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इकाई 2 : हिंदी भाषा का स्वरूप

ikai 2 ha hindi bhasha ka svarup

मुकेश अग्रवाल

मुकेश अग्रवाल

इकाई 2 : हिंदी भाषा का स्वरूप

मुकेश अग्रवाल

और अधिकमुकेश अग्रवाल

    हिंदी भाषा का क्षेत्र एवं विस्तार

     

    (क) हिंदी भाषा क्षेत्र एवं बोलियाँ

     

    (i) हिंदी की उपभाषाएँ, बोलियाँ

     

    हिंदी का विकास शौरसेनी, मागधी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से पाँच उपभाषाओं पश्चिमी हिंदी, पहाड़ी, राजस्थानी, बिहारी और पूर्वी हिंदी के रूप में हुआ। जिनसे विभिन्न बोलियाँ विकसित हुईं।

     

    इन उपभाषाओं और बोलियों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है—

     

    पश्चिमी हिंदी

     

    शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत विद्वान प्रायः इन बोलियों की चर्चा करते हैं—हरियाणी, खड़ी बोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी और बुंदेली। ग्रियर्सन कन्नौजी को बोली न मानकर ब्रजभाषा की उपबोली मानते थे परंतु जनमत का आदर कर उन्होंने उसे स्वतंत्र बोली माना। कुछ विद्वान निमाड़ी को भी पश्चिमी हिंदी की बोली मानते हैं, परंतु ग्रियर्सन, धीरेंद्र वर्मा, उदयनारायण तिवारी आदि इसे राजस्थानी की बोली मानते हैं। भोलानाथ तिवारी एक अन्य बोली ताजुज्बेकी को भी पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत स्थान देते हैं। पश्चिमी हिंदी की खड़ी बोली के आधार पर ही हिंदी क्षेत्र की आज की मानक भाषा, भारत की राजभाषा, हिंदी भी विकसित हुई है। इसके अतिरिक्त संस्कृतनिष्ठ हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी भी खड़ी बोली के आधार पर ही विकसित हुई हैं। दक्खिनी को भी हिंदी पर ही आधारित माना जाता है, यद्यपि अनेक बातों में यह उससे पर्याप्त भिन्न है। पश्चिमी हिंदी की प्रमुख बोलियों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है।

     

    पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ

     

    1. हरियाणी

     

    हरियाणी को जाटू, देसवाली आदि नामों से भी जाना जाता है ग्रियर्सन इसे बाँगरू कहने के पक्ष में हैं। 'बाँगर' का अर्थ होता है ऊँची भूमि। यमुना के बाँगर क्षेत्र की बोली होने के कारण यह बाँगरू है। इसके हरियाणी नाम के संबध में कई मत मिलते हैं। कुछ लोगों के अनुसार हरि का यान यहाँ से गुजरा था इसलिए यह क्षेत्र हरियाणा है। डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल इसे 'आभीरायण' का तद्भव मानते हैं। सन् 1863-64 की हिसार ज़िले की सेटलमेंट रिपोर्ट में माना गया है कि इस क्षेत्र में हरिया (लकड़ी) के वनों की उपलब्धता के कारण इसे 'हरियावन' कहा गया, जो बाद में हरियाणा हो गया। इसी 'हरियाणा' की बोली 'हरियाणी' कही जाती है। हरियाणी मुख्य रूप में करनाल, रोहतक, पानीपत, कुरुक्षेत्र, जींद, हिसार आदि ज़िलों में बोली जाती है। दिल्ली और पंजाब के पश्चिमी भागों में भी हरियाणी का प्रयोग होता है। हरियाणी की मुख्य उपबोलियाँ हैं—केंद्रीय हरियाणी, बाँगरू और अहीरवाटी। केंद्रीय हरियाणी गोहाना, बहादुरगढ़, दादरी, हिसार, अगरोहा और रोहतक ज़िलों में बोली जाती है। बाँगरू का क्षेत्र—कैथल, जींद, नरवाना, कुरुक्षेत्र और करनाल आदि है। अहीरवाटी—महेंद्रगढ़, नारनौल तथा रिवाड़ी में बोली जाती है। डॉ. नानकचंद के अनुसार यह हरियाणी की एक उपबोली है जबकि अन्य विद्वान इसे राजस्थानी के अंतर्गत स्थान देना चाहते हैं। हरियाणी की लिपि देवनागरी है, परंतु कुछ लोग इसे फ़ारसी लिपि में भी लिखते रहे हैं। 1971 की जनगणना के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 62,790 है। हरियाणी में साहित्य-रचना नहीं हुई है; हाँ, लोकसाहित्य पर्याप्त मात्रा में मिलता है। 'गरीबदास' यहाँ के प्रमुख कवि हैं। हरियाणी की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

     

    ल > ळ = काळा, माळा, बादळ, धौळा

    न > ण = होणा, पाणी, उठणा, अपणा

    ड़, ढ़  >  ड, ढ = बड्डा, डेढ, पढाई 

    ध्वनिलोप = अँगूठा > गुट्ठा, इकहत्तर > कहत्तर 

    महाप्राण > अल्पप्राण = हाथ् > हात्

    व्यंजन के स्थान पर द्वित्त्व = बाब्बू, बेट्टा, उप्पर 

     

    सर्वनाम—में, मैं, मन्नँ, मत्ते, मेरै, यो, या, ईहनैं, इसतैं आदि।

     

    विशेषण—बड्डा, बड्डी, ग्यारा (11), बारा (12), तेरा (13), ठंतर (78) आदि।

     

    सहायक क्रिया—सूँ, सौं, सै, से, था, थे

     

    क्रिया विशेषण—अठै, आडै, अड़ै, हाडै, हड़ै, इत, उरै, किब, कद्, जिब, जड़ै आदि।

     

    2. खड़ी बोली

     

    खड़ी बोली पश्चिमी हिंदी की प्रमुख बोली है, जिसका विकास शौरसेनी अपभ्रंश के उत्तरी रूप से हुआ है। हिंदुस्तानी, दक्खिनी हिंदी, साहित्यिक हिंदी और उर्दू का आधार खड़ी बोली ही मानी जाती है। राहुल सांकृत्यायन और भोलानाथ तिवारी इसे कौरवी कहने के पक्षधर हैं। इसका कारण यह है कि एक तो इसका क्षेत्र वही है, जिसे पहले 'कुरु' जनपद कहा जाता था और दूसरे, आधुनिक साहित्यिक हिंदी को इस बोली से, इस नाम के आधार पर आसानी से भिन्न किया जा सकता है। सुनीति कुमार चटर्जी इसे हिन्दुस्तानी अथवा जनपदीय हिंदुस्तानी; ग्रियर्सन सिरहिंदी, सरहिंदी, वर्नाक्यूलर हिंदुस्तानी तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी सिरहिंदी नाम से अभिहित करते हैं। परंतु इसका अधिक प्रचलित नाम खड़ी बोली है। भाषा के अर्थ में खड़ी बोली शब्द का प्रयोग सबसे पहले लल्लू लाल (प्रेमसागर) तथा सदल मिश्र (नासिकेतोपाख्यान) ने किया था। इसके नामकरण के संबंध में भी विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। लल्लू लाल और गार्सा द तासी 'खड़ी' शब्द का आधार 'खरी' को मानते हैं। कामता प्रसाद गुरु और धीरेंद्र वर्मा के अनुसार इस बोली में मिलने वाली कर्कशता के कारण यह खड़ी बोली कही जाती है। चंद्रधर शर्मा गुलेरी के अनुसार ब्रजभाषा पड़ी है, ब्रजभाषा के विपरीत यह 'खड़ी' है, इसलिए यह खड़ी बोली है। गिलक्राइस्ट तथा अब्दुलहक 'खड़ी' का अर्थ 'गँवारू' करते हैं और किशोरी दास वाजपेयी के अनुसार 'खड़ी पाई' की प्रमुखता के कारण यह खड़ी बोली कहलाती है। इन सब मतों में गुरु और वर्मा का मत अधिक समीचीन लगता है।

     

    खड़ी बोली का शुद्ध रूप बिजनौर में बोला जाता है, यों विस्तृत रूप में ग्रियर्सन के अनुसार इसका क्षेत्र रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, मेरठ, मुज़फ़्फ़र नगर, सहारनपुर, देहरादून का मैदानी भाग, अंबाला (पूर्वी भाग) और पटियाला (पूर्वी भाग) है। दिल्ली तथा ब्रज के कुछ भागों में भी इसके प्रयोक्ता बड़ी संख्या में हैं। इसकी मुख्य उपबोलियाँ हैं—1. पश्चिमी खड़ी बोली (यह पंजाबी से प्रभावित है) 2. पूर्वी खड़ी बोली (यह परिनिष्ठित हिंदी के निकट है) 3. पहाड़वाली और 4. बिजनौरी। खड़ी बोली प्रायः देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। 1971 की जनगणना के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 59,89, 128 है परंतु वास्तव में इसके बोलने वाले करोड़ों की संख्या में हैं। खड़ी बोली में साहित्य रचना नहीं हुई है, परंतु लोक साहित्य की दृष्टि से यह बहुत संपन्न है। इसमें पवाड़ा, नाटक, लोककथा, लोकगीत, स्वांग आदि पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं। खड़ी बोली की प्रमुख विशेषत निम्नलिखित हैं—

     

    ऐ > ए =        पैर > पेर, है > हे

    औ > ओ =    और > ओर, दौड़ > दौड़

    इ > अ =      शिकारी > शकारी > सकारी, मिठाई > मठाई

    औ > अ =    और > अर

    ल > ळ =     जंगल > जंगळ, बलद > बळद

    न > ण =      मानुस > माणुस, सुनना > सुणणा

    मूल व्यंजन >  द्वित्त्वव्यंजन = बेटा > बेट्टा, राजा > राज्जा, रोटी > रोट्टी 

    महाप्राण के पूर्व अल्पप्राण का आगम =    देखा > देक्खा, भूखा > भुक्खा 

    अवधी व्यंजनांत (घोड़) तथा ब्रज ओकारांत (घोरो) की तुलना में आकारांतता =   घोड़ा

     

    सर्वनाम— यह > यू, यह (पु.), या (स्त्री.)

    वह > ओ, ओह (पु.), वा (स्त्री.)

    अपणा, जोण, कोण, के (क्या), किस्का, किन्का, कुच्छ, थारा, विसे

     

    विशेषण—परिनिष्ठित हिंदी के समान। विशेष—च्यार (4) ग्यारै (11), पंद्रा (15), पैला (पहला), पउवा, अद्धा, पड़वा, छट्ट आदि।

     

    क्रिया—      एकवचन                बहुवचन
                       हूँ                      हें
                       हे                      हों
                       हे                      हें
                       था                     थे
             मारू हूँ (मैं मार रहा हूँ)       मारे हें
               होत्ता हे (होता है)            होत्ते हें

     

    क्रिया विशेषण—इभी, इबजा (अभी), कद (कब), इंगै, उंगै, जिंगै, नईं, नीं, ने (नहीं) आदि।

     

    3. ब्रजभाषा

     

    ब्रजभाषा का एक अन्य नाम 'अंतर्वेदी' भी है। कुछ लोग इसे माथुरी या नागभाषा भी कहते हैं। इसका उद्भव लगभग सन् 1000 अर्थात हिंदी के उद्भव के साथ ही माना जाता है। प्रारंभ में इसे पिंगल या भाखा कहा जाता था। ब्रजभाषा शब्द का प्राचीनतम प्रयोग गोपाल कृत रस विलास टीका (1587 ई.) में मिलता है। परंतु भाषा के अर्थ में यह शब्द अठारहवीं शताब्दी से ही अधिक प्रचलित हुआ है। ब्रज शब्द का मूल सं. 'ब्रज' है जिसका प्रयोग ऋग्वेद में 'चरागाह' के अर्थ में हुआ है। इस बोली के क्षेत्र में भी पशुओं की खासी संख्या रही है। ग्रियर्सन के अनुसार इसका क्षेत्र है—मथुरा, आगरा, अलीगढ़, मैनपुरी, एटा, बदायूँ, बरेली, गुडगाँव ज़िले की पूर्वी पट्टी, राजस्थान में भरतपुर, धौलपुर आदि तथा ग्वालियर का पश्चिमी भाग। लल्लू लाल ब्रज, ग्वालियर, भरतपुर, बांसवाड़ा, भदावर, अंतर्वेद तथा बुंदेलखंड को ब्रजभाषा का क्षेत्र मानते हैं। ब्रजभाषा की उपबोलियाँ हैं—भरतपुरी, डांगी, माथुरी, कठेरिया, गाँववारी, जादोबारी, ढोलपुरी तथा सिकरवाड़ी। भरतपुरी राजस्थान के भरतपुर क्षेत्र में बोली जाती है। डाँगी जयपुर, करौली तथा भरतपुर में प्रयुक्त होती है। माधुरी का संबंध मथुरा प्रदेश से है। कठेरिया का मुख्य क्षेत्र बदायूँ है। गाँववारी आगरा जिले के पूर्वी भाग में बोली जाती है। जादोबारी करौली, भरतपुर और ग्वालियर के कुछ भागों में प्रयुक्त होती है। ढोलपुरी का क्षेत्र है-राजस्थान का ढोलपुर और सिकरवाड़ी का मुख्य क्षेत्र ग्वालियर का उत्तर पूर्वी भाग है। कुछ लोग 'ब्रजबुलि' को ब्रजभाषा ही समझते हैं पर वास्तव में 'ब्रजबुलि' बंगला भाषा की एक शैली है ब्रजभाषा मुख्य रूप से देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। कुछ लोग इसे फारसी और कैथी लिपि में भी लिखते रहे हैं। 1971 की जनगणना के अनुसार ब्रजभाषा बोलने वालों की संख्या 25,864 है। ग्रियर्सन के अनुसार ब्रजभाषा भाषियों की संख्या 79 लाख है और डॉ. धीरेंद्र वर्मा इनकी संख्या एक करोड़ तेईस लाख मानते हैं।

     

    साहित्यिक दृष्टि से ब्रजभाषा अन्य बोलियों की तुलना में सर्वाधिक समृद्ध है। सोलहवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही साहित्य में ब्रजभाषा का प्रयोग हो रहा है। भक्तिकालीन कवि सूरदास और तुलसीदास ने ब्रजभाषा को गरिमा प्रदान की है। रीतिकाल का लगभग संपूर्ण साहित्य ब्रजभाषा में ही लिखा गया। नंददास, देव, रत्नाकर, भूषण, बिहारी, घनानंद, आलम, रहीम, रसखान आदि ब्रजभाषा के ही कवि हैं। आधुनिककाल में यद्यपि ब्रजभाषा का साहित्यिक महत्त्व कम हो रहा है तथापि जगन्नाथदास 'रत्नाकर' और रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' जैसे कवियों ने इस काल में भी साहित्यिक परंपरा को सूखने नहीं दिया है। ब्रजभाषा की कुछ प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

     

    आकारांत > ओकारांत       — घोड़ा > घोरो, बड़ा > बड़ो, भला > भलो

    व्यंजनांत > उकारांत         — सब् > सबु, घर् > घरु

    'ह' का लोप                   — साहूकार > साउकार, बारह > बारा

    'क्' > च                      — क्यों > च्यौं, चौं

    ड़ > र                        — घोड़ो > घोरो, साड़ी > सारी

    न् > ल्                        — नम्बरदार > लम्बरदार

    ल् > न्                        — बाल्टी > बान्टी

    र् > ल्                        — रज्जु > लेजू, जरूरत > जरूलत

    ल् > र्                        — बादल > बादर, ताला > तारी

     

    सर्वनाम—हों, हौं (मैं); तै, तैं (तू), वो वह, वुह (वह); यिह (यह), उनि, उन, उन्हौं, विन, विन्हौं, तुम्हार्‌यौ, तिहार्‌यौ आदि।

     

    विशेषण—प्रायः खड़ी बोली के समान होते हैं। उनमें सिर्फ़ आकारांत शब्द ओकारांत हो जाते हैं। इनके विकारी रूप एकवचन में ए अथवा ऐ और पुल्लिंग बहुवचन में ए, एँ, ऐ, ऐं प्रत्ययांत होते हैं।

     

    क्रिया—हि. मारना के रूप—मारिबौ, मारिबौं, मारिबे, मारिबै, मारतु, मारि, मारिकै।

     

    सहायक क्रिया—हौं, हैं, हौ, हुतौ, हुती, हुते, हुतीं, भए, भई, ह्वै, ह्वैको, होऊँ, होइहौं आदि।

     

    क्रिया विशेषण—अबै, तबै, आजु, काल्लि, इहाँ, हियाँ, उतै, बितै, माँ, म्हाँ, हवाँ, इत, उत, कित, तित आदि।

     

    कभी-कभी यह जिज्ञासा प्रकट की जाती है कि 'ब्रज' को भाषा और आज के मानक भाषा की आधार 'खड़ी बोली' को बोली क्यों कहा जाता है। इसका कारण इतिहास में निहित है। ब्रजभाषा लगभग तीन सौ वर्ष तक प्रमुख साहित्यिक भाषा रही है, इसलिए इसे भाषा अभिधान प्राप्त हुआ और वही अभी तक इसके साथ चला आ रहा है। इस दृष्टि से आधुनिक खड़ी बोली हिंदी को अधिक महत्त्व गत सौ वर्षों से ही प्राप्त हुआ है। यह महत्त्व भी साहित्यिक हिंदी को ही प्राप्त है। साहित्यिक हिंदी खड़ी बोली पर आधारित हुए भी उससे पर्याप्त भिन्न है। खड़े बोली का अपना कोई साहित्यिक रूप नहीं है। वह वास्तव में बोली ही है।

     

    4. कन्नौजी

     

    कन्नौजी का नामकरण कन्नौज (सं. कान्यकुब्ज) नगर के नाम पर हुआ है इसे कनौजी, कन्नौजिया तथा कनउजी भी कहा जाता है। व्यावहारिक दृष्टिकोण के आधार पर डॉ. धीरेंद्र वर्मा इसे ब्रजभाषा की ही एक उपबोली 'पूर्वी ब्रज' की संज्ञा देते हैं, परंतु ब्रजभाषा से व्याकरणिक भिन्नता तथा परंपरा दोनों दृष्टियों से इसे अलग बोली मानना ही उचित है। ग्रियर्सन ने इसे अलग बोली मानते हुए इसका क्षेत्र इटावा, फ़र्रुखाबाद, शाहजहाँपुर, कानपुर, हरदोई तथा पीलीभीत बताया है। फ़र्रुखाबाद ज़िला इस बोली का केंद्र है। पीलीभीत और इटावा की कन्नौजी पर ब्रज की छाप मिलती है तथा हरदोई और कानपुर की कन्नौजी अवधी से प्रभावित है। कानपुर की कन्नौजी पर बुंदेली का प्रभाव भी देखा जा सकता है। तिरहारी, पचरुआ, भुक्सा (बुक्सा) संडीली, इटावी, बंगराही, शाहजहाँपुरी, पीलीभीती आदि कन्नौजी की उपबोलियाँ बताई जाती हैं। कन्नौजी की लिपि प्रायः देवनागरी ही है। 1971 की जनगणना में कन्नौजी बोलने वालों की संख्या का उल्लेख नहीं है। ग्रियर्सन ने अपने भाषा सर्वेक्षण में कन्नौजी बोलने वालों की संख्या 44,81,500 बताई है। इस क्षेत्र में कई प्रसिद्ध कवि हुए हैं। जैसे—चिंतामणि, मतिराम, भूषण, बीरबल (अकबरी दरबार के नवरत्नों में से एक, इन्होंने 'ब्रह्म' उपनाम से रचनाएँ की हैं।) आदि। इन कवियों ने अपनी रचनाएँ ब्रजभाषा में ही की हैं। यद्यपि इनकी ब्रजभाषा पर कन्नौजी की छाप अवश्य देखी जा सकती है। इधर कमलूदास आदि कुछ कवियों ने 'अभिमन्युवध' जैसी कुछ रचनाएँ इस बोली में प्रस्तुत की हैं। कन्नौजी की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

     

    ल्ह्, र्‌ह्, म्ह् शब्दारंभ में       — ल्हसुन, र्‌हटा, म्हगाई

    व्यंजनांत > उकारांत          — खातु (खात्) सबु (सब्), घरु (घर्)

    मध्य ‘ ह ’ का लोप            — जाहि > जाइ, लेहु > लेउ

    अन्त्य महाप्राण > अल्पप्राण   — हाथ् > हाँत्

    हिंदी 'र' का स्पर्श व्यंजनों से समीकृत रूप—मिर्च > मिच्च, उर्द > उद्द, हल्दी > हद्दी।

     

    संज्ञा या सर्वनाम के बहुवचन रूपों के साथ— ह्वार, हर का प्रयोग (हम ह्वार अथवा हम हर = हमलोग)

     

    स्वार्थे प्रत्यय 'इया' और 'वा' छोकरिया, बेटवा, बचवा

     

    सर्वनाम—मैं, मइँ, हम्, तू, तैं, तुइ, तम्ह, वहु, वुहि, उहि, वौ, बौ, बै, बे, यहु, इहु, जउन, जौनु, जौन, तौनु, तौन, किसै, काको आदि।

     

    विशेषण—आकारांत ओकारांत—बड़ो (बड़ा) छोटो (छोटा)

     

    संख्यावाचक विशेषण—इकु, एकु, दुइ, तीनि, चारि, छा (6), नउ (9), हजारू, किड़ोर, हूँटा (3½), घौंचा (4½), पौंचा (5½), आदि।

     

    क्रिया—चलत्, चलतु, चलो, चली, चलन्, चलनु, चलनो, चलिबो 

     

    सहायक क्रिया—हैगो (है), हैं, हँइ, थों (था), हतो, हते, हती, रहों, रहे, रही।

     

    क्रिया विशेषण—ह्याँ, ह्वाँ, जहाँ, इत्तो, उत्तो, कित्तो, ऐसो, वैसो, ज्यौँ, त्यौं आदि।

     

    5. बुंदेली

     

    बुंदेली अथवा बुंदेलखंडी बुंदेलखंड की बोली है। यह शौरसेनी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से विकसित हुई है। बुंदेलखंड मुख्यतः बुंदेले राजपूतों का निवास स्थान है। इंडिया गजेटियर के अनुसार बुंदेलखंड की सीमा उत्तर में यमुना नदी, उत्तर-पश्चिम में चंबल नदी, दक्षिण में जबलपुर तथा सागर ज़िला और दक्षिण-पूर्व में रीवाँ अथवा बघेलखंड एवं मिर्ज़ापुर के पर्वत हैं। परंतु बुंदेली का क्षेत्र जालौन, हमीरपुर, झाँसी, बाँदा, ग्वालियर, ओरछा, सागर, दमोह, नरसिंहपुर, सिवनी तथा जबलपुर, होशंगाबाद तक फैला हुआ है। इसके कई मिश्रित रूप दतिया, पन्ना, चरखारी, बालाघाट तथा छिंदवाड़ा के कुछ भागों में पाए जाते हैं। डॉ. धीरेंद्र वर्मा इसे स्वतंत्र बोली नहीं मानते। उनके अनुसार, ब्रज, कन्नौजी तथा बुंदेली एक ही बोली के तीन प्रादेशिक रूप मात्र हैं। बुंदेली की प्रमुख उपबोलियाँ हैं—आदर्श बुंदेली, खटोला, लोघांत्ती, पंवारी, बनाफरी, कुंडारी, तिरहारी, भदावरी, लोधी और कुंभारो। बुंदेली मुख्यतः नागरी लिपि में लिखी जाती है, परंतु कुछ लोग इसे मुडिया, महाजनी अथवा कैथी लिपि में भी लिखते हैं। 1961 की जनगणना के अनुसार इसे बोलने वालों की संख्या 54,147 थी। ग्रियर्सन ने यह संख्या 68,69,201 बताई है। ठेठ बुंदेली में कोई उत्कृष्ट साहित्यिक रचना प्राप्त नहीं होती। इस क्षेत्र के कवियों तुलसी, केशवदास, पद्माकर, ठाकुर, गोरे लाल आदि ने ब्रजभाषा अथवा अवधी में ही रचनाएँ की हैं। एनसाईं, ईसुरी, धर्मदास, गंगाधर ने बुंदेली में रचना की है। जगनिक की प्रसिद्ध रचना 'आल्हाखंड' बुंदेली की उपबोली 'बनाफरी' में ही लिखी गई थी परंतु उसका मूल रूप आज उपलब्ध नहीं है। बुंदेली की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

     

    ए > इ — बेटी > बिटिया                        अ > इ बरोबर > बिरोबर   अ > इ — बरोबर — बिरोबर

    ओ > उ — घोरो > घुरवा                        ड़ > र —  पड़ो > परो

    ऐ > ए — कैहों > केहौं                          क > ग — हकीकत > हकीगत

    औ > ओ — और ओर                           आदि य > ज — यह > जो

    स >  छ  — सीढ़ी > छिड़ी                      च >  स     — साँचे > साँसे

     

    सर्वनाम—में, मैं, मो, मोरो, ओ, हमैं, तू, ते, तैं, बौ, बो, जो, ई, इ, तौन, ती, काये, कोऊ, कोउ आदि।

     

    विशेषण—अपुन, अपन, आप, नौं (9), गेरा (11), बारा (12), तेरा (13), चउदा (14), पैलो, दूसरौ, पाँचमाँ, आधो, चौथयाई, सबाओ, दो बीसी (40), तीन बीसी (60) आदि।

     

    क्रिया—लिखत, मारत, करत्, गओ, चलरऔहौं, चलरऔ है, चलरऔ आदि।

     

    सहायक क्रिया—हौं, औं, हों, ओं, आँव, आँउँ, हतो, तो, हुहौं, होउँगो आदि।

     

    क्रिया विशेषण—याँ, इतै, क्याँई, इताँयँ, आँगूँ, पाछैं, ऐंगर आदि।

     

    6. निमाड़ी 

     

    निमाड़ी का क्षेत्र मध्य प्रदेश का निमाड़ नामक प्रदेश है। ग्रियर्सन इसे 'हिंदी' की राजस्थानी उपभाषा के दक्षिणी वर्ग अर्थात दक्षिणी राजस्थानी के अंतर्गत रखते हैं। अनेक विद्वानों ने इसे मालवी का दक्षिणी रूप स्वीकार किया है। भोलानाथ तिवारी इसे पश्चिमी हिंदी में ही रखने के पक्ष में हैं। फोर्सिथ के अनुसार यह फ़ारसी और मराठी शब्दों से युक्त हिंदी की एक बोली है। परिनिष्ठित निमाड़ी का क्षेत्र खरगोन और खंडवार के बीच का प्रदेश माना जाता है। इस बोली पर मालवी, मराठी, बुंदेली, खानदेशी और भीली का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। भीली तथा कुरुकू से प्रभावित 'बंजारी निमाड़ी' 'कुन्बी निमाड़ी' (गुजराती से प्रभावित) 'गूजरी निमाड़ी' (गुजराती तथा मालवी से प्रभावित) तथा 'नागरी निमाड़ी' (गुजराती से काफ़ी प्रभावित) आदि इसके कुछ जातीय रूप हैं। लोक साहित्य की रचना 'निमाड़ी' में पर्याप्त मात्रा में हुई है। कुछ साहित्य भी इसमें लिखा गया है इसके प्रमुख कवि 'सिंगाजी' माने जाते हैं। निमाड़ी की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

     

    अल्फप्राणीकरण            — हाथ > हात्, साधु-सादू;

    ल > ळ                    — बाल् > बाळ्;

    घोषीकरण                  — लोक > लोग;

    अकारण अनुनासिकता     — चावल > चाँवल।

     

    संज्ञा—विकारी रूप-घोड़ा, घोड़ान्, घोड़ना, बकरीन, बकरीना आदि।

     

    सर्वनाम—हऊँ, मन, मख, हमख, म्हसी, हमसी, तोसी, थारासी, थारो, ऊ, वा, ओख आदि।

     

    विशेषण—प्रायः हिंदी के समान। कुछ विशेष-पाच (5) चाळीस (40), आधो, द्योड़ो, जादो, बड़ो, ऊचो आदि।

     

    क्रिया—चलूँज्, चलूँच्, चलाँच्, चल्यो, चल्यो छे, चल्यो थो आदि।

     

    क्रिया विशेषण—अब, अवँ, जब, जवँ, आज, काल, परसों, याँ, वहाँ आदि।

     

    पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी में अंतर

     

    भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से हिंदी क्षेत्र को दो भागों में विभाजित किया जाता है—पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी। ग्रियर्सन इन दो क्षेत्रों को ही हिंदी क्षेत्र मानते हैं। पश्चिमी हिंदी की बोलियाँ हैं—हरियाणी, खड़ीबोली, ब्रजभाषा, कन्नौजी, बुंदेली (और निमाड़ी) पूर्वी हिंदी की बोलियाँ हैं—अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी। पश्चिमी और पूर्वी हिंदी में ध्वनि, संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया आदि स्तरों पर स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

     

    ध्वनि—'अ' का उच्चारण पूर्वी हिंदी में अर्ध संवृत, वृत्तमुखी होता है जब पश्चिमी हिंदी में यह अर्धविवृत्त, अवृत्तमुखी ध्वनि है।

     

    पूर्वी हिंदी में हृस्व इ, उ का उच्चारण अत्यधिक हृस्व होता है जबकि पश्चिमी हिंदी में इनका उच्चारण अपेक्षाकृत दीर्घता लिए होता है।

     

    'ऐ' और 'औ' पूर्वी हिंदी में संयुक्त स्वर—अइ तथा अउ हैं। पश्चिमी हिंदी में ये दोनों अब मूल स्वर रूप में उच्चरित होते हैं।

     

    शब्दारंभ (पश्चिमी हिंदी) के 'य' तथा 'व' पूर्वी हिंदी में क्रमश: 'इ' तथ 'उ' हो जाते हैं—इहाँ, उहाँ।

     

    पूर्वी हिंदी की तुलना में पश्चिमी हिंदी में दो स्वरों का संयोग कम होता। जैसे—दुइ, अवर, बइल (पूर्वी हिंदी) पश्चिमी हिंदी में दो, और तथा बैल रूप। उच्चरित होते हैं।

     

    कुछ अन्य अंतर—

     

    पश्चिमी हिंदी             पूर्वी हिंदी

    ल, ळ                     ल

    ल                          र                   हल्दी > हर्दी

    ङ, ढ़                     र्, र्‌ह               लड़का > लरिका

    ओकारांत, औकारांत      अकारांत-व्यंजनांत-बडो,     बड़ौ > बड

     

    संज्ञा-पश्चिमी हिंदी                             पूर्वी हिंदी

    मूल रूप एक-घोड़ा                    मूल रूप तीन-घोड़, घोड़वा, घोड़वना

    आकारांत सं. पुं. एक. विकारी           आकारांत-लरिका ~ लइका

    एकारांत-लड़के

     

    पूर्वी हिंदी में संज्ञा शब्द के प्रत्यय—अइआ और अउआ हैं—कन्हइया, कउवा, पश्चिमी हिंदी में ऐसा नहीं है—कन्हैया, कौवा।

     

    सर्वनाम-                       पश्चिमी हिंदी               पूर्वी हिंदी

    कर्ता. उ.पु.एक               मैं, में, हौं, हउँ            महँ में

    सबंध पुरूष वाचक-         म्हारा, म्हारो,              मोर
                                    हमारा, हमारो             हमार
                                    तुम्हारो, तिहारो            तोर, तोहार्, तुम्हार्

    अन्य. एक.                   उस                         उइ, उओ

    संबंध वाचक                 जो, सो                     जे, जवन, से, तवन

    प्रश्न वाचक                   कौन                       कवन

     

    क्रिया-रूप

    पश्चिमी हिंदी                                                               पूर्वी हिंदी

    वर्तमान काल—'हे' वाले रूप—है, हैं, हूँ, हो आदि।             बाट वाले रूप-बाटै, बाटैं, बाटे,
                                                                        बाटो आदि                   

    भूतकाल—'ह' 'थ' 'हत्' वाले रूप—                              'रह' वाले रूप—रहत, रहै, रहौं,
    (सहायक क्रिया) था, थे, थी,                                      रहन, रहैं आदि।

    हो, हे, ही, हती, हते, हतीं आदि।

    भविष्यकाल—'ग' वाले रूप—चलेगा,                             'ग' वाले रूप नहीं—चली, 
    चलेगौ, चलैगो आदि।                                              चलिहै आदि।

    क्रियार्थक संज्ञा—'न' तथा 'बो' वाले                               'ब' वाले रूप—

    रूप-चलना, चलनो, देखिबो                                      चलब, देखब आदि।

     

    पश्चिमी हिंदी शौरसेनी अपभ्रंश से विकसित हुई है। पूर्वी हिंदी के संज्ञा और सर्वनाम मागधी बोलियों से संबंध रखते हैं तो क्रिया पद अर्धमागधी से। इन दोनों उपभाषाओं में अंतर दिखाई देने का यही सर्वप्रमुख कारण है।

     

    पूर्वी हिंदी की बोलियाँ

     

    ग्रियर्सन ने हिंदी क्षेत्र को दो भागों पश्चिमी हिंदी और पूर्वी हिंदी में विभाजित किया। पूर्वी हिंदी की उत्पत्ति वे अर्धमागधी अपभ्रंश से मानते हैं। हिंदी साहित्यकोश (धीरेंद्र वर्मा) के अनुसार पूर्वी हिंदी का विकास मागधी अपभ्रंश से हुआ है। पूर्वी हिंदी में तीन बोलियाँ मानी जाती हैं—अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। ग्रियर्सन मूल रूप से इनमें दो ही बोलियाँ मानने के पक्ष में थे—अवधी और छत्तीसगढ़ी। बघेली को उन्होंने जनमत को ध्यान में रखते हुए ही बोली स्वीकार किया है। ग्रियर्सन के अनुसार पूर्वी हिंदी बोलने वालों की कुल संख्या 2,45,11,647 है। पूर्वी हिंदी की बोलियों का संक्षिप्त परिचय नीचे दिया जा रहा है।

     

    1. अवधी

     

    अवधी का केंद्र अयोध्या है। अयोध्या से अवध विकसित हुआ और इसके आधार पर इस बोली को अवधी कहा गया। अवधी को कुछ विद्वान कोसली, पूर्वी, उत्तरखंडी अथवा बैसवाड़ी कहने के पक्ष में हैं। परंतु अधिकांश विद्वान अवधी नाम के पक्ष में ही हैं। ग्रियर्सन ने इसे अर्धमागधी अपभ्रंश से उद्भूत माना है, परंतु डॉ. बाबूराम संक्सेना इसमें पालि से अधिक समानता पाते हैं। डॉ. भोलानाथ तिवारी इसे 'कौसली' से उद्भूत बताते हैं। 'कोसली' को पूर्वी हिंदी का पूर्व रूप माना जा सकता है। अवधी उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी, गोंडा, बहराइच, लखनऊ, उन्नाव, बस्ती, रायबरेली, सीतापुर, हरदोई का कुछ भाग, फ़ैज़ाबाद, सुलतानपुर प्रतापगढ़, बाराबंकी, फ़तेहपुर, इलाहाबाद, मिर्ज़ापुर का कुछ भाग तथा जौनफ (कुछ भाग) में बोली जाती है। बिहार के मुसलमान भी अवधी बोलते हैं। यह मिश्रित अवधी मुज़फ़्फ़रपुर तक बोली जाती है। अवधी की उपबोलियों की संख्या तेरह बताई जाती है, जिनमें प्रमुख हैं—मिर्ज़ापुरी (मिर्ज़ापुर में प्रयुक्त अवधी) बिहारी हिंदी-बिहार के मुसलमानों की भोजपुरी से प्रभावित अवधी, बनौधी (पश्चिमी जौनपुर), बैसवाड़ी (उन्नाव एवं रायबरेली के बीच के क्षेत्र की बोली) गंगापारी, पूर्वी, उत्तरी, आदि। अवधी प्रायः नागरी लिपि में लिखी जाती है परंतु कैथी लिखि और फ़ारसी लिपि (सूफ़ी प्रेमाख्यानक काव्य) में भी इसे लिखा जाता रहा है। ग्रियर्सन ने अवधी बोलने वालों की संख्या एक करोड़ साढ़े इकसठ लाख बताई है। 1971 की जनगणना के अनुसार यह संख्या 1,36,259 है। अवधी में साहित्य रचना पर्याप्त हुई। हिंदी की प्रेमाश्रयी शाखा के लगभग सभी कवियों ने अवधी में ही साहित्य रचना की है। इनमें प्रमुख हैं—जायसी, मंझन, कुतबन, नूरमुहम्मद आदि। प्रसिद्ध कवि तुलसीदास की रचना 'रामचरित मानस' अवधी में ही है। अवधी के कुछ अन्य प्रमुख कवि हैं—मध्ययुग में सूरजदास, ईश्वरदास, छेमकरन, कासिमशाह और आधुनिक काल में पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र। अवधी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

    ए, ओ के ह्रस्व और दीर्घ दोनों रूप तथा स, श, ष के स्थान पर 'स' का प्रयोग इनके अतिरिक्त—

     

    'ह' का आगम          — सईस > सहीस, इच्छा > हिच्छा

    ल > र                 —  अंजलि > अंजुरी, मूसल > मूसर

    ए का उच्चारण-अइ    — ऐसे > अइसे, औरत अउरत

    ण > न                 — चरण > चरन, मणि > मनि,

    ड़ > र                 — जोड़ (कर) > जोरि

    य > ज                 — सुयश > सुजस

    व > ब                 —   वारि > बारि

    अल्पप्राण > महाप्राण  — पेड़ > फेड़, पुनः > फुन

     

    संज्ञा—संज्ञा के तीन रूप—घोर (घोड़ा), घोरवा, घरउना; कुत्ता, कुतवा, कुतउना 

    स्त्रीलिंग के प्रत्यय— ई                     —  बकरा > बकरी

                          इनि, इनी             —     साँप > साँपिनि, लरिका > लरिकिनी

                          आनी                  —   जेठ > जेठानी

                          नी                     —   मास्टर > मास्टन्नी

                          इया                   —    बाछा > बछिया आदि।

     

    सर्वनाम—मइ, मोरे, मोरि, म्वार, तोहि, तोहिं, तहिं, तुहि, उहि, ओकर, वहिकर, इउ, ई, यु, केऊ, कौनो, काहु, से, तवन, तौन, कवनेकर आदि।

     

    विशेषण—याक् (1), पान (5), पहिल, दूसर, चौथ, छट्टहा, पउवा, पउन, आदि।

     

    क्रिया—चलउँ, चलइ, चलउ, चलतिहउँ, चलतिहइ, चलिसिहइ, चले होतिउँ आदि।

     

    सहायक क्रिया—अह्, ह, अछ्, भू, रह्, अह्, तथा हत् के विभिन्न रूप।

     

    क्रिया विशेषण—इहँ, एठियाँ, ऊहाँ, हुआँ, ओठियन, ओइकी, जईसी, अब्बय, ई जून, तब्बइ, आजु, काल्हि, परउँ, फिन आदि।

     

    2. बघेली

     

    बघेले राजपूतों के आधार पर रीवाँ और आसपास का क्षेत्र बघेलखंड कहलाता है और बघेलखंड की बोली बघेली। कुछ लोग इसे बघेलखंडी और कुछ रीवाँई भी कहते हैं। बघेली का अवधी से इतना अधिक साम्य है कि कुछ विद्वान बघेली को एक बोली मानने के पक्ष में हैं। स्वयं ग्रियर्सन ने जनमत को ध्यान में रखकर ही इसकी स्वतंत्र सत्ता स्वीकार की थी। ग्रियर्सन ने बघेलखंड एजेंसी (रीवाँ, कोठी, सोहावल), चांग भखार का कुछ भाग, ज़िला मंडल का कुछ भाग, दक्षिणी मिर्ज़ापुर का कुछ भाग तथा जबलपुर का कुछ भाग बघेली का प्रयोग क्षेत्र स्वीकार किया है। परंतु सामान्यतः रीवाँ, दमोह, जबलपुर, माँडला, बालाघाट, बाँदा, फ़तेहपुर तथा हमीरपुर (कुछ भाग) बघेली का क्षेत्र माना जाता है। बघेली की प्रमुख उपबोलियाँ हैं—तिरहारी, बुंदेली, गहोरा, जुड़ार, बनाफरी, मरारी, पोंवारी, कुंभारी, ओझी, गोंडवानी और केवरी। डॉ. भगवती प्रसाद शुक्ल ने इसके कुल तीन रूप माने हैं—मानक बघेली, गोंडानी और मिश्रित बघेली। बघेली को पहले कैथी लिपि में लिखा जाता रहा है, परंतु अब यह नागरी लिपि में ही लिखी जाती है। ग्रियर्सन के अनुसार बघेली बोलने वालों की संख्या लगभग 46 लाख है। बघेली में साहित्य-रचना नहीं हुई है, हाँ, लोक-साहित्य अवश्य मिलता है। बघेली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    अवधी का ह्रस्व ओ > व — तोर > त्वार, मोर >  म्वार

    ओ  >  वा — होस > हवास

    ए > य — पेट  प्याट, देत > द्यात

    व > ब — गवा > गबा

    व  >  म — चरावै > चरामै

    ग + ह > घ — जगह > जाघा

    अकारण अनुनासिकता — हाथ > हाँथ

     

    संज्ञा—अवधी के समान शब्दों के दीर्घ एवं दीर्घतर रूप—

    बड़काबड़कौना, लहुर-लहुरवा आदि।

     

    सर्वनाम—मँय, म्वारे, म्वार, हम्ह, हम्हार, तँय, त्वारे, तुम्हार, वहि, वहिकर या, य, यहि, कोऊ, कोन्हों, जेन्ह, जेन् आदि।

     

    विशेषण—संज्ञा के समान दीर्घ रूप-नीक-नीकहा, अधिक-अधिकहा; चारि पाँचि, छ, नउ, सउ आदि।

     

    क्रिया—चलतआँ, चलतआ, चलौं, चलस, चली, चलत्ये हैं, चलत अहे, चलेन, चलिन आदि।

     

    सहायक क्रिया—हौं, आहेओं, हाओं, आहों, हन, आय, तैं, तै आदि।

     

    क्रिया विशेषण—इहँवाँ, उहँवाँ, एहै कैत, एहै कयोत, तेहै मुँह, केहै केत आदि।

     

    3. छत्तीसगढ़ी

     

    छत्तीसगढ़ी का विकास अर्धमागधी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से हुआ है। मुख्य क्षेत्र छत्तीसगढ़ होने के कारण इसे छत्तीसगढ़ी कहते हैं। बालघाट के लोग इसे खल्हाटी अथवा खलोटी भी कहते हैं। पूर्वी संभलपुर के पास इसे 'लरिया' नाम से जाना जाता है। कहीं-कहीं इसे खल्ताही भी कहा जाता है। इस बोली पर नेपाली, बंगला तथा उड़िया का प्रभाव भी देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ी रायपुर, बिलासपुर, संभलपुर ज़िले के पश्चिमी भाग, काँकर, नंदगाँव, खैरागढ़, चुइखदान, कवर्धा, सुरगुजा, बालाघाट के पूर्वी भाग, सारंगढ़, जशपुर, बस्तर एवं बिहार के कुछ भागों में बोली जाती है। छत्तीसगढ़ी की प्रमुख उपबोलियाँ हैं—सुरगुजिया, सदरी कोरवा, बैगानी, बिंझवाली, कलंगा, भुलिया, सतनामी, काँकेरी, बिलासपुरी तथा हलबी। इनमें से 'हलबी' का प्रयोग बस्तर ज़िले में होता है। ग्रियर्सन इसे मराठी की एक उपभाषा मानते हैं परंतु सुनीति कुमार चटर्जी के अनुसार यह छत्तीसगढ़ी की एक उपबोली है। छत्तीसगढ़ी मुख्य रूप से नागरी लिपि में लिखी जाती है परंतु इसकी दो उपबोलियों, भुलिया तथा कलंगा के लिए उड़िया लिपि का प्रयोग किया जाता है। ग्रियर्सन ने इसके बोलने वालों की संख्या तैंतीस लाख बताई है। 1961 की जनगणना के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 29,62,038 थी। छत्तीसगढ़ी में मुख्य रूप से लोक साहित्य ही मिलता है। आधुनिक काल में शुकलाल प्रसाद पाण्डेय आदि कुछ रचनाकारों ने इस बोली में अपनी रचनाएँ प्रस्तुत की हैं। छत्तीसगढ़ी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

     

    ए, ऐ, ओ, औ के ह्रस्व रूपों का भी प्रयोग

    'ङ्' ध्वनि का स्वतंत्र प्रयोग नहीं।

    ष > स् — वर्षा > बरसा; भाषा > भासा

    ष > ख — वर्षा > बरखा; भाषा > भाखा

    क > ख — बंदकी > बंदखी

    त > द — रास्ता >  रसदा

    स > छ — सीता > छीता

    छ > स — छतरी > सतरी

    ब > प — खराब > खराप आदि।

     

    संज्ञा—बहुवचन बनाने के लिए 'मन', 'अन', 'गंज', 'जमा', 'जम्मा', 'सब्बों' आदि का प्रयोग-मनुख मन (मनुष्यों) नोकरन, लड़कन, जम्मा पुतोमन आदि।

    स्त्रीलिंग बनाने के लिए 'ई', इया, निन, आइन आदि प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है।

     

    सर्वनाम—में, मैं, मोर, तैं, तूँ, तुँहार, तुहमन, इया, येकर, एकर, जिन्हकर्, कोन्मन्कर्, कुछू, कोनो-कोनो (कोई) कुछू-कुछू आदि।

     

    विशेषण—दू, छे, नों, ग्यारा, बारा, तेरा, चउदा, पन्द्रा, कोरी (20) एक कोरी दू (22), एकठो, छेठों, चरगुन (चौगुना) पहिल, दूसर आदि।

     

    क्रिया—होत, देखत, होते, देखते, देखे, होए, भए, होके, देखके, सोब, देखब आदि।

     

    सहायक क्रिया—हवउँ, हवौं, हवस्, हस्, अय्, अय्ँ, हौं, औं आदि।

     

    क्रिया विशेषण—इहाँ, उहाँ, ओती (उधर), जेती, अभिच (अभी ही), आगे, पाछू, भलुक (बल्कि), जतका (जितना) सामूँ (सामने) आदि।

     

    बिहारी की बोलियाँ

     

    'बिहारी' का विकास मागधी अपभ्रंश से हुआ है। इसे दो भागों—पूर्वी बिहारी और पश्चिमी बिहारी में बाँटा जा सकता है। पूर्वी बिहारी की दो बोलियाँ हैं—मैथिली और मगही। पश्चिमी बिहारी की बोली है, भोजपुरी। ग्रियर्सन मगही को मैथिली की एक बोली मानने के पक्ष में हैं। डॉ. चटर्जी भोजपुरी को मैथिली और मगही से नितांत भिन्न मानकर अलग रखने के पक्ष में हैं। ग्रियर्सन ने बिहारी का प्रयोग करने वालों की संख्या लगभग 3 करोड़ 70 लाख मानी थी। बिहारी की बोलियों का संक्षिप्त परिचय निम्नलिखित है।

     

    1. भोजपुरी

     

    इसका विकास मागधी अपभ्रंश के पश्चिमी रूप से हुआ है। बिहार के शाहबाद ज़िले के भोजपुर नामक क़स्बे के आधार पर इसे भोजपुरी कहा जाता है। कुछ लोग इसे 'पूरबी' अथवा भोजपुरिया' भी कहते हैं। यह बोली बिहार के शाहाबाद, सारन, चंपारण, राँची, जसपुर, पलामू का कुछ भाग, मुज़फ़्फ़रपुर का कुछ भाग तथा उत्तर प्रदेश के वाराणसी, गाज़ीपुर, बलिया, जौनपुर, मिर्ज़ापुर, गोरखपुर, आज़मगढ़ आदि ज़िलों में बोली जाती है। भोजपुरी की मुख्य उपबोलियाँ चार हैं—उत्तरी भोजपुरी (थारू भोजपुरी भी इसके अंतर्गत आती है।) दक्षिणी भोजपुरी (परिनिष्ठित रूप) पश्चिमी भोजपुरी तथा नगपुरिया। इसके अन्य स्थानीय रूप हैं—मघेसी, बँगरही सरवरिया, सारन बोली, गोरखपुरी आदि। भोजपुरी की मुख्य लिपि नागरी है। कुछ लोग इसके लिए कैथी लिपि का प्रयोग भी करते हैं। बही-खाते महाजनी लिपि में लिखे जाते रहे हैं। ग्रियर्सन ने इसके बोलने वालों की संख्या दो करोड़ चार लाख मानी है। 1971 की जनगणना के अनुसार यह संख्या 1,43,40,564 है। भोजपुरी में प्रायः लोक साहित्य ही मिलता है। राहुल सांकृत्यायन, गोरखनाथ चौबे, रामविचार पाण्डेय, चंचरीक आदि कुछ लोगों ने अवश्य ही थोड़ा-बहुत इस बोली में लिखा है। भोजपुरी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

    'ङ्' का प्रयोग स्वतंत्र रूप से अन्य व्यंजनों के समान—टाङ् (पैर), कङ्ना (कंगना) अङ्यिा (अंगिया) आदि।

     

    महाप्राणीकरण — पेड़ > फेड़, सब सभ, ठंडा > ठंढा

    घोषीकरण — नकद > नगद, डॉक्टर > डगडर

    विपर्यय — लखनऊ > नखलऊ, नाटक > नकटा

    ल > र — फल > फर, गला > गर

    न > ल — नोटिस > लोटिस, नम्बरदार > लम्बरदार

    श, स > च — शाबाश > चाबस

     

    संज्ञा—संज्ञा के तीन रूप—चमार, चमरा, चमरवा; सोनार, सोनरा, सोनरवा। 

    स्त्री. के प्रत्ययई, नी, आनी और इया—लइकी, महटरनी, द्यौरानी, डिबिया आदि।

    बहु. के प्रत्ययअन्, न्ह, अन्ह आदि—घोड़न, घोड़न्ह, घोड़िन्ह आदि। 

     

    सर्वनाम—मे, मय, हमनी का, हमहन, तें, तै, तोहारकें, ऊ, हुन्हि, ऊलोगनक, ओकरन से, केहू, कुछुवौ, जेके आदि।

     

    विशेषण—बड़ा > बड़का, बड़की, लाल > ललका, काला > करिया, राम (1), दू, चँवतिस, अरतिस, ओन्तालिस, सावा, अढाइ, पहुँचा, छुट्ट्ठा आदि। 

     

    क्रिया—चलल, चलली, चलले, चललेह, चललनि, चललसि, चललह आदि।

     

    सहायक क्रिया—हैं, हईं, हवीं, हवों, हवे, हवस, हसन, हहस आदि।

     

    क्रिया विशेषण—इँहाँ, एठन, ठें, उँहाँ, उँहवाँ, ऊठाँ, जाहाँ, तेठन, अँव, एहबेरा, आजु, काल, काल्ह, परसों, परों, परौं आदि।

     

    2. मगही

     

    इस बोली को कुछ लोग मागधी भी कहते हैं। वस्तुतः 'मगही' शब्द 'मागधी' का विकसित रूप है। यह संपूर्ण गया तथा पटना, हज़ारीबाग, मुंगेर, पालामाऊ, भागलपुर और राँची ज़िलों के कुछ भागों में बोली जाती है। इसका परिनिष्ठित रूप 'गया' ज़िले में सुनने को मिलता है। अन्यत्र यह अन्य सीमावर्ती बोलियों भाषाओं से प्रभावित है यथा, पूर्वी पूर्णिया की सिरपुरिया बोली के संबंध में यह कहना कठिन हो जाता है कि यह मगही है अथवा बंगला। इसके इन मिश्रित रूपों को मैथिली प्रभावित मगही और भोजपुरी प्रभावित मगही भी कहा जाता है। इसका प्रमुख रूप पूर्वी मगही है। पूर्वी मगही की प्रमुख उपबोलियाँ हैं—कुड़माली, खोंटाली और पाँच परगनिया। जंगली मगही, टलहा मगही, सोनतटी मगही आदि स्थानीय रूपों की चर्चा भी इस संदर्भ में की जा सकती है। इसकी लिपि मुख्य रूप से कैथी तथा नागरी है। पूर्वी मगही कहीं-कहीं बंगला तथा उड़िया लिपि में भी लिखी जाती है। ग्रियर्सन के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 65,04,817 थी। 1971 की जनगणना के अनुसार यह संख्या 66,38,495 है। मगही में लोक साहित्य ही मिलता है, जिसमें 'गोपी चंद' तथा 'लोरिक' प्रसिद्ध हैं। मगही की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    विपर्यय                   — बतख > बकत, नजदीक > नगीच

    महाप्राणीकरण           — पेड़ > फेड़, पुनः > फेन

    अकारण अनुनासिकता  — हाथ > हाँथ, सड़क > सँड़क

    श, ष > स              — शैतान > सैतान, देश > देस

    ल > र                   — मछली > मछरी, कलेजा > करेजा

     

    संज्ञा—अनेक संज्ञाओं के दो अथवा तीन रूप—नाऊ—नउवा, बेटा—बेटवा—बेटउवा

     

    स्त्रीलिंग प्रत्यय—ई (घोरी), इया (बुढ़िया) आइन (ललाइन) ऐनी (पंडितैनी) आदि।

     

    सर्वनाम—मोरा, हमरा, हमनी, हमरनी, तूँ, तों, तोहनी, ऊ, ओकरा, उन्हकरा, ई, एह, इन्हकनी, केकरोके, कौनोंलेल, तौन, तऊन, के, को आदि।

     

    विशेषण—एगो, दू, पान (5), छो, पछन्तर, सव (100) कड़ोर, दोसर, तेसर, चौठ, पउआ, तेहाई, जइसन, तइसन आदि। 

     

    क्रिया—चलत, चलित, चलल, चललमेल, चलब, चले बला, चयानिहारा आदि।

     

    क्रिया विशेषण—ईठयाँ, हियाँ, हुआँ, जेठवाँ, जेतह, जरवनी (जब), ओखनी, तखनी (तब), होहर (उधर), जेन्ने, जेन्दे (जिधर) आदि।

     

    3. मैथिली

     

    मैथिली नाम का प्रयोग प्रदेश के आधार पर किया जाता है। इसका प्रयोग सर्वप्रथम 1801 ई. में कोलब्रुक ने किया था। इससे पहले इसे 'देसिल बअना' (विद्यापति) अथवा तिरहुतिया कहा जाता था। इसका प्रयोग पूर्वी चंपारण, मुज़फ़्फ़रपुर, उत्तरी मुंगेर, उत्तरी भागलपुर, दरभंगा, पूर्णिया का कुछ भाग तथा नेपाल के रौताहट, सरलारी, सप्तरी, मोहतरी और मोरंग ज़िलों में किया जाता है।इसकी प्रमुख उपबोलियाँ हैं—दक्षिणी मैथिली, पूर्वी मैथिली, छिकाछिकी (मगही तथा बंगला से प्रभावित), पश्चिमी मैथिली (भोजपुरी से प्रभावित), जोलाही मैथिली (अरबी-फ़ारसी मिश्रित), केंद्रीय मैथिली आदि। मैथिली सामान्यतः नागरी लिपि में लिखी जाती है, परंतु मैथिल ब्राह्मण इसे 'मैथिली लिपि' में लिखते हैं। कुछ लोग कैथी लिपि का प्रयोग भी करते हैं। ग्रियर्सन के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 1,02,62,357 थी। 1971 भी जनगणना के अनुसार यह संख्या 61,21,922 है। मैथिली बोली का प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ 'वर्ण रत्नाकर' (शेखराचार्य ज्योतिरीश्वर ठाकुर) है। विद्यापति, उमापति, महीपति आदि इस बोली के अन्य प्रसिद्ध साहित्यकार हैं। मैथिली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    ल > न         — लवण > नून

    न > ल         — नालिश > लालिस, नोट > लोट

    घोषीकरण      — डॉक्टर > डाकडर, एकादश > एगारह

    अघोषीकरण    — मेज > मेच, कमीज > कमीच

    महाप्राणीकरण  — जर्जर > झाँझर, वेष > बेख

     

    संज्ञा—तीन अथवा चार रूप-घर-घरवा घरउआ; घोड़-घोड़ा-घोड़वा-घोड़उवा।

     

    स्त्रीलिंग प्रत्यय—ई (नेनी-लड़की), इया (नेनिया), ईवा (घोड़ीवा) आइनि (मोदिआइनि) आदि।

     

    सर्वनाम—हाय, हँओ, हमनी, मोरें, मोय, तोंह, तुहुँ, तोहर, जोहि, उहे, तनि, तन्हि, ई, ए, केऊ, कोय, कुछु, किछु आदि।

     

    विशेषण—मीठ-मीठा-मिठका, दू, दुइ, चउदह, अठतिस, चउवन, बिरानवे (92), सै (100), अउबल (अव्वल), दोसर, तेसर आदि।

     

    क्रिया—चल, चलै, चलअ, चलिहे, चलिअह, चलू, चली आदि। 

     

    सहायक क्रिया—छिअहु, थिकहुँ, थिकिऔं, छथून्हि, छथून, छी, छिऐ, छलिअहु आदि।

     

    क्रिया विशेषण—एतय, बैठियाँ, जते, जत्ते, एखन, एहिया, तखन, तेखनि आदि।

     

    राजस्थानी की बोलियाँ

     

    ग्रियर्सन ने राजस्थानी उपभाषा को 5 बोलियों में विभाजित किया है—पश्चिमी राजस्थानी (मारवाड़ी), उत्तर-पूर्वी राजस्थानी (मेवाती), मध्य-पूर्वी राजस्थानी (जयपुरी), दक्षिण-पूर्वी राजस्थानी (मालवी) तथा दक्षिणी राजस्थानी (नीमाड़ी)। डॉ. चटर्जी ने इसे दो वर्गों-पश्चिमी राजस्थानी और पूर्वी राजस्थानी में बाँटा है। भोलानाथ तिवारी उत्तर-पूर्वी राजस्थानी और दक्षिणी राजस्थानी को पश्चिमी हिंदी में रखना चाहते हैं। प्रस्तुत ग्रंथ में नीमाड़ी को पश्चिमी हिंदी के अंतर्गत रखा गया है। अधिकांश विद्वानों की मान्यता के अनुरूप शेष चारों का अध्ययन राजस्थानी के अंतर्गत प्रस्तुत किया जा रहा है।

     

    1. मारवाड़ी

     

    यह राजस्थानी की सर्वप्रमुख बोली है। मुख्य रूप से मारवाड़ की बोली होने के कारण यह मारवाड़ी कहलाती है। इसे 'अगरवाला' भी कहा जाता है। साहित्यिक मारवाड़ी को प्रायः 'डिंगल' नाम से जाना जाता है। मारवाड़ी मारवाड़, मेवाड़, पूर्वी सिन्ध, बीकानेर, जैसलमेर, दक्षिणी पंजाब तथा उत्तर-पश्चिमी जयपुर में बोली जाती हैं। मारवाड़ी के पाँच रूप देखने को मिलते हैं—

     

    परिनिष्ठित मारवाड़ी—मारवाड़

     

    पूर्वी—मगरा की बोली, मेरवाड़ी, गिरासियानी, मारवाड़ी, ढुंढारी, गोड़वारी, मेवाड़ी आदि।

     

    पश्चिमी—थली, ठटकी।

     

    उत्तरी—बीकानेरी, शेखावाटी, बागड़ी।

     

    दक्षिणी—गोड़वाटी, सिरोही, देवड़ावाटी, मारवाड़ी, गुजराती।

     

    कोलकाता में इस बोली को मारवाड़ी हिंदी के नाम से जाना जाता है।

    मारवाड़ी प्रायः नागरी लिपि में लिखी जाती है। ग्रियर्सन के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या लगभग 65 लाख थी। 1961 की जनगणना के अनुसार यह संख्या 62,42,449 है। साहित्यिक दृष्टि से यह बोली समृद्ध है। राजस्थान का लगभग संपूर्ण साहित्य मारवाड़ी के साहित्यिक रूप 'डिंगल' में लिखा गया है।

     

    मीरा की रचनाएँ भी मारवाड़ी में ही हैं। मारवाड़ी की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं一

     

    च, छ > स        — चक्की > सक्की, छाछ > सास

    ल >  ळ          — बाल > बाळ, जल > जळ

    अल्पप्राणीकरण    — भूख > भूक, हाथ > हात

    'ह' का लोप       — रहणो > रैणो

     

    संज्ञा—घोड़ा, घोड़ो, घोड़ै, घोड़ौ, घोड्या आदि।

     

    सर्वनाम—म्हूं, म्हे, अयाँ, तू, थूं, थे, ताथे, तायां, ऊ, वा, उण, उणी, जिको, कुण आदि।

     

    विशेषण—दोयू, दोयाँ, चिथार, च्यार, छव, पैलो, दूजो, चोथो, छट्‌ट्ठो आदि।

     

    क्रिया—चळूँ, चळियो, चळतो, चळहूँ, चळहाँ आदि।

     

    सहायक क्रिया—हूँ, हाँ, है, हैइ, हो आदि।

     

    क्रिया विशेषण—अबै, अमै, जदी, जदै, अठी, अठै, ईंठै, ऊँठैं, कठै, कैंठै आदि।

     

    2. जयपुरी

     

    ग्रियर्सन इसे मध्य पूर्वी राजस्थानी कहते हैं। यह शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से विकसित हुई हैं। अजमेरी, किशनगढ़ी तथा हड़ौती को भी जयपुरी में ही शामिल किया जाता है। जयपुरी नाम यूरोपियों का दिया हुआ बताया जाता है। स्थानीय लोग इसे 'ढुँढाड़ी' कहते हैं। इसके दो अन्य नाम हैं—झाड़साही बोली और काईं कुईं की बोली। यह जयपुर के अतिरिक्त किशनगढ़, इंदौर, अलवर के अधिकांश भाग, अजमेर और मेरवाड़ा के उत्तर-पूर्वी भाग में बोली जाती है। जी. मैकलिस्टर के भाषा सर्वेक्षण के अनुसार जयपुरी की तेरह उपबोलियाँ हैं, जिनमें प्रमुख हैं—मानक जयपुरी, तोड़ावरी, काठेड़ा, चौरासी, नागरचाल, राजावाटी तथा किशनगढ़ी। जयपुरी की भी मुख्य लिपि नागरी ही है। ग्रियर्सन के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 16,87,899 थी।

    जयपुरी में साहित्य-रचना कम ही हुई है। दादू-पन्थ का कुछ साहित्य जयपुरी में मिलता है। जयपुरी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

     

    अ > इ     — सड़ > सिंड

    इ > अ     — पंडित > पंडत

    उ > अ     — मानुख > मिनख

    आ > इ    — मानुख > मिनख

    अल्पप्राणीकरण — खुशी > कुसी, जीभ जीब

    महाप्राणीकरण — वक्त > बखत

    न > ण — कहानी > खाँणी 

     

    संज्ञा—घोड़ा, घोड़ौ, घोड्यां, घोड्या आदि।

     

    सर्वनाम—म्हे, अयाँ, म्हाँ, मैं, तू, थ, तै, थां, वै, ऊँ, जो, ती, कुण, कोऊँ आदि।

     

    विशेषण—चोखो, येक्, च्यार, छै आदि।

     

    क्रिया—चळूँ, चळो, चळे, चळयो, चळूँला, चळस्यूँ आदि। 

     

    सहायक क्रिया—हूँ, छाँ, छैं, छो, छै, छे आदि।

     

    3. मेवाती

     

    शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप में विकसित मेवाती ग्रियर्सन के अनुसार उत्तर-पूर्वी राजस्थान की एक बोली है। 'मेव' लोगों के कारण इस क्षेत्र का नाम मेवात और मेवात के कारण बोली का नाम मेवाती पड़ा। परंतु इसका क्षेत्र मेवात की तुलना में अधिक विस्तृत है। यह वास्तव में पूरे अलवर की भाषा है। भरतपुर के उत्तर-पश्चिमी भाग तथा हरियाणा के गुड़गाँव ज़िले के उत्तर-पश्चिमी भाग में भी मेवाती का प्रयोग होता है। मेवाती के ब्रज प्रदेश के निकट के क्षेत्र की बोली पर 'ब्रज' का पर्याप्त प्रभाव है। इसे राजस्थानी का ब्रजभाषा में विलीन होता रूप भी कहा गया है। कहीं-कहीं इस पर जयपुरी तथा अहीरवाटी का प्रभाव भी देखा जा सकता है। इसकी चार उपबोलियाँ मानी जाती हैं—1. मानक मेवाती (अलवर की भाषा), 2. राठी मेवाती (अहीरवाटी मिश्रित मेवाती), 3. नहेड़ा मेवाती (जयपुरी मिश्रित मेवाती) और 4. कठेर मेवाती (भरतपुर की बोली)। कुछ लोग गूजरी को भी इसी का एक रूप मानते हैं। मेवाती की लिपि नागरी है। मेवाती बोलने वालों की संख्या ग्रियर्सन ने 7,58,600 बताई है। 1961 के भाषा-सर्वेक्षण में यह संख्या 2,85,921 बताई गई है। मेवाती में साहित्य-रचना नहीं हुई। यहाँ सिर्फ़ लोक साहित्य मिलता है। मेवाती की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    महाप्राण > अल्पप्राण  — हाथ > हात्, जीभ > जीब, बतख > बतक

    अकारण अनुनासिकता — पचास > पँचास

    ल > ळ — बालक > बाळक, बाल > बाळ

    न > ण — पानी > पाणी

    उ > ओ — मुँह > मोंह

     

    संज्ञा—घोड़ा, घोड़ां, घोड़ौ, घोड्यां, घोड्या आदि।

     

    सर्वनाम—मैं, हमा, मूँ, तम, थम, वो, वा, वैं, उन, कौण, कैंह, कोई, कियई आदि।

     

    विशेषण—आकारांत योअन्त—बड़ी बड्‌यो, छोटो > छोट्यो

     

    क्रिया—चलूँ, चला, चलै, चलो, चलाँ, चल्या, चल्यो, चलूँगो, चलागो, चलैगो आदि।

     

    सहायक क्रिया—हूँ, सू, सां, सै, हो, सो, है, सै, सैं आदि।

     

    4. मालवी

     

    शौरसेनी अपभ्रंश के उपनागर रूप से विकसित मालवी मालव प्रदेश अर्थात उज्जैन के निकटवर्ती क्षेत्र की बोली है। इस क्षेत्र की बोली को पहले आवंती कहते थे। मालवी को आवंती का ही विकसित रूप माना जाता है। ग्रियर्सन इसे दक्षिण पूर्वी राजस्थानी कहते हैं। डॉ. चटर्जी इसे पश्चिमी हिंदी और राजस्थानी दोनों के निकट मानते हैं। इसका अधिकांश क्षेत्र मध्य प्रदेश में और कुछ राजस्थान में पड़ता है। मुख्यतः यह इंदौर, उज्जैन, देवास, रतलाम, भोपाल, होशंगाबाद और आसपास के क्षेत्र में बोली जाती है। मालवी की मुख्य उपबोलियाँ हैं—डांगी, सोंडवाडी, रांगडी, धोलेवाडी, मोयारी, पाटनी, करियाई, उमठवाडी, मन्दसौरी, रतलामी और डंगेसरी। कुछ लोग निमाड़ी को भी इसके अंतर्गत ही रखते हैं। परिनिष्ठित मालवी को अहीरी भी कहा जाता है। मालवी की प्रमुख लिपि नागरी है। इसके अतिरिक्त महाजनी तथा महाजनी और मुडिया प्रभावित नागरी का भी इसके लिए प्रयोग होता है। ग्रियर्सन के अनुसार इसके बोलने वालों की संख्या 43,50,507 थी। 1961 की जनगणना के अनुसार यह संख्या 11,42,478 है। मालवी में लोक साहित्य के साथ ही साहित्य की भी रचना हुई है। चंद्रसखी इसकी प्रसिद्ध कवयित्री हैं। मालवी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    ऐ > ए — चैन > चेन

    ह > य — मोहन > मोयन

    य > ज — युद्ध > जुद्ध

    न > ण — कहानी > कैंणी

    म > ड — मेंढक > डेंडक

    'ह' का लोप — महीना > मइना आदि।

     

    संज्ञा—घोड़ा, घोड़ो, घोड़ौ, घौड्याँ आदि।

     

    सर्वनाम—मूं, हू, म्हें, अयां, तूं, थे, था, थ, वो, वा, उणी, जाणी, कुण, कणी, काईं आदि।

     

    विशेषण—प्रायः हिंदी के समान। कुछ भिन्न-इक्कोत्तर (71), बहोत्तर (72), तियोत्तर (73), चुम्मोत्तर (74) आदि।

     

    क्रिया—चलूँ, चळाँ, चळो, चळेगा, चळेंगा आदि।

     

    सहायक क्रिया—हूँ, हाँ, हे, हो, है आदि।

     

    क्रिया विशेषण—याँ, अठे, उठे, अइँ, वइँ, तोड़ी, बायर आदि।

     

    पहाड़ी हिंदी की बोलियाँ

     

    पूर्व में हिमालय की निचली पर्वत मालाओं में नेपाल से प्रारंभ कर पश्चिम में भद्रवाह तक की आर्य भाषाओं को ग्रियर्सन ने पहाड़ी हिंदी नाम दिया है। पहाड़ी हिंदी को तीन वर्गों में रखा जा सकता है—पूर्वी पहाड़ी, पश्चिमी पहाड़ी और मध्य पहाड़ी। पूर्वी पहाड़ी को गोरखाली अथवा खसकुश भी कहा जाता है। यूरोपीय विद्वान इसके लिए 'नेपाली' संज्ञा प्रयोग करते हैं, परंतु ग्रियर्सन इससे सहमत नहीं हैं। 1961 की जनगणना में भी 'नेपाली' को पूर्वी पहाड़ी के अन्तर्गत ही परिगणित किया गया है। हिंदी की चर्चा करते समय मुख्य रूप से पश्चिमी पहाड़ी और मध्य पहाड़ी का ही विश्लेषण किया जाता है। इनकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    1. पश्चिमी पहाड़ी

     

    इसका क्षेत्र पंजाब के उत्तरी-पूर्वी पहाड़ी भाग में भद्रवाह, चंबा, कुल्लू, मंडी, शिमला, चकराता, और लाहुल-स्पिति तथा इसके आसपास है। 1961 की जनगणना के अनुसार पश्चिमी पहाड़ी में 62 बोलियाँ आती हैं। इनमें प्रमुख हैं—मण्डयाली, सिरमौरी, भरमौरी, जौनसारी, कोटगढ़ी, चौपाली, चंबा पहाड़ी, भद्रवाही, पंगवाली, सिराजी, पहाड़ी देहरादून, महलोगी, सुकेती तथा बघाती आदि। पश्चिमी पहाड़ी के लिए मुख्य रूप से नागरी, उर्दू और टाकरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। इन सभी बोलियों में साहित्य-रचना नहीं हुई है, परंतु लोक साहित्य पर्याप्त मात्रा में है। सभी बोलियों की अपनी कुछ अलग विशेषताएँ भी हैं।

     

    उदाहरणार्थ, जौनसारी और सिरमौरी की कुछ विशेषताएँ नीचे दी जा रही हैं—

     

    जौनसारी— स > छ — सत्यानाश > छत्यानाश
                 

                   द् > ज — खेद > खेज
             

                    लोप — याद > आद, वास्ते > आस्ते
     

                 अल्पप्राणीकरण — था > ता, भाई > बाया

     

    संज्ञा—घोड़ा, घोड़ो; घॅर, घॅरो आदि।

     

    सर्वनाम—हाऊँ, मे, ताऊँ, तौ, सो, एऊ, एजा आदि।

     

    क्रिया—चल्दो, मारदा, चलो, मारि, चलिकर, देकरि आदि।

     

    सहायक क्रिया—ऊँ, ओं, हूँ, अॅसो, ओं, आँ, थो, था, थी, थे आदि।

    *** *** ***

     

    सिरमौरी—आदि 'ह' का लोप—होना > ओणा, हिरण > इरण
    'ह' का आगम—और > होर

    अ, ओ, औ; इ, ए, एॅ; ए, ई, उ, ओ में आपसी परिवर्तन मिलता है।

     

    संज्ञा—पैड़ (पेड़), पैड़ो; किताब, किताबो; बेटा, बेटो आदि।

     

    सर्वनाम—आँ, आँव, हाँ, हों, मी, मेह, तू, ताँई, तेस, तेसी आदि।

     

    क्रिया—चलदा, होन्दा, चलो, चला, चली, टीपीरो (मारकर) टीपणा (मारना, चलना) आदि।

     

    सहायक क्रिया—असू, अॅसू, असे, अस, स, सो, था, थी, थे आदि।

     

    2. मध्य पहाड़ी

     

    इसे माध्यमिक, मध्यवर्ती अथवा केंद्रीय पहाड़ी भी कहते हैं। इसमें मुख्य रूप से कुमायूँनी और गढ़वाली बोलियाँ आती हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है।

     

    कुमायूँनी

     

    माध्यमिक पहाड़ी की एक बोली कुमायूँनी का प्रमुख क्षेत्र 'कुमायूँ' है। इस क्षेत्र के आधार पर ही इस बोली का यह नाम पड़ा है। 'कुमायूँ' शब्द का संबंध संस्कृत 'कूर्माचल' या 'कूर्मांचल' से है। इस बोली का प्रयोग कुमायूँ कमिश्नरी के नैनीताल के उत्तरी भाग, अलमोड़ा, पिथौरागढ़, चमोली तथा उत्तर-काशी ज़िलों में किया जाता है। इसके चारों ओर गढ़वाली, तिब्बती, नेपाली और पश्चिमी हिंदी का क्षेत्र है। राजस्थानी का तो इस पर इतना अधिक प्रभाव है कि यह उसका ही रूप-सा ज्ञात होती हैं। अब कुमायूँनी में अनेक उपबोलियाँ तथा स्थानीय रूप विकसित हो गए हैं, जिनमें खसपरजिया, कुमैयाँ, फल्दकोटिया, पछाईं (पछाहीं), चोगरखिया, गंगोला, दानपुरिया (दनपुरिया), सीराली (सिरयाली या सिरखाली), सोरियाली (सोराली), अस्कोटी, जोहारी, रउचौभैसी (इसके प्रमुख स्थानीय रूप हैं—छखातिया, रामगढ़िया और बाज़ारी) और भोटिया अधिक प्रसिद्ध हैं। कुमायूँनी लिखने में नागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। कुमायूँनी बोलने वालों की संख्या ग्रियर्सन के अनुसार 4,36,788 थी। कुमायूँनी में साहित्य-रचना पिछले दो-ढाई सौ वर्षों में ही हुई है। गुमानी पंत, सिवदत्त सत्ती और कृष्ण दत्त पाण्डे आदि इसके प्रसिद्ध साहित्यकार हैं।

    कुमायूँनी की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं—

     

    न > ण — बहिन > बैणी, किसान > किसाण

    ल > ळ — बादल > बादळ, काला > कालो

    अकारण अनुनासिकता — चावळ > चाळँ, जौ > जौं

    आदि में 'ह' का आगम — और > हौर, हौरे

    अंत में 'आ' का आगम — सात > शाता; बीसा, तीशा आदि।

     

    संज्ञा—बल्द, बल्दन, बल्दों, चेलो (लड़का), च्याला आदि।

     

    सर्वनाम—में, मैं, हेम लोग, तू, तु, त्वीले, त्वैले, वी, उ, ऊँ, येकणी, एकणी, क्वे, कै, कैं, कौ, कूण आदि।

     

    विशेषण—एका, द्वि, द्विया, बारा, तेरा, चौदा, शोल, त्याइस, पैलु (पहला), दुसरु, तिशौरु आदि।

     

    क्रिया—मारन, मारनू, मारनो, मारीं, मारियाछन, मारलो आदि।

     

    सहायक क्रिया—छूँ, छुँ, छै, छे, छो, छा, छियूँ, छ्यूँ, छिये, छियो आदि।

     

    क्रिया विशेषण—इतकै, याँ, वाँ, जितकै, भोल (कल), भोअ (आने वाला कल), पोर्हूँ (परसों) कथली (कभी), तल्ली (नीचे), मल्ली (ऊपर) आदि।

     

    गढ़वाली

     

    माध्यमिक पहाड़ी की इस बोली का क्षेत्र प्रमुख रूप से गढ़वाल प्रदेश है। 'गढ़वाल' की भाषा होने के कारण ही इसे 'गढ़वाली' कहा जाता है। पहले का केदारखंड या उत्तराखंड ही बहुत से गढ़ों के कारण मध्ययुग में 'गढ़वाल' कहा जाने लगा था। इस बोली का प्रयोग क्षेत्र गढ़वाल और इसके आसपास का प्रदेश, टेहरी, अलमोड़ा के अतिरिक्त देहरादून, सहारनपुर, बिजनौर और मुरादाबाद ज़िलों के उत्तरी भाग तक विस्तृत है। गढ़वाली का परिनिष्ठित रूप 'श्रीनगरिया' है। इसके अतिरिक्त इसकी बहुत सी उपबोलियाँ भी हैं जिनमें प्रमुख हैं—राठी, लोहब्या (लोबयाली), बधानी (बधाणी), दसौलया, माँझ-कुमैयाँ (कुमायूँनी और गढ़वाली का मिश्रण, इसे अल्मोड़े में 'दो संधि' कहा जाता है।) नगपुरिया, सलानी और टेहरी। 'टेहरी' को 'गंगापारिया' भी कहा जाता है। इसके स्थानीय रूप हैं—टकनौरी-बाड़ाहटी, रमोल्या, जौनपुरी, रवांल्टी, बडियार गड्डी तथा गंगाड़ी। ग्रियर्सन के अनुसार इसे बोलने वालों की संख्या 6,70,824 थी। नागरी लिपि में लिखी जाने वाली 'गढ़वाली' में साहित्य लगभग नहीं है। किंतु लोक साहित्य की दृष्टि से यह पर्याप्त संपन्न है। गढ़वाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

     

    क्ष > क — ऋक्ष > रिक्

    त्स, प्स > छ — मत्स्य > माछो, अप्सरी > आछरी

    श > छ — शनिश्चर > छंछर

    ल > ळ — पाताल > पयाळ

    आंगम — संसार > संगसार

    'ह' का लोप — चान्स > चांगस

     

    संज्ञा—नौना (लड़का), नौनो, नौनु, नौनौंन्, नौनूँन, गौनौंक, नौनूँक आदि।

     

    सर्वनाम—मैं, मइँ, मैंक, मैंकु, मेरो, मेरु, हमतें, हमुंते, हनुमान, हमुसि, हमारु, तुइन, वु, ओ, एइ, सणि, क्वी, कुइ आदि। 

     

    विशेषण—आकारांत > ओकारांत—काला काळो, तुलना हेतु 'ती', 'चै', 'चुली' का प्रयोग, यअक, द्वि, दू, चअर, त्याइस, सुत्तैस, एक बिसि सात, ढामा (2½), पैलू (पहला) आदि। 

     

    क्रिया—चलदूँ, चलदू, चलणे, चलणै, चलण्यूँ, चल्यूँ, चल्यान आदि।

     

    सहायक क्रिया—छौं, छऊँ, छवाऊँ, छौं, छवाँ, छया, थौ, थो, थयो आदि।

     

    क्रियाविशेषण—अब, अबेर, जदि, जैअ, वख, वत्थ, यथैं, वथैं, जथैं आदि।

     

    भाषा और बोली में अंतर

     

    ऊपर स्पष्ट किया गया है कि हिंदी भाषा की सत्रह अठारह बोलियाँ हैं। भाषा और बोली दोनों ही एक मूल स्रोत से सम्बद्ध होती हैं और भाव-विचार संप्रेषण क समान कार्य संपन्न करती हैं। भाषावैज्ञानिक दृष्टि से इन दोनों में कोई अंतर नहीं माना जाता है। समय और परिस्थिति के अनुसार भाषा बोली में तथा बोली भाषा के परिवर्तित हो सकती है। तथापि व्यावहारिक दृष्टि से भाषा और बोली के अंतर को निम्न रूप में देखा जा सकता है।

     

    1. भाषा का क्षेत्र बोली की तुलना में अधिक विस्तृत होता है। उदाहरणार्थ, हिंदी भाषा भारत के अनेक प्रदेशों—हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार आदि तक फैली हुई है जबकि खड़ी बोली का विस्तार प्रायः पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सीमित क्षेत्र में ही है।

     

    2. एक भाषा के अंतर्गत उस भाषा की एकाधिक बोलियों को परिगणित किया जाता है, परंतु एक बोली एकाधिक भाषाओं से अपना संबंध सिद्ध नहीं कर सकती।

     

    3. भाषा का भौगोलिक और प्रयोक्ता-क्षेत्र विस्तृत होने के कारण इसके प्रयोक्ताओं की संख्या बोली के प्रयोक्ताओं की तुलना में अधिक होती है। बोली के प्रयोक्ता भी आवश्यकता पड़ने पर भाषा का प्रयोग करते हैं।

     

    4. भाषा बोली का विकसित रूप होती है। अतः बोली की तुलना में इसके विकास की संभावनाएँ कम होती हैं।

     

    5. भाषा और बोली की तुलना एक सीमा तक स्वनिम तथा संस्वन से की जा सकती है जिस प्रकार स्वनिम अनेक मिलती-जुलती संस्वन ध्वनियों का प्रतिनिधित्व करता है, उसी प्रकार अनेक मिलती-जुलती बोलियों का एक स्वीकृत रूप 'भाषा' कहलाता है। तथा जिस प्रकार एक स्वनिम के विभिन शाब्दिक परिस्थितियों में कई संस्वन होते हैं, उसी प्रकार क्षेत्रीय आधार पर एक भाषा की कई बोलियाँ संभव है।

     

    6. भाषा को प्रभावित करने वाले अनेक कारक होते हैं। राजनीतिक कारणों से खड़ी बोली आधारित भाषा रूप को 'भाषा' का दर्जा मिला तो साहित्यिक कारणों से एक समय ब्रज और अवधी भाषाएँ सिरमौर रहीं। छायावाद में तत्समनिष्ठता को प्रश्रय मिला तो प्रयोगवाद के समय तद्भव रूप को। विद्वान भी भाषा को प्रभावित करते हैं। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी भाषा को अत्यधिक प्रभावित किया। उन्होंने इसके व्याकरण का रूप स्थिर करने में मदद की। कामताप्रसाद गुरु, किशोरीदास वाजपेयी, भोलानाथ तिवारी आदि ने भी इसमें सहयोग प्रदान किया। बोली राजनीति, साहित्य अथवा विद्वानों के प्रभाव में बहुत कम आती है अथवा प्रायः नहीं आती।

     

    7. भाषा का उत्थान-पतन-विकास राजनीतिक कारणों पर अधिक निर्भर करता है। हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिलने के कारण सरकार इसकी प्रगति के लिए निरंतर प्रयासरत है जबकि बोलियों का उत्थान-पतन और विकास प्रायः सामाजिक कारणों पर निर्भर करता है।

     

    8. भाषा अपने संबद्ध भौगोलिक क्षेत्र में शिक्षा का माध्यम होती है। हिंदी, तमिल, मराठी, बंगला आदि अपने-अपने प्रदेशों में शिक्षा का माध्यम हैं। अँग्रेज़ी भाषा लगभग पूरे भारत में माध्यम भाषा के रूप में प्रयुक्त होती है। बोली को शिक्षा का माध्यम नहीं बनाया जा सकता।

     

    9. बोली का प्रयोग प्रशासनिक कार्यों में भी किया जाता है। राजभाषा हिंदी का प्रयोग तो विभिन्न कार्यालयों में होता ही है, तमिल, तेलुगू, उड़िया, आदि भाषाओं का प्रयोग अपने-अपने प्रदेशों में प्रशासनिक कार्यों में किया जाता है। परंतु किसी भी बोली का प्रयोग प्रशासनिक कार्यों के लिए नहीं किया जा सकता।

     

    10. सामाजिक प्रकार्य की दृष्टि से भाषा स्वनिष्ठ एवं स्वायत्त होती है और बोली परावलंबी एवं आश्रित। इसीलिए हम किसी भाषा की बोलियाँ तो गिना सकते हैं, पर यह नहीं कह सकते कि इन बोलियों की भाषा हिंदी/अँग्रेज़ी/तमिल है।

     

    11. समाज भाषा के परंपरागत, व्याकरणबद्ध, प्राचीन रूप को सुरक्षित रखना चाहता है। विभिन्न भाषाओं के व्याकरण इसी दृष्टि से तैयार किए जाते हैं। पाणिनी की अष्टाध्यायी और हिंदी के अनेकानेक व्याकरण-ग्रंथ इसका स्पष्ट प्रमाण हैं। संस्कृत भाषा के प्रयोक्ता आज भी उसे उसके लगभग डेढ़ हज़ार वर्ष पुराने रूप में बोलने का प्रयास करते हैं। हिंदी में भी शिक्षित वर्ग व्याकरणसम्मत भाषा के प्रयोक्ता को ही सम्मान का अधिकारी मानता है। इस प्रकार भाषा में परिवर्तन की गति अपेक्षाकृत धीमी होती है। बोली इस दृष्टि से अधिक सहज एवं उदार होती है तथा वह परिवर्तन के लिए भी तैयार रहती है।

     

    12. भाषा का राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग संभव है। हिंदी का प्रयोग संपूर्ण भारत में हो, इसके लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं। इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी संयुक्त राष्ट्र संघ को एकाधिक बार हिंदी में संबोधित कर चुके हैं। इसी प्रकार अँग्रेज़ी भाषा का प्रयोग भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। इसके विपरीत बोली का प्रयोग स्थानीय स्तर पर ही संभव है।

     

    13. साहित्य की रचना प्रायः भाषा में ही की जाती है। मध्यकाल में ब्रजभाषा अवधी भाषा के पद पर आसीन थीं और इन्हीं में साहित्य की रचना हुई। आधुनिक काल में यह स्थान खड़ी बोली पर आधारित भाषा रूप को मिल गया और अब उसी में साहित्य-रचना हो रही है। बोली में साहित्य की रचना बहुत कम होती है, इसमें लोक साहित्य की रचना ही अधिक होती है।

     

    14. भाषा सापेक्षतया अधिक मानकीकृत होती है, बोली का उस सीमा तक मानकीकरण संभव नहीं है।

     

    15. भाषा का प्रयोग औपचारिक संदर्भों में होता है जबकि बोली का प्रयोग अनौपचारिक संदर्भों में होता है।

     

    हिंदी का अंतरराष्ट्रीय संदर्भ

     

    हिंदी शब्द का प्रयोग उत्तर भारत के हिंदु-मुस्लिमों की साहित्यिक भाषा, इस भू-भाग की बोलियों और उनसे संबद्ध साहित्यिक ग्रंथों के अर्थ में होता है। हिंदी प्रदेश की सीमाएँ पश्चिम में जैसलमेर, उत्तर-पश्चिम में अंबाला, पूर्व में भागलपुर, दक्षिण में रायपुर और दक्षिण-पश्चिम में खंडवा तक पहुँचती है। शेष भारत में भी दक्खिनी, मुंबइया, कोलकतिया शैलियों अथवा अन्य रूपों में हिंदी का न्यूनाधिक प्रयोग उपलब्ध होता है।

     

    हिंदी का प्रयोग भारत के बाहर भी उपलब्ध है। हज़ारों की संख्या में हिंदी भाषी बाहर गए हैं और अपनी भाषा को भी ले गए हैं। ऐसे क्षेत्रों में कुछ तो अत्यंत विशिष्ट हैं जहाँ बड़ी संख्या में भारतीय रह रहे हैं और वे सार्वजनिक जीवन को भी प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे देशों में प्रमुख हैं—फ़िजी, मॉरीशस, सूरिनाम, त्रिनिदाद और दक्षिणी अफ़्रीका। डॉ. विमलेश कांति वर्मा के अनुसार फ़ौजी में तो शायद ही ऐसा कोई भारतीय या फ़िजियन हो जो हिंदी न समझता हो। संभवतः इसलिए फ़िजी को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है। फ़िजी में हिंदी आधी से अधिक जनसंख्या (52%) की मातृभाषा है तथा उसे सरकारी कामकाज की भाषा के रूप 1987 तक संसदीय मान्यता भी प्राप्त थी। सूरिनाम में भारतीय सबसे पहले 1873 ई. में पहुँचे। उस देश में भारतीय मूल के लोगों की संख्या सर्वाधिक (39%) है। इन भारतीयों की बोलचाल की भाषा आज भी हिंदी है, जिसे सरनामी हिंदी कहा जाता है।

     

    विदेशों में आज हिंदी की अपनी शैलियाँ विकसित हुई हैं। वहाँ हिंदी में अध्ययन-अध्यापन और शोध कार्य हो रहा है। अनेकानेक लेखक हिंदी में साहित्य रचना कर रहे हैं। वहाँ हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हिंदी पहुँची है।

     

    विदेशों में भारतीय प्रायः आजीविका की खोज में गए थे। सर्वाधिक प्रवासी भारतीय मॉरीशस (1843 ई.), त्रिनिदाद (1845 ई.), दक्षिण अफ़्रीका (1860 ई.), गुयाना (1870 ई.), सूरिनाम तथा फ़िजी में गए। इनमें से अधिकतर पूर्वी उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बिहार के निवासी थे। ये अपने साथ अपनी बोलियाँ अवधी और भोजपुरी भी लेकर गए और हिंदी तथा भारतीय संस्कृति को अक्षुण्ण रखने की चाहत में गीता और रामायण भी। इन्होंने वहाँ अपनी भाषा को जीवित तो रखा परंतु कालक्रम में उसमें उन देशों के मूल निवासियों की भाषा तथा अँग्रेज़ी के कुछ शब्दों का समावेश होता गया। 'परिवर्तनशीलता' के भाषाई सिद्धांत के आधार पर उनकी भाषा में स्वाभाविक परिवर्तन भी आए तथा सभी क्षेत्रों में अवधी, भोजपुरी अर्थात हिंदी की नवीन शैलियाँ विकसित हो गई। फ़िजी में बोली जाने वाली हिंदी को 'फ़िजीबात' या 'फ़िजी हिंदी' का नाम मिला तो सूरिनाम की हिंदी 'सरनामी हिंदी' अथवा 'सरनामी' कहलाई। सरनामी हिंदी में भोजपुरी, अवधी, ब्रज तथा खड़ी बोली का मिश्रित स्वरूप देखा जा सकता है। दक्षिण अफ़्रीका के 'डरबन' में भारतीय मूल के निवासी सर्वाधिक हैं। 'नैताली' भोजपुरी हिंदी का ही एक रूप है जो यहाँ विकसित हुआ है। उज़्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान में भी हिंदी की ही एक विशिष्ट शैली का प्रयोग होता है। डॉ. भोलानाथ तिवारी ने इसे ताजुज़्बेकी नाम दिया है। कुछ विद्वान इसे 'पार्या' नाम से जानते हैं।

     

    यहाँ दो उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

     

    1. ताजुज़्बेकी—

    ताजुज़्बेकी                         हिंदी
    में कम करुइँ                      मैं काम करता हूँ
    किल्जो मुरा दुकई                 कलेजा मेरा दुखता है।
    कल्खोज को रईस आयो           कल्खोज का प्रधान आया।1

     

    2. फ़ीजी हिंदी—

     

    अभी तक कुस्ती बराबर रहा। ई चउथा राउन में हमके हर हालत में जीते के रहा। हम बजरंगबली के लिहा नाम। सबके खदेरा रिंग से बाहर। चढ़ा अपने रेड कोना के खूटा पे, वइसहीं लगा घंटी। हमके जनाय कि हमरे उप्पर हनुमान जी सवार हो गइन। हमार दहिना हथवा मालुम होय जइसे गदा। फिर हम अउर टेका हाथ पकर के पंजा लड़ावा। हम दहिना हाथ से दबावा ओकर पंजा अउर ऊ चला जाए नीचे गिरते। बइठ गए मेट पे अउर अंगुरी झटके लगा। हम खड़ा भया अठर फिर पंजा बढ़ाया, ऊ सरवा मेट पे से उठवे न करे। हम रफरी के बतावा, ए बुदांगो, बोसा कोकोया तू दाके रे। हम बोला उसके बताओ उठे उप्पर।2

     3

    4अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की भी लंबी परंपरा है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 1.25 करोड़ भारतीय मूल के लोग विश्व के लगभग 132 देशों में रहते हैं। स्वाभाविक रूप से उनका लगाव हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की ओर भी है।

     

    हिंदी के संबंध में प्रारंभिक ग्रंथ व्याकरण से संबंधित थे, जो प्रायः अँग्रेज़ी में लिखे गए थे। हिंदी भाषा का पहला व्याकरण जान जोशुआ केटलर ने डच भाषा में लिखा। इसका रचना काल 1695 ई. से 1697 ई. के बीच माना जाता है। इसके बाद 'ग्रामाटिका हिंदोस्तानिका' (बेंजामिन शुल्ट्ज, 1744 ई.) प्रकाश में आया। इनके अतिरिक्त जार्ज हेडले, जान फर्गुसन, गिलब्राइस्ट, लेविदेफ, विलियम प्राइस आदि ने विदेशी भाषाओं में हिंदी संबंधी व्याकरण, कोश आदि की रचना की। हिंदी भाषा में हिंदी का पहला व्याकरण, एम.टी. आदम में लिखा। इनके अतिरिक्त सैंटफोर्ड ऑर्नोट, गार्सां द तासी, जेम्स आर. बैलेंटाइन, मेनियर विलियम्स, रूडोल्फ हॉर्नली आदि ने भी हिंदी संबंधी व्याकरण, इतिहास ग्रंथ, भाषा-शोध संबंधी रचनाएँ प्रस्तुत कीं। आज भी अनेक विदेशी एवं भारतीय मूल के विदेशी नागरिक हिंदी के अध्ययन से जुड़े हुए हैं।

     

    विश्व के अनेक देशों में हिंदी अध्ययन-अध्यापन का काम पूरे जोरों पर हैं।

     

    उदाहरणार्थ—अर्जेन्टाइना, आस्ट्रेलिया (कैनबरा, मेलबोर्न, सिडनी) आस्ट्रिया, बेल्जियम, कनाड़ा, चीन, चेक, स्लोवाकिया, डेनमार्क, जर्मनी (बर्लिन, फ्रेंकफर्ट, फ्राइबर्ग, म्यूनिख आदि), फिनलैंड, फ़्रांस, हंगरी, इटली, जापान, न्यूज़ीलैंड, अमेरिका (एरिजोना, शिकागो, न्यूयार्क, टेक्सास, वाशिंगटन डी.सी. आदि) रूस, यूगोस्लाविया, त्रिनिडाड आदि में सौ के क़रीब अध्ययन केंद्रों में हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था है। उदाहरणस्वरूप, यहाँ कुछ देशों का विस्तृत परिचय दिया जा रहा है।

     

    मारीशस—मारीशस में हिंदी के प्रचार और शिक्षण के लिए पहले तो वहाँ के हिंदी-भाषियों को संघर्ष करना पड़ा किंतु धीरे-धीरे हिंदी को मान्यता मिल गई। वहाँ का हिंदी शिक्षण एक आंदोलन के साथ शुरू हुआ। आर्यसमाज ने गाँव-गाँव घूमकर हिंदी पाठशालाओं की स्थापना की। 1926 ई. में वहाँ 'हिंदी प्रचारिणी सभा' की स्थापना हुई जिसके द्वारा 'तिलक विद्यालय' की स्थापना हिंदी की व्याकरण सम्मत पढ़ाई के लिए की गई जो 1946 ई. में 'हिंदी भवन' के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 1954 से वहाँ सरकारी पाठशालाओं में भी हिंदी पढ़ाई जाने लगी। 1968 ई. में द्वीप के स्वतंत्र होने के बाद सन् 1973 से यहाँ पाठशालाओं में हिंदी पढ़ाने का समय भी बढ़ा दिया गया। पहले विद्यार्थी छठी कक्षा के बाद हिंदी परीक्षा में भाग लेते थे जिससे उनकी हिंदी शुद्ध नहीं होती थी। हिंदी प्रचारिणी सभा ने 1964 में छठी और परिचय कक्षाओं के बीच एक और परीक्षा का आयोजन किया, जिसमें भाषा की शुद्धता पर अधिक बल दिया गया।

     

    सूरीनाम—सूरीनाम में भारतवंशियों की ओर से देश भर में हिंदी शिक्षण के केंद्र स्थापित किए गए हैं। 'श्री सनातनधर्म सभा' तथा 'आर्य समाज' की ओर से सौ से अधिक विद्यार्थियों में एक विषय के रूप में हिंदी पढ़ाई जाती है। यद्यपि वहाँ 'डच' को अधिक महत्त्व प्राप्त है तथापि सूरीनाम की राजधानी पारामारीबो में भारतीय सांस्कृतिक संबध परिषद द्वारा स्थापित केंद्र में व्यावहारिक हिंदी एवं उच्च हिंदी शिक्षण की कक्षाएँ चल रही हैं। सूरीनाम रेडियो द्वारा हिंदी शिक्षण प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम चलाया जाता रहा है। सूरीनाम की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के आधार पर उच्चारण, वार्तालाप, लिपि तथा संरचना के पाठों का निर्माण किया गया है और उसी आधार पर विद्यार्थियों को शिक्षित किया जा रहा है। स्थानीय हिंदी परिषद् में भी हिंदी शिक्षण की व्यवस्था है। परिषद् के अपने पाठ्यक्रम हैं और उन्हीं पाठ्यक्रमों की पढ़ाई हिंदी परिषद् में होती है। पाठ्यक्रम संचालन में भारतीय हिंदी प्राध्यापकों से भी परामर्श किया जाता है। 'माता गौरी संचालन' में भी हिंदी के शिक्षण की व्यवस्था की गई है।

     

    फ़िजी—फ़ीजी में पहली भारतीय पाठशाला की स्थापना सन् 1916 में हुई। उसके बाद सनातन धर्म सभा, आर्य सभा, आर्य समाज, गुरुद्वारा कमेटी, तमिल और आंध्र संगम आदि ने अनेक पाठशालाएँ खोलीं और उनमें हिंदी शिक्षण का कार्य नियमित रूप से प्रारंभ हो गया। आगे चलकर शिक्षा विभाग में भी हिंदी को पाठ्यक्रम का एक विषय माना गया। फ़िजी जूनियर तथा सीनियर कैंब्रिज की परीक्षा तक हिंदी की पढ़ाई की व्यवस्था की गई। इस समय वहाँ कई सौ विद्यालयों में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर तक हिंदी पढ़ाई जाती है। सूवा स्थित टीचर्स कॉलेजों में भी छात्र-अध्यापकों को हिंदी पढ़ाने की व्यवस्था है। इसके अतिरिक्त भारतीय हाई कमीशन में भी कक्षाएँ लगती रही हैं।

     

    फ़िजी के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश हिंदी पाठ्यपुस्तकें फ़िजी के हिंदी विद्वानों द्वारा ही तैयार की गई है। फ़िजी के एकमात्र विश्वविद्यालय 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथ पैसेफ़िक' में भी प्राथमिक स्तर पर हिंदी का अध्यापन हो रहा है।

     

    त्रिनिदाद—त्रिनिदाद में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था कई प्रकार की है। वहाँ की 'सनातन धर्म महासभा', 'आर्य प्रतिनिधि सभा' तथा 'कबीर पंथ' के पचास से अधिक विद्यालय हिंदी की शिक्षा देते हैं। 'हिंदी साहित्य परिषद्' की विभिन्न शाखाओं की ओर से भी हिंदी शिक्षण की व्यवस्था है। इनके अतिरिक्त वहाँ रेडियो और दूरदर्शन के हिंदी कार्यक्रम भी हिंदी की व्यावहारिक शिक्षा देते हैं। भारतीय उच्चायोग की ओर से भी त्रिनिदाद के अनेक भागों में हिंदी कक्षाएँ आयोजित की जाती हैं।

     

    गुयाना—गुयाना में भाई परमानंद, महता जैमिनी, प्रो. भास्करानंद आदि के प्रयास से हिंदी-शिक्षण का वातावरण बना था। प्रो. उदयनारायण तिवारी के प्रयास से वहाँ हिंदी प्रचार सभा स्थापित हुई जिसकी प्रेरणा से वहाँ कई पाठशालाएँ चल रही हैं।

     

    क्यूबा—क्यूबा में भारतीय सांस्कृतिक संबध परिषद् के तत्त्वाधान में 1979 ई. में हिंदी का अध्यापन चतुर्वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम के रूप में शुरू हुआ। पहले वर्ष में हिंदी भाषा के मौखिक पक्ष पर बनाए छोटे-छोटे वार्तालाप, फिर लिपिशिक्षण, भारतीय परिवार-व्यवस्था, रिश्ते-नाते की शब्दावली आदि सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में निर्मित हिंदी पाठ्यक्रम पर बल दिया गया है। दूसरे वर्ष के लिए हिंदी की विभिन्न सामाजिक शैलियों तथा प्रयुक्तियों पर आधारित पाठ्यक्रम तैयार किए गए है। इसमें भारतीय संस्कृति की झाँकी प्रस्तुत करने वाली घटनाओं, विभिन्न क्रांतिकारियों की जीवनियों, प्रमुख नेताओं के भाषण आदि पर बल दिया गया है। तीसरे वर्ष में हिंदी संरचना के अध्ययन के साथ-साथ, हिंदी ध्वनि-विज्ञान, हिंदी कोश तथा अर्थ-विज्ञान, हिंदी व्याकरण आदि को प्रमुखता दी गई है। अंतिम वर्ष मैं क्रमशः स्पेनिश से हिंदी और हिंदी से स्पेनिश का अनुवाद कराया जाता है। क्यूबा में हिंदी शिक्षण में दृश्य एवं श्रव्य सामग्री जैसे टेपरिकार्डर, स्लाइड प्रोजेक्टर, भाषा प्रयोगशाला आदि का भी उपयोग किया जाता है।

     

    नेपाल—नेपाल में अनेक महाविद्यालयों में हिंदी शिक्षण की व्यवस्था है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर कक्षा तक हिंदी में अध्ययन की व्यवस्था है। पहले भारत में हिंदी के विद्वान वहाँ विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में जाते थे परंतु अब स्वयं नेपाली लोग हिंदी में इतने पारंगत हो गए हैं कि स्नातकोत्तर कक्षा तक अध्यापन का दायित्व भी वे स्वयं सँभाल रहे हैं।

     

    डेनमार्क, बर्मा, फ़्रांस—डेनमार्क में हिंदी शिक्षण 1964 ई. से प्रारंभ हुआ। यद्यपि प्रारंभ में यहाँ हिंदी की परीक्षा लेने तक का प्रबंध नहीं था परंतु अब यहाँ बी.ए. एम.ए. स्तर तक हिंदी की परीक्षा आरंभ हो गई है। बर्मा में हिंदी-शिक्षण सन् 1918 से ही आरंभ हो गया था। यहाँ 'हिंदी साहित्य सम्मेलन' इस दृष्टि से विशेष रूप से सक्रिय रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बर्मा की लगभग 300 हिंदी पाठशालाओं को संगठित करके एक विशेष स्तर के पाठ्यक्रम निश्चित किए गए। 1956 ई. में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की परीक्षाओं का केंद्र भी यहाँ खुल गया। हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग तथा आर्य समाज की ओर से भी यहाँ अनेक स्थानों पर हिंदी शिक्षण की व्यवस्था की गई है। फ़्रांस के पेरिस विश्वविद्यालय में भी हिंदी की पढ़ाई व्यवस्थित रूप से होती है।

     

    सोवियत संघ—राजनीतिक दृष्टि से सोवियत संघ अब कई भागों में विभाजित हो गया है, परंतु पूर्व सोवियत संघ के रूस सहित कई देशों में हिंदी शिक्षण लंबे समय से चल रहा है। लेनिनग्राद में एक पूरा का पूरा स्कूल हिंदी माध्यम से शिक्षा देता रहा है। मास्को विश्वविद्यालय में 'इंस्टीट्यूट ऑफ़ एफ़्रो एशियन कंट्रीज़' भी हिंदी-शिक्षण के लिए ख्यात रहा है। जार्जिया की राजधानी तिबालिसी, अर्मीनिया की राजधानी, लिथुयानिया की राजधानी, विलिनियस, ताजिकिस्तान की राजधानी दुशाबे तथा उज़्बेकिस्तान के ताशकंद के अनेक विश्वविद्यालयों में हिंदी अध्यापन का कार्य चल रहा है। भारतीय साहित्य के क्षेत्र में तो सोवियत संघ के अनेक विद्वान सक्रिय रहे ही हैं, हिंदी की पाठ्य पुस्तकों और व्याकरण का निर्माण भी वहाँ हुआ है। एस. दिम्शित्स, वी. गारिउनोव, ओ. उलटिसफेरोव जैसे भाषाविदों ने हिंदी पाठ्य पुस्तकों की रचना की है और जवाहरलाल नेहरू पुरस्कार भी जीता है।

     

    जर्मनी—जर्मनी में भी हिंदी शिक्षण का कार्य अनेक वर्षों से चल रहा है। वहाँ फ्रेडरिच विलर ने लीपजिग विश्वविद्यालय में हिंदी-शिक्षण का कार्य प्रारंभ किया। इस कार्य में प्रसिद्ध भारतीय विद्वान शांति भिक्षु शास्त्री ने भी इनकी मदद की। 1961 में मार्गेट गात्स्लाफ़ हेलसिग ने हिंदी व्याकरण और भारत में भाषाई स्थिति पर अनुसंधान कार्य किया तथा हिंदी शिक्षण में सक्रिय रहीं। जर्मनी में इस दृष्टि से कुछ पुस्तकों का निर्माण भी हुआ है जैसे—हिंदी व्याकरण गाइड (मार्गेट गात्स्लाफ़ हेलसिग), जर्मनी हिंदी कोश (मार्गेट गातलाफ हेलसिग) तथा जर्मन-हिंदी वार्तालाप पुस्तक (दरमग मारकोपा) हिंदी-जर्मन कोश (एरिका क्लेम) आदि। जर्मनी के हौडलबर्ग विश्वविद्यालय के साउथ एशिया इंस्टीट्‌यूट में तो पी-एच.डी. तक की सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

     

    अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी में साहित्य सर्जन भी पर्याप्त हो रहा है। आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन (न्यूयार्क) में इस विषय पर बोलते हुए उषा राजे सक्सेना ने कहा था, साहित्य सर्जन की दृष्टि से भारत से बाहर के देशों में ग्रेटब्रिटेन और मॉरीशस की स्थिति काफी शुद्ध है। मॉरीशस में सन् 1976 में दूसरा विश्व हिंदी सम्मेलन व 1993 में चौथा विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया गया। मॉरीशस सरकार का कला एवं संस्कृति मंत्रालय हर वर्ष विभिन्न भाषाओं के नाट्य समारोहों का आयोजन करता है जिसमें सर्वाधिक हिंदी नाटक होते हैं। साहित्यिक प्रतियोगिताएँ भी आयोजित की जाती हैं। सन् 1996 में यहाँ हिंदी साहित्य अकादमी की स्थापना की गई। हिंदी भाषा और साहित्य के विकास तथा प्रकाशन के क्षेत्र में क्रांति लाने का दावा इस संस्थान का है। डॉ. हेमराज बुन्द संस्थापक हैं। सन् 1976 में स्थापित महात्मा गांधी संस्थान की ओर से हिंदी में कई महत्त्वपूर्ण प्रकाशन सामने आए हैं जैसे—मॉरीशस की हिंदी कविता, मॉरीशस के नौ हिंदी कवि, मॉरीशस के हिंदी एकांकी, मॉरीशस में कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक और निबंध अधिक लिखे जा रहे हैं।

     

    ग्रेटब्रिटेन में भारतीय विद्याभवन, महालक्ष्मी, मंदिर, ई लिंग, आर्य समाज, हिंदू कल्चरल सोसायटी फिंचले, हिंदू कल्चरल सोसायटी स्लाओ, हिंदी बाल भवन, हिंदू सोसायटी टूटिंर्ग लंदन, कला निकेतन नौटिंघम, भारतीय विद्या भवन, मैनचेस्टर, गीता भवन, लेस्टर दुर्गा भवन, रंडेल, श्री लैंड लैंग्वेल कॉलेज, पार्कहाल स्कूल, श्रीकृष्ण मंदिर बुल्वर हैम्पटन, हिंदू समाज मंदिर रेडिंग आदि ने साहित्यिक सर्जन के सराहनीय कार्य किए हैं। हिंदी और अँग्रेज़ी दोनों ही भाषाओं में साहित्य-सर्जन के क्षेत्र में श्रीमती उषा राजे सक्सेना का नाम उल्लेखनीय है। चंचल जैन बर्मिंघम की कविताएँ सबको आकर्षित करती हैं। जमाइका, त्रिनिदाद, टुबैगो, गयाना, फ़िजी, सूरीनाम आदि देशों में भी हिंदी साहित्य के विकास कार्य में अनेक प्रवासी साहित्यकार विशेषरूप से अपना योगदान दे रहे हैं। अर्चना पेन्युली, डेनमार्क की कहानियाँ, डॉ. चिंतामणि मिश्र की कहानियाँ, डॉ. बीरसेन जागा सिंह मॉरीशस की कविताएँ उल्लेखनीय हैं। अमेरिका की कुसुम बेदी, मॉरीशस के अभिमन्यु अनत तथा लंदन से प्रकाशित हिंदी साहित्यिक त्रैमासिक पुरवाई की सह-संपादिका, हिंदी सम्प्रति यू.के. की उपाध्यक्ष उषा राजे सक्सेना की रचनाओं में साहित्यिक अनुराग और प्रवासी जीवन के व्यापक अनुभवों का गहन अध्ययन मिलता है। इनके अतिरिक्त डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, सुश्री दिव्या माथुर, श्री नरेश भारतीय, भारतेंद्र विमल, डॉ. अचला शर्मा, श्री तेजेंद्र शर्मा (सभी यू.के.) तथा प्रो. हरीशंकर झा त्रिनिदाद व टुवैगो के वरिष्ठ कवि व साहित्यकार हैं। इस प्रकार विदेशों में हिंदी साहित्य-सर्जन के क्षेत्र में लेखकों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। अनेक श्रेष्ठ पुस्तकों और पत्रिकाओं का प्रकाशन आरंभ हो चुका है।

     

    हिंदी साहित्य का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है और निरंतर हो रहा है। प्रेमचंद की अनेक उत्कृष्ट कृतियों का विश्व की भाषाओं में अनुवाद हुआ है। हिंदी के मध्यकालीन कवियों में सूर, कबीर, मीरा, रसखान, तुलसीदास आदि की कृतियाँ विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित हुई हैं। हिंदी की साहित्यिक रचनाओं का अनुवाद यद्यपि विदेशी भाषाओं में पर्याप्त हुआ है, फिर भी परिमाण की दृष्टि से यह बहुत कम है। ये अनुवाद अधिकांशतः अँग्रेज़ी भाषा में ही हुए हैं। अन्य भाषाओं में ये बहुत कम हैं। पी.ए. बरान्निकोव ने उपेंद्रनाथ अश्क की 'गिरती दीवारें', कामता प्रसाद गुरु के 'हिंदी व्याकरण' और विष्णु प्रभाकर की 'हिमालय की बेटी' आदि कृतियों का रूसी भाषा में; वेनिस विश्वविद्यालय की मरियोला अरादी ने प्रेमचंद के 'गोदान' और कुंवर नारायण की रचना 'आत्मजयी' का, डॉ. चिपीलिया ने फणीश्वरनाथ रेणु के 'मैला आंचल' का इतालवी भाषा में; कोलचो कोवाचेव ने प्रेमचंद के 'गोदान' तथा कृश्नचंदर के 'दादर पुल के बच्चे' का बल्गारियन भाषा में अनुवाद किया है।

     

    सिनेमा के माध्यम से भी हिंदी विश्व पटल पर पहुँची है। विश्व के अनेक ऐसे शहर, जहाँ लोग हिंदी नहीं समझते, वहाँ भी हिंदी सिनेमा ने अपनी पकड़ और पहुँच बनाई है और हिंदी के वैश्विक परिदृश्य को विस्तृत किया है। डॉ. कुसुम खेमानी ने लिखा है, डरबन (दक्षिण अफ़्रीका) और (जोहॉन्सबर्ग) में हिंदी संबोधनों के अलावा भारतीय मूल का कोई भी युवा हिंदी नहीं समझता पर हिंदी सिनेमा में उसकी परम आसक्ति का परिचय तब मिला, जब भारतीय कलाकारों के शो के टिकट 'बड़े ब्लैक' में बिकते देखे और लोगों का दूसरे शहरों में बड़ी संख्या में 'डरबर' आना देखा। अस्सी हज़ार आदमियों के भीड़ में खचाखच भरा वहाँ का स्टेडियम 'भारत हमारी माँ है', 'भारत देश स्वर्ग से महान है' के नारों से गूँज रहा था और उसी के बीच डबरन विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सीताराम समभजन मुझे बता रहे थे कि यहाँ युवाओं में हिंदी सीखने के प्रति ख़ास ललक हिंदी सिनेमा की वजह से ही है।

     

    'मॉरीशस' में तो ख़ैर हिंदी और भोजपुरी बोली जाती है पर हिंदी सिनेमा का जादू 'ट्रिनिदाद' तक में देखने को मिला। वहाँ के लोग नोबेल पुरस्कार से पुरस्कृत अपने बाशिंदे व्ही. एस. नॉयपाल को चाहे न जानें पर शाहरुख खान और ऐश्वर्या राय पर मुग्ध हैं। बुज़ुर्गों ने बताया है कि यदि ब्रायन लारा (विश्व का श्रेष्ठ क्रिकेट खिलाड़ी) और अमिताभ बच्चन एक साथ खड़े हों तो भीड़ बच्चन जी की ओर ही जाएगी। हालांकि वह देश भी 'क्रिकेट पगला' है। कमोवेश ये ही अनुभव केपटाउन, सूरीनाम, फ़िजी आदि में हुए। लंदन और अमेरिका के तथ्य तो सर्वविदित हैं ही, वहाँ तो अब हिंदी सिनेमा बनाए भी जा रहे हैं।

     

    विदेशों में पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से भी हिंदी की व्यापकता की जानकारी मिलती है। उदाहरणार्थ—

     

    सूरिनाम का सर्वप्रथम प्रकाशित पत्र 'आर्य दिवाकर' है, जिसका प्रकाशन 1964 में आर्य समाज द्वारा किया गया। इसी समय शिवरतन के संपादन में मासिक पत्रिका 'सरस्वती' प्रकाशित हुई। निकेरी नामक शहर के प्रवासी भारतीयों के सहयोग से कुछ दिन तक 'भारतोदय' नामक पत्र का भी प्रकाशन हुआ। सन् 1975 में ज्ञानहंस 'अधीन' ने 'धर्म प्रकाश' और शिवरतन ने 'वैदिक संदेश' का संपादन किया। प्रेमचंद ने भी कुछ समय तक 'प्रेम संदेश', महातम सिंह ने 'शांतिदूत' नामक मासिक पत्रिका निकाली।

     

    गुयाना में हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभ अँग्रेज़ी दैनिक पत्र 'आर्गोसी' के रविवासरीय परिशिष्ट के रूप में हुआ, जिसमें एक पृष्ठ हिंदी का होता था। इस हिंदी पृष्ठ में धार्मिक एवं सामाजिक सूचनाएँ प्रकाशित होती थीं। गुयाना में भी आर्यसमाज ने 'आर्य ज्योति' तथा सनातनधर्म सभा ने 'अमर ज्योति' पत्र का प्रकाशन किया। योगराज शर्मा के संपादन में प्रकाशित पत्र 'ज्ञानदा' एक उच्चस्तरीय पत्र है।

     

    त्रिनिदाद-टुबेगो का प्रथम हिंदी पत्र 'कोहेनूर अख़बार' है, जिसमें धार्मिक तथा स्थानीय सूचनाएँ छपती थीं। यहाँ का लोकप्रिय हिंदी पत्र 'ज्योति' है, जिसका प्रकाशन हरिशंकर आदेश के संपादन में 1968 से होता है। यह पत्र भारतीय विद्या संस्थान के मुखपत्र के रूप में प्रकाशित होता है। दक्षिण अफ़्रीका में भी प्रवासी भारतीयों की संख्या बहुत अधिक है। यहाँ हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभ 1903 में साप्ताहिक 'इंडियन ओपीनियन' के हिंदी संस्करण से हुआ है, जिसका संपादन मनसुख लाला जाजर करते थे। श्री जाजर की मृत्यु के बाद इसके संपादक हर्बट किचन एवं हेनरी एस.एल. पोलक रहे। सन् 1922 में भवानीदयाल संन्यासी के संपादन में 'हिंदी' नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन भी हुआ।

     

    भारत के पड़ोसी देशें में हिंदी पत्रकारिता की दृष्टि से बर्मा तथा नेपाल का स्थान उल्लेखनीय है। बर्मा में भी प्रवासी भारतीय बड़ी संख्या में रहते हैं। बर्मा में हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभ एल.वी. लाठिया के 'बर्मा समाचार' के प्रकाशन से हुआ। 'प्राचीकलश' पहले मासिक पत्र के रूप में प्रकाशित होता था। सन् 1934 में श्री श्यामाचरण मिश्र के संपादन में हिंदी दैनिक के रूप में इसका प्रकाशन प्रारंभ हुआ। श्यामाचरण मिश्र ने कुछ दिनों बाद 'प्रवासी' साप्ताहिक पत्र भी निकाला। रामप्रसाद वर्मा ने 'नवजीवन' दैनिक पत्र (1951), 'ब्रह्मभूमि' मासिक पत्र (1953) का संपादन प्रकाशन प्रारंभ किया। 'ब्रह्मभूमि' के माध्यम से बर्मा में अभी भी हिंदी पत्रकारिता का विकास हो रहा है।

     

    काठमांडू से उमाकांत दास के संपादन में 'नेपाली' हिंदी दैनिक का प्रकाशन 1956 से हो रहा है। इसमें प्रायः राजनीतिक समाचार प्रकाशित होते हैं, पर कभी-कभी हिंदी की रचनाएँ भी प्रकाशित होती हैं। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से कृष्णचंद्र मिश्र के संपादन में 1980 से 'साहित्य लोक' नामक साहित्यिक पत्र प्रकाशित होता है। 'चर्चा' और 'आरोहण' लघु पत्रिकाएँ हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में उल्लेखनीय नाम हैं।

     

    इनके अतिरिक्त समय-समय पर मॉरीशस में हिंदुस्तानी, आर्यवीर, आर्य पत्रिका, बसंत, जनता, जमाना, अनुराग, आभा, दर्पण, शिवरात्रि आदि; फ़िजी में भारतपुत्र, वृद्धि, वैदिक संदेश, सनातन धर्म, किसान, दीनबंधु, ज्ञान, प्रवासिनी, तारा, सनातन प्रकाश, झंकार, मित्र, विजय, राजदूत आदि; जापान में ज्वालामुखी, चीन में चीन आदि पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होता रहा है और कुछ का प्रकाशन अभी भी हो रहा है। कनाडा, नार्वे आदि अन्य अनेक देशों में भी हिंदी पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं।

     

    संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हिंदी का प्रवेश हुआ है। विदेश मंत्री के रूप में श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ को हिंदी में संबोधित किया था। भारत में राष्ट्रवादी विचार की सरकारों का एक उद्देश्य रहा है हिंदी का एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप संवर्द्धन करना और हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के कार्य को आगे बढ़ाना। भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों से भिन्न विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हिंदी भाषा के माध्यम से विदेशी जनता और विदेशों में भारतीय मूल के नागरिकों को संबोधित कर हिंदी और भारत का गौरव बढ़ा रहे हैं। यदि अन्य नेता एवं सामर्थ्यवान व्यक्ति भी उनका अनुकरण करेंगे तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर हिंदी और अधिक समृद्ध होगी।

    स्रोत :
    • पुस्तक : हिंदी भाषा और लिपि का इतिहास (पृष्ठ 41)
    • रचनाकार : मुकेश अग्रवाल
    • प्रकाशन : के.एल. पचौरी प्रकाशन
    • संस्करण : 2016

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