी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया जाएगा।
इस प्रकार कार्यालयों में एक लंबी द्विभाषिक स्थिति प्रारंभ हो गई। प्रत्येक सरकारी कर्मचारी सरकारी कामकाज में अँग्रेज़ी या हिंदी में से किसी भी भाषा का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। हिंदी या अँग्रेज़ी ड्राफ़्ट के साथ उसे दूसरी भाषा में अनुवाद नहीं प्रस्तुत करना पड़ता। साथ ही, कुछ प्रयोजनों के लिए हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं का प्रयोग अनिवार्य कर दिया गया है। इस द्विभाषिक स्थिति का यह परिणाम हुआ कि सरकारी कर्मचारियों ने स्वतः स्फूर्त तरीक़े से हिंदी में काम को बढ़ावा नहीं दिया। दूसरी ओर, हिंदी न जाननेवाले कर्मचारियों को हिंदी सिखाने के लिए सरकार को समय-समय पर आदेश जारी करने पड़े।
राजभाषा अधिनियम, 1976
सन् 1963 में राजभाषा अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (4) तथा धारा 8 के अधीन प्राप्त शक्तियों का उपयोग करते हुए भारत सरकार ने सन् 1976 में राजभाषा अधिनियम लागू कर दिया। इसके प्रावधान निम्नलिखित हैं—
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इन नियमों का संक्षिप्त नाम राजभाषा (संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग) नियम, 1976 है।
(2) इनका विस्तार, तमिलनाडु राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है।
(3) ये राजपत्र में प्रकाशन की तारीख़ को प्रवृत्त होंगे।
2. परिभाषाएँ—
इन नियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो—
(क) 'अधिनियम' से राजभाषा अधिनियम, 1963 (1963 का 19) अभिप्रेत है।
(ख) 'केंद्रीय सरकार के कार्यालय' के अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं, अर्थात् :
1. केंद्रीय सरकार का कोई मंत्रालय, विभाग या कार्यालय,
2. केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किसी आयोग, समिति या अधिकरण का कोई कार्यालय, और
3. केंद्रीय सरकार के स्वामित्व में या नियंत्रण के अधीन किसी निगम या कंपनी का कोई कार्यालय;
(ग) 'कर्मचारी' से केंद्रीय सरकार के कार्यालय में नियोजित कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;
(घ) 'अधिसूचित कार्यालय' से नियम 10 के उपनियम (4) के अधीन अधिसूचित कार्यालय अभिप्रेत है;
(ङ) 'हिंदी में प्रवीणता' से नियम 9 में वर्णित प्रवीणता अभिप्रेत है;
(च) 'क्षेत्र क' से बिहार, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश राज्य तथा अंडमान निकोबार द्वीपसमूह एवं दिल्ली संघ राज्य क्षेत्र अभिप्रेत है;
(छ) 'क्षेत्र ख' से गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब राज्य तथा अंडमान और चंडीगढ़ संघ राज्य क्षेत्र अभिप्रेत है;
(ज) 'क्षेत्र ग' से खंड (च) और (छ) में निर्दिष्ट राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों से भिन्न राज्य तथा संघ क्षेत्र अभिप्रेत है;
(झ) 'हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान' से नियम 10 में वर्णित कार्य साधक ज्ञान अभिप्रेत है।
3. राज्यों आदि और केंद्र सरकार के कार्यालयों से भिन्न कार्यालयों के साथ पत्रादि—
1. केंद्रीय सरकार के कार्यालय से 'क्षेत्र क' में किसी राज्य का संघ राज्य क्षेत्र को या ऐसे राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में किसी कार्यालय (जो केंद्रीय सरकार का कार्यालय न हो) या व्यक्ति को पत्रादि, असाधारण दशाओं को छोड़कर हिंदी में होंगे और यदि उनमें से किसी को कोई पत्रादि अँग्रेज़ी में भेजे जाते हैं, तो उनके साथ उनका हिंदी अनुवाद भी भेजा जाएगा।
2. केंद्रीय सरकार के कार्यालय से—
(क) 'क्षेत्र ख' में किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में किसी कार्यालय (जो केंद्रीय सरकार का कार्यालय न हो) या व्यक्ति को पत्रादि मामूली तौर पर हिंदी में होंगे और यदि इनमें किसी को कोई पत्रादि अँग्रेज़ी में भेजे जाते हैं तो उनके साथ उनका हिंदी अनुवाद भी भेजा जाएगा। परंतु यदि कोई राज्य या संघ राज्यक्षेत्र यह चाहता है कि किसी विशिष्ट वर्ग या प्रवर्ग के पत्रादि या उसके किसी कार्यालय के लिए आशयित पत्रादि संबद्ध राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट अवधि तक अँग्रेज़ी या हिंदी में भेजे जाएँ और उसके साथ दूसरी भाषा में उसका अनुवाद भी भेजा जाए तो ऐसे पत्रादि उसी रीति से भेजे जाएँगे।
(ख) केंद्रीय सरकार के कार्यालय से 'क्षेत्र ग' में किसी व्यक्ति को पत्रादि हिंदी या अँग्रेज़ी में भेजे जा सकते हैं।
(3) केंद्रीय सरकार के कार्यालय से 'क्षेत्र ग' में किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र को या ऐसे राज्य में किसी कार्यालय (जो केंद्रीय सरकार का कार्यालय न हो) या व्यक्ति को पत्रादि अँग्रेज़ी में होंगे।
(4) उपनियम (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, 'क्षेत्र ग' में केंद्रीय सरकार के कार्यालय से 'क्षेत्र ख' में किसी राज्य या संघ राज्य क्षेत्र को या ऐसे राज्य में किसी कार्यालय (जो केंद्रीय सरकार का कार्यालय न हो) या व्यक्ति को पत्रादि हिंदी या अँग्रेज़ी में हो सकते हैं।
4. केंद्रीय सरकार के कार्यालयों के बीच पत्रादि
(क) केंद्रीय सरकार के किसी एक मंत्रालय या विभाग के बीच पत्रादि हिंदी या अँग्रेज़ी में हो सकते हैं;
(ख) केंद्रीय सरकार के एक मंत्रालय या विभाग और 'क्षेत्र क' में स्थित संलग्न या अधीनस्थ कार्यालयों के बीच पत्रादि हिंदी में होंगे और ऐसे अनुपात में होंगे जो केंद्रीय सरकार ऐसे कार्यालयों में हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान रखनेवाले व्यक्तियों की संख्या, हिंदी में पत्रादि भेजने की सुविधाएँ और उससे संबंधित आनुषंगिक बातों को ध्यान में रखते हुए, समय-समय पर अवधारित करें।
(ग) 'क्षेत्र क' में स्थित केंद्रीय सरकार के ऐसे कार्यालयों के बीच, जो खंड (क) या खंड (ख) में विर्निदिष्ट कार्यालय से भिम्न हैं पत्रादि हिंदी में होंगे।
(घ) 'क्षेत्र क' में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों और क्षेत्र ख' या 'क्षेत्र ग' में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों के बीच पाहादि हिंदी या अँग्रेज़ी में हो सकते हैं।
(ङ) 'क्षेत्र ख' या 'ग' में स्थित केंद्रीय सरकार के कार्यालयों के बीच पत्रादि हिंदी या अँग्रेज़ी में हो सकते हैं—
परंतु जहाँ ऐसे पत्रादि—
(i) 'क्षेत्र 'क' या 'क्षेत्र ख' के किसी कार्यालयों को संबोधित हैं वहाँ, यदि आवश्यक हो तो उनका दूसरी भाषा में अनुवाद पत्रादि प्राप्त करने के स्थान पर किया जाएगा;
(ⅱ) 'क्षेत्र ग' में किसी कार्यालय को संबोधित हैं वहाँ उनका दूसरी भाषा में अनुवाद उनके साथ भेजा जाएगा—
परंतु यह और कि यदि कोई पत्रादि किसी अधिसूचित कार्यालय को संबोधित है तो दूसरी भाषा में ऐसा अनुवाद उपलब्ध कराने की अपेक्षा नहीं की जाएगी।
5. हिंदी में प्राप्त पत्रादि के उत्तर—
नियम 3 और 4 में किसी बात के होते हुए भी, हिंदी में प्राप्त पत्रादि के उत्तर केंद्रीय सरकार के कार्यालय से हिंदी में दिए जाएँगे।
6. हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों का प्रयोग—
अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट सभी दस्तावेजों के लिए हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों का प्रयोग किया जाएगा और ऐसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने वाले व्यक्तियों का यह उत्तरदायित्व होगा कि वे यह सुनिश्चित कर लें कि ऐसे दस्तावेज हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों ही में तैयार किए जाते हैं, निष्पादित किए जाते हैं और जारी किए जाते हैं।
7. आवेदन, अभ्यावेदन आदि
(i) कोई कर्मचारी आवेदन, अपील या अभ्यावेदन हिंदी या अँग्रेज़ी में कर सकता है।
(ii) जब उपनियम (i) में निर्दिष्ट कोई आवेदन, अपील या अभ्यावेदन हिंदी में किया गया हो या उस पर हिंदी में हस्ताक्षर किए गए हों तब उसका उत्तर हिंदी में दिया जाएगा।
(iii) यदि कोई कर्मचारी यह चाहता है कि सेवा संबंधी विषयों (जिनके अंतर्गत अनुशासनिक कार्यवाहियाँ भी हैं) से संबंधित कोई आदेश या सूचना, जिसका कर्मचारी पर तामील किया जाना अपेक्षित है, यथास्थिति, हिंदी या अँग्रेज़ी में होनी चाहिए तो वह उसे असम्यक् विलंब के बिना उसी भाषा में दी जाएगी।
8. केंद्रीय सरकार के कार्यालयों में टिप्पणियों का लिखा जाना
(क) कोई कर्मचारी किसी फ़ाइल पर टिप्पण या मसौदा हिंदी या अँग्रेज़ी में लिख सकता है और उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह उसका अनुवाद दूसरी भाषा में प्रस्तुत करे।
(ख) केंद्रीय सरकार का कोई भी कर्मचारी, जो हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान रखता है, हिंदी में किसी दस्तावेज के अँग्रेज़ी अनुवाद की माँग तभी कर सकता है, जब वह दस्तावेज विधिक या तकनीकी प्रकृति का है, अन्यथा नहीं।
(ग) यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई विशिष्ट दस्तावेज विधिक या तकनीकी प्रकृति का है या नहीं तो विभाग या कार्यालय का प्रधान उसका विनिश्चय करेगा।
(घ) उपनियम (क) में किसी बात के होते हुए भी, केंद्रीय सरकार, आदेश द्वारा ऐसे अधिसूचित कार्यालयों को विनिर्दिष्ट कर सकती है, जहाँ ऐसे कर्मचारियों द्वारा जिन्हें हिंदी में प्रवीणता प्राप्त है, टिप्पण, प्रारूपण और ऐसे अन्य शासकीय प्रयोजनों के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएँ, केवल हिंदी का प्रयोग किया जाएगा।
9. हिंदी में प्रवीणता
यदि किसी कर्मचारी ने—
(क) मैट्रिक (एस. एस. सी.) या उसकी समकक्ष या उससे उच्चतर कोई परीक्षा हिंदी के माध्यम से उत्तीर्ण कर ली है, या
(ख) स्नातक परीक्षा में अथवा स्नातक परीक्षा की समतुल्य या उससे उच्चतर किसी अन्य परीक्षा में हिंदी को एक वैकल्पिक विषय के रूप में लिया था; या
(ग) यदि वह इन नियमों से उपाबद्ध प्रारूप में यह घोषणा करता है कि उसे हिंदी में प्रवीणता प्राप्त है, तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने हिंदी में प्रवीणता प्राप्त कर ली है।
10. हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान
(1) (क) यदि किसी कर्मचारी ने—
(अ) मैट्रिक परीक्षा या उसकी समतुल्य या उससे उच्चतर परीक्षा हिंदी विषय के साथ उत्तीर्ण कर ली है; या
(आ) केंद्रीय सरकार की हिंदी प्रशिक्षण योजना के अंतर्गत आयोजित प्राज्ञ परीक्षा या, जहाँ उस सरकार द्वारा किसी विशिष्ट प्रवर्ग के पदों के संबंध में उस योजना के अंतर्गत कोई निम्नतर परीक्षा विनिर्दिष्ट है, तब वह परीक्षा उत्र्तीण कर ली है, या
(इ) केंद्रीय सरकार द्वारा उस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई अन्य परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है; या
(ख) यदि वह इन नियमों से उपाबद्ध प्ररूप में यह घोषणा करता है कि उसने ऐसा ज्ञान प्राप्त कर लिया है; तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर लिया है।
(ii) यदि केंद्रीय सरकार के किसी कार्यालय में कार्य करनेवाले कर्मचारियों में से अस्सी प्रतिशत ने हिंदी का ऐसा ज्ञान प्राप्त कर लिया है तो उस कार्यालय के कर्मचारियों के बारे में सामान्यतया यह समझा जाएगा कि उन्होंने हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर लिया है।
(iii) केंद्रीय सरकार या केंद्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई अधिकारी यह अवधारित कर सकता है कि केंद्रीय सरकार के किसी कार्यालय के कर्मचारियों में हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर लिया है या नहीं।
(iv) केंद्रीय सरकार के जिन कार्यालयों के कर्मचारियों ने हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कर लिया है, उन कार्यालयों के नाम, राजपत्र में, अधिसूचित किए जाएँगे।
परंतु यदि केंद्रीय सरकार की राय है कि किसी अधिसूचित कार्यालय में काम करनेवाले और हिंदी कार्यसाधक ज्ञान रखनेवाले कर्मचारियों का प्रतिशत किसी तारीख़ से, उपनियम (ii) में विनिर्दिष्ट प्रतिशत से कम हो गया है, तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित कर सकती है कि उक्त कार्यालय उस तारीख़ से अधिसूचित कार्यालय नहीं रह जाएगा।
11. मैन्युअल, संहिताएँ और प्रक्रिया संबंधी अन्य साहित्य, लेखन-सामग्री आदि—
(i) केंद्रीय सरकार के कार्यालय से संबंधित सभी मैन्युअल, संहिताएँ और प्रक्रिया संबंधी अन्य साहित्य हिंदी और अँग्रेज़ी में द्विभाषीय रूप में यथास्थिति, मुद्रित या साइक्लोस्टाइल किया जाएगा और प्रकाशित किया जाएगा।
(ii) केंद्रीय सरकार के किसी कार्यालय में प्रयोग किए जानेवाले रजिस्टरों के प्रारूप और शीर्षक हिंदी और अँग्रेज़ी में होंगे।
(iii) केंद्रीय सरकार के किसी कार्यालय में प्रयोग के लिए सभी नामपट्ट, सूचनापट्ट, पत्रशीर्ष और लिफ़ाफ़ों पर उत्कीर्ण लेख तथा लेखन-सामग्री की अन्य मदें हिंदी और अँग्रेज़ी में लिखी जाएँगी, मुद्रित या उत्कीर्ण होंगी—
परंतु यदि केंद्रीय सरकार ऐसा करना आवश्यक समझती है तो वह, साधारण या विशेष आदेश द्वारा केंद्रीय सरकार के किसी कार्यालय को इस नियम के सभी या किन्हीं उपबन्धों से छूट दे सकती है।
12. अनुपालन का उत्तरदायित्व
(क) केंद्रीय सरकार के प्रत्येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह—
(i) यह सुनिश्चित करें कि अधिनियम और इन नियमों के उपबंधों का समुचित रूप से अनुपालन हो रहा है; और
(ii) इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त और प्रभावकारी जाँच के उपाय करें।
(ख) केंद्रीय सरकार अधिनियम और इन नियमों के उपबंधों के सम्यक् अनुपालन के लिए अपने कर्मचारियों और कार्यालयों को समय-समय पर आवश्यक निर्देश जारी कर सकती है।
राजभाषा अधिनियम सन् 1976 में 9 अक्टूबर सन् 1987 को कुछ संशोधन भी किए गए, परंतु अधिनियम का मूल-भाव परिवर्तित नहीं किया गया।
राजभाषा अधिनियम 1976 (यथा संशोधित सन् 1987) की समीक्षा
1. यह अधिनियम तमिलनाडु राज्य को छोड़कर संपूर्ण भारत पर लागू होता है।
2. सरकारी काम-काज में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के लिए पूरे देश को तीन क्षेत्रों में विभक्त किया गया—'क' क्षेत्र जिसमें हिंदी भाषी राज्य—उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, अंडमान निकोबार द्वीप समूह तथा संघशासित दिल्ली हैं। 'ख' क्षेत्र में जिसमें अर्द्ध हिंदी भाषी राज्य—गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब तथा संघशासित अंडमान और चंडीगढ़ आते हैं। 'ग' क्षेत्र जिसमें 'क' और 'ख' क्षेत्रों को छोड़कर शेष सभी अहिंदी भाषी राज्य तथा संघशासित प्रदेश आते हैं।
3. केंद्रीय सरकार के कार्यालयों से 'क' तथा 'ख' क्षेत्र के सभी राज्यों तथा संघशासित प्रदेशों से पत्र-व्यवहार हिंदी में होगा। 'ख' क्षेत्रों के राज्यों में यदि अँग्रेज़ी में पत्र भेजा गया है तो उसका हिंदी अनुवाद भी साथ में भेजा जाएगा।
4. हिंदी में प्राप्त पत्रादि के उत्तर हिंदी में ही दिए जाएँगे। यदि किसी पत्र पर हिंदी में हस्ताक्षर किए गए हों तो उसका उत्तर भी हिंदी में दिया जाएगा।
5. केंद्रीय सरकार के कार्यालयों से संबंधित सभी संहिताएँ, मैनुअल तथा अन्य प्रक्रिया संबंधी सामग्री हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों में तैयार की जाएगी। सभी फ़ार्मों और रजिस्टरों में शीर्ष, नामपट्ट, सूचनापट्ट आदि द्विभाषिक रूप में तैयार किए जाएँगे।
6. सरकारी कर्मचारी अपने आवेदन आदि हिंदी अथवा अँग्रेज़ी किसी भी भाषा में दे सकते हैं परंतु वे फ़ाइलों आदि में अपनी टिप्पणियाँ केवल हिंदी में लिख सकते हैं।
7. केंद्रीय सरकार का कोई कर्मचारी जिसे हिंदी का कार्य साधक ज्ञान प्राप्त है, तकनीकी और विधिक दस्तावेजों को छोड़कर किसी भी हिंदी दस्तावेज के अँग्रेज़ी अनुवाद की माँग नहीं कर सकता।
8. जब राज्य सरकारों से हिंदी में पत्र प्राप्त हों तो मंत्रालय उनसे ऐसे पत्रों का अँग्रेज़ी में अनुवाद न माँगे। यदि आवश्यकता हो तो अँग्रेज़ी अनुवाद की व्यवस्था मंत्रालय स्वयं करें।
9. केंद्रीय सरकार तथा हिंदी भाषी क्षेत्रों के वे सभी मंत्रालय एवं विभाग जिनका आम जनता से सीधा संबंध होता है—अपने यहाँ किसी प्रमुख स्थान पर इस आशय का सूचनापट्ट लगाएँ कि वे हिंदी में भरे हुए फ़ार्म आदि सहर्ष स्वीकार करते हैं।
10. प्रत्येक कार्यालय के प्रशासनिक प्रधान का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह ध्यान रखे कि उस कार्यालय में इन नियमों का समुचित रूप से पालन किया जा रहा है।
11. दिल्ली के बाहर आयोजित की जानेवाली राजभाषा कार्यान्वयन समितियों की बैठकों में वहाँ वरिष्ठ अधिकारियों को भी आमंत्रित करने के आदेश जारी किए गए हैं जिससे वे इन बैठकों में लिए गए निर्णयों से परिचित हो सकें। साथ ही राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के बारे में अपनी सलाह दे सकें।
12. केंद्रीय हिंदी समिति के अनुमोदन से यह निर्णय लिया गया है कि अहिंदी भाषा-क्षेत्रों में स्टेशनों आदि सार्वजनिक स्थलों के नामपट्टों तथा जनता की सूचना हेतु लगाए जानेवाले सूचना बोर्डों में सबसे ऊपर क्षेत्रीय भाषा की लिपि, तत्पश्चात् देवनागरी लिपि और सबसे नीचे रोमन लिपि का प्रयोग किया जाए।
13. केंद्रीय पुलिस दलों और रक्षा सेवाओं के कर्मचारियों की नामपट्टियों में देवनागरी और कंधों पर जो बिल्ले लगाए जाते हैं उनमें केवल देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जा सकता है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि राजभाषा अधिनियम 1976 से राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग में काफ़ी गति आई तथा केंद्र सरकार के कर्मचारियों को हिंदी में काम करने के लिए प्रोत्साहन भी मिला। केंद्र सरकार राजभाषा के रूप में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर प्रयत्नशील है तथा कोई भी प्रावधान लागू करते समय इस बात का ध्यान रखा जाता है कि अहिंदी भाषी क्षेत्रों के कर्मचारियों को किसी भी प्रकार की असुविधा न हो।
- पुस्तक : हिंदी भाषा और लिपि का इतिहास (पृष्ठ 141)
- रचनाकार : मुकेश अग्रवाल
- प्रकाशन : के.एल. पचौरी प्रकाशन
- संस्करण : 2016
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